गुमनाम हीरोज..
वनाग्नि प्रबंधन में फायर वाचर्स की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है.
अल्प मानदेय में केवल 4 महीने काम करने वाले इन गुमनाम हीरोज ने उत्तराखंड के जंगलों को आग से सुरक्षित रखने में बेहद महत्वपूर्ण योगदान दिया है.
इनका मनोबल बढ़ाने के लिए धन्यवाद @प्लस एप्रोच फाउंडेशन
स्याहीदेवी-शीतलाखेत क्षेत्र में जन और तंत्र के परस्पर सहयोग और तालमेल से विकसित वनाग्नि प्रबंधन का शीतलाखेत मॉडल अब बङे पर्दे पर भी लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहा है.
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हल्द्वानी में रोड चौड़ीकरण के कार्य में प्रभावित हो रहे पुराने पेड़ों के ट्रांसप्लांट के बाद सभी जीवित हैं, सभी पर नई शाखाएं और पत्ते आ गए हैं । विशेषज्ञों की सहायता से हल्द्वानी के पुराने वृक्षों को बचाने की ये कोशिश ���फल हो रही है ।
जंगलों को आग से कैसे बचाएं
क्या है शीतलाखेत मॉडल
क्यों बांटने पड़े पूरे गांव में हल
क्या है "जंगल बचाओ जीवन बचाओ" की कहानी
महिलाएं बनी "जंगल बचाओ जीवन बचाओ" की रोल मॉडल
जंगलों को आग से बचा रही है 'जंगल के दोस्त' संस्था
खास पॉडकास्ट देखिए, स्वयंसेवी संस्था 'जंगल के दोस्त' के सलाहकार गजेंद्र पाठक के साथ
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@SubodhUniyal1@pushkardhami
पहले Pushkar Singh Dhami जी ने अब माननीय उच्च न्यायालय ने शीतलाखेत मॉडल की उपयोगिता पर मुहर लगाई है प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (HOFF)आदरणीय धनंजय मोहन जी सहित आप सभी को धन्यवाद.
*जंगल हमारे हैं-हमको ह�� बचाने हैं*
माननीय उच्च न्यायालय का बहुत बहुत धन्यवाद.
जंगलों में आग लगने का कारण चीङ या पीरुल नहीं है वरन शत प्रतिशत मामलों में मानवीय हस्तक्षेप से जंगल में आग लगती है और माननीय गतिविधियों को ही रोककर,व्यवस्थित कर उत्तराखंड के जंगलों को आग से सुरक्षित रखा जा सकता है यही शीतलाखेत मॉडल है
चीङ ना तो पहाङ का दुश्मन है ना ही बांज, बुरांस, काफल से इसका कोई बैर है.
चीङ और चौड़ी पत्ती प्रजाति के पेङ मिलजुलकर रहते हैं इनकी दोस्ती में आग लगाना इंसानी दिमाग की उपज है.
प्रभावी वनाग्नि प्रबंधन के लिए जन और तंत्र का परस्पर तालमेल और सहयोग बेहद महत्वपूर्ण है सीमित संसाधन और विस्तृत कार्य क्षेत्र के चलते अकेले वन विभाग वनाग्नि प्रबंधन नहीं कर सकता. अन्य सरकारी विभागों का सहयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण है.
@DmAlmora@DMChampawat@DmNainital
@ias_rawat सर!वनाग्नि के प्रमुख कारण ओण/आड़ा जलाने की परंपरा को समयबद्ध करने हेतु जनवरी माह में जारी इस शासनादेश का अनुपालन नहीं ��ो रहा है. इस शासनादेश के अनुसार ओण/आड़ा जलाने की अंतिम तिथि 31 मार्च थी मगर आम नागरिक तक इस शासनादेश की सूचना ना पहुंचने के कारण अभी भी ओण/आङा
जलाये जा रहे हैं जो कभी भी बङी वनाग्नि घटना को जन्म दे सकते हैं.
निवेदन है कि राजस्व विभाग, पंचायतीराज विभाग,पुलिस प्रशासन के सक्रिय सहयोग से इस शासनादेश की जानकारी आम नागरिक को दी जाए. साथ ही इन विभागों के फील्ड स्तरीय कर्मचारियों के मार्गदर्शन में ग्राम प्रहरी के सुपरविजन में