कभी-कभी सोचता हूँ, क्या सच में कोई किसी के लिए पूरी तरह से अच्छा हो सकता है? क्या सच में हम किसी के लिए इतना कर सकते हैं कि एक भी शिकायत न बचे? शायद नहीं। क्योंकि दुनिया की फितरत ही ऐसी है। जब तुम किसी के लिए खुद को मिटा देते हो, जब तुम किसी के लिए अपनी रातों की नींद कुर्बान कर देते हो, जब तुम किसी के लिए अपनी हँसी-खुशी तक भूल जाते हो, तब भी कहीं न कहीं कोई न कोई कमी रह ही जाती है।
क्योंकि इंसान की नजर में अच्छाई का कोई स्थायी वजूद नहीं होता। वह हमेशा पलभर का आभार व्यक्त करता है और फिर अपनी शिकायतों की गठरी खोलकर बैठ जाता है। तुमने किसी के लिए कितना किया, कैसे किया, क्यों किया, इन सवालों के जवाब किसी को नहीं चाहिए। उन्हें बस ये देखना होता है कि तुमने कहां कमी छोड़ दी, तुमने कहां चूक कर दी, तुमसे क्या गलती हुई। वे कभी तुम्हारी मेहनत, तुम्हारे त्याग, तुम्हारी फिक्र नहीं देखेंगे, बस एक नजर दौड़ाएँगे उन चंद बातों पर जो उनकी अपेक्षा��ं से मेल नहीं खातीं।
ऐसा लगता है जैसे अच्छाई की कोई कीमत ही नहीं होती। तुम किसी के लिए कितना भी कर लो, लेकिन जब जरूरत खत्म हो जाती है, तो तुम्हारे काम की अहमियत भी खत्म हो जाती है। तुम्हारे द्वारा किए गए हर छोटे-बड़े एहसान को लोग इस कदर भुला देते हैं जैसे वह कभी हुआ ही न हो। उनके पास याद रखने के लिए बस तुम्हारी गलतियाँ बचती हैं। जब तक तुम उनकी जरूरत पूरी कर रहे हो, तब तक तुम अच्छे हो, लेकिन जिस दिन त���मसे कोई एक भी उम्मीद टूट गई, उसी दिन तुम्हारी सारी अच्छाइयाँ धुल जाती हैं।
लोगों का स्वभाव ऐसा ही होता है। उन्हें आदत होती है सिर्फ शिकायत करने की, नुक्स निकालने की, आलोचना करने की। उन्हें ये स्वीकार करना नहीं आता कि कोई इंसान परफेक्ट नहीं होता, कोई हर किसी की हर उम्मीद को पूरा नहीं कर सकता। वे ये नहीं समझते कि जिस इंसान ने उनके लिए सब कुछ किया, वह भी एक इंसान ही है, कोई देवता नहीं जो कभी गलती �� करे। लेकिन नहीं, गलती की कोई माफी नहीं होती। एक गलती, और तुम्हारा पूरा चरित्र सवालों के घेरे में आ जाता है।
तुमने किसी की मदद की, लेकिन अगर एक बार तुम उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए, तो वे उसी एक बार को पकड़ लेंगे और पिछली सारी मदद को मिटा देंगे। तुमने किसी के दुख में साथ दिया, लेकिन अगर एक दिन तुम खुद अपने दर्द में उलझे रहे और उनका हाल पूछना भूल गए, तो वे यही कहेंगे कि तुम बदल गए हो, तुम पहले जैस�� नहीं रहे। तुमने किसी को हर कदम पर सहारा दिया, लेकिन अगर एक बार तुम लड़खड़ा गए, तो वे यही कहेंगे कि तुमने कभी कुछ किया ही नहीं।
इंसानों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे एहसान भूल जाते हैं, पर शिकायतें नहीं भूलते। वे अच्छाई की कद्र नहीं करते, पर कमियों को गिनाने में देर नहीं लगाते। वे उन लम्हों को कभी याद नहीं रखते जब तुमने बिना किसी स्वार्थ के उनके लिए कुछ किया था, लेकिन वे उन क्षणों को कभी नहीं भ��लते जब उन्हें तुमसे कोई शिकायत थी।
इसलिए कभी किसी से उम्मीद मत रखो कि वे तुम्हारी अच्छाइयों को याद रखेंगे। अगर तुम किसी के लिए अच्छा कर रहे हो, तो बस इसलिए करो कि तुम्हारा मन कर���ा है, तुम्हारी आत्मा को संतोष मिलता है। ये मत सोचो कि बदले में कोई तुम्हें सराहेगा, क्योंकि सराहना करने वाले बहुत कम होते हैं और शिकायत करने वाले हर मोड़ पर मिल जाएंगे।
जिंदगी का सबसे कड़वा सच यही है कि लोग तुम्हारी अच्छाइयों को तब तक नहीं देखते जब तक तुम उनकी उम्मीदों पर खरे हो, और तुम्हारी एक गलती को ताउम्र याद रखते हैं। इसलिए अच्छा बनो, लेकिन उम्मीदें मत रखो। क्योंकि जब तुम्हारी अच्छाइया�� भुला दी जाएँगी और तुम्हारी गलतियाँ याद रखी जाएँगी, तब तुम्हें ये समझना होगा कि ये दुनिया ऐसी ही है....यहाँ सराहना के फूल कम खिलते हैं, लेकिन शिकायतों के कांटे हर मोड़ पर मिलते हैं। 🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी 🔥
अगर आपके पास मुख्य सड़क पर 80–150 Square Feet की खाली दुकान या जगह है, तो आप वहां मिनी कैफे या टी-पॉइंट खोलकर अच्छी कमाई कर सकते हैं।
आजकल लोग सिर्फ चाय पीने नहीं, बल्कि बैठकर बातचीत करने और समय बिताने के लिए भी ऐसी जगहों पर जाते हैं।
इसके लिए बहुत बड़े निवेश की जरूरत नहीं ���ोती। एक अच्छी चाय मशीन, कुछ कुर्सियां, साफ-सुथरा माहौल और स्वादिष्ट चाय-नाश्ता काफी होता है।
मान लीजिए रोज़ 150 ग्राहक आते हैं और हर ग्राहक औसतन ₹30 खर्च करता है तो:-
150 × ₹30 = ₹4,500 प्रतिदिन
₹4,500 × 30 = ₹1,35,000 प्रतिमाह
खर्च निकालने के बाद भी अच्छी बचत हो सकती है।
सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों की चाय पीने की आदत कभी खत्म नहीं होती, इसलिए सही लोकेशन पर यह बिजनेस लंबे समय तक चल सकता है।
कई लोगों ने छोटी सी दुक��न से शुरुआत करके बाद में उसे कैफे और रेस्टोरेंट तक बना दिया।
अगर आपके पास सड़क किना��े खाली जगह हो, तो आप उसे खाली छोड़ेंगे या चाय-कॉफी का बिजनेस शुरू करेंगे?
भीड़भाड़ वाली ट्रेन के दरवाजे पर फंसी महिला का हाल देखकर भाजपा का नारी शक्ति वंदन याद आ गया
याद आ गया मोदी जी का वह राष्ट्र के नाम संदेश जिसमें कांग्रेस को महिला आरक्षण का विरोध करने वाला बताकर कोसा गया था
2014 से देश में भाजपा की सर��ार है और महिलाओं की यह दुर्दशा है... यह महिला किसी की बहन ,या बेटी होगी...दुख होता है ये सब देखकर
'ठीक' दिखना इस दुनिया की सबसे बड़ी शर्त है। यहाँ टूटे हुए को मरहम नहीं मिलता, सिर्फ सवाल मिलते हैं। यहाँ थक हार कर रुक जाने वालों को 'कमज़ोर' कहा जाता है, और जो चुपचाप सहते रहते हैं उन्हें 'समझदार'। दरअसल, यहाँ जो सबसे ज़्यादा टूटा होता है, वही सबसे ज़्यादा मुस्कुराता है क्योंकि वो जानता है क��� सवाल पूछने वाले बहुत हैं, लेकिन जवाब सुनने वाला शायद कोई नहीं।
रिश्तों का भी यही हाल है, पहले अपनापन जताया जाता है, फिर धीरे-धीरे उम्मीदें लाद दी जाती हैं, और जब आप उन उम्मीदों के बोझ तले थोड़ा झुकते हैं, तो कहा जाता है "तुम तो बदल गए हो।" कोई नहीं पूछता कि उस बदलाव के पीछे कितनी रातों की बेचैनी, कितनी सुबहों की ख़ामोशी और कितने अपनों की बेरुख़ी थी।
हर कोई अपनी कहानियों में इतना उलझा है कि दूसर��ं की पीड़ा अब सिर्फ एक “रील” की तरह दिखती है, कुछ सेकेंड की संवेदना और फिर स्क्रॉल। किसी के आँसू अब सिर्फ स्क्रीन के बाहर की चीज़ बन चुके हैं, और स्क्रीन पर दिख रही मुस्कान ही अब सच मानी जाती है।
लेकिन फिर भी, हम उम्मीद करते हैं कि कोई तो होगा जो हमारे मौन को पढ़ लेगा, जो पूछेगा नहीं कि ‘कैसे हो?’ बल्कि कहेगा “चुप मत रहो, मैं सुन रहा हूँ।”
शायद यही ख्याल हमें ज़िंदा रखता है कि किसी दिन, कहीं से कोई अपना अचानक आएगा,बिना शोर किए हमारी आँखों में देखेगा और कहेगा "अब और मज़बूत मत बनो, थक चुके हो तो बस बैठ जाओ मेरे पास।"
क्योंकि अंततः, हर इंसान की सबसे गहरी चाह यही होती है कोई हो जो उसे उसकी खामोशी में भी समझ सके! जो कहे, “तुम्हें ठीक होने की नहीं, बस थामे रहने की ज़रूरत है। मैं हूँ न।”
और जब तक वो कोई नहीं आता तब तक हम सब बस निभा रहे हैं, जी नहीं रहे क्योंकि जीना तो तब होता है, जब ज़िंदगी में कोई ऐसा हो, जिसके सामने तुम सच में रो सको और वो सिर्फ आँसू न पोंछे, तुम्हारे अंदर की सारी थकान भी बाँट ले...और ये उम्मीद ही शायद हमारी सबसे बड़ी साँस है। 🌸
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
आज जब मैं तुमसे दूर जा रहा हूँ, तो कोई शिकायत दिल में नहीं है, बस एक सन्नाटा है। मैं हमेशा तुम्हारी परछाई बनकर साथ रहा, पर अफ़सोस, तुम कभी मुड़कर उस साए को देख न सके। ख़ुश रहना, क्योंकि मेरी मोहब्बत की पहचान यही है।
- @chastemonk
बेशर्मी की भी हद पार हो गई है आसपास जवान लड़के लड़कियां हैं लड़की वीडियो बना रही हैं पर दोनों को घंटा फर्क नहीं पड़ रहा हैं.।
घर से एक्स्ट्रा क्लास की परफॉर्मेंस यहां दी जा रही हैं मां बाप सोच रहे होंगे बेटी पढ़ ल���ख कर घर के हालात बदलेगी अफसोस उनका सोचना गलत है।
आप क्या कहते हैं.....
दुःख इस बात का नहीं कि तुम मुझे अपना न सके, गहरा दर्द तो इस बात का है कि तुम मुझे कभी पहचान ही नहीं पाए। मेरी आँखों में छिपी उस बेपनाह शिद्दत को, धड़कनों में गूंजते तुम्हारे नाम को और मेरी ��र ख़ामोशी में छिपे तुम्हारे इंतज़ार को तुम पढ़ ही न सके।
- @chastemonk
सिरहाने रखे ख्वाब अब बरगद का पेड़ बन चुके हैं, वो भी ऐसा जो वक्त की मिट्टी में नहीं, यादों की नमी में उगा है। हर रात जब नींद आंखों से उलझती है, ये ख्वाब जड़ों की तरह मन में उतरते हैं गहराई तक, उस जगह तक जहाँ कोई नहीं पहुँचता, सिवाय ख़ुद के।
इनकी शाखाएँ आसमान को नहीं, भीतर की उस ऊँचाई को छूती हैं जिसे लोग अक्सर भूल जाते हैं। इन टहनियों पर लटके हैं कुछ मुस्कुराते लम्हे, कुछ आँसू भरे दिन, और कुछ अनकहे सवाल जो जवाब नहीं माँगते, बस साथ चलते हैं। ये पेड़ हर सुबह सूरज के साथ नहीं जागते, ये उन रातों के साथी हैं, जब खामोशियाँ भी भारी लगती हैं।
हर पत्ती पर एक अधूरी दुआ है, हर जटा में एक ठहरा हुआ ख़्वाब। इसकी छांव में बैठते ही मन के सारे शोर थम जाते हैं जैसे किसी ने चुपके से कान में कहा हो, "मैं हूँ, बस यहीं, तेरे पास।"
और सच मानों, ये पेड़ अब बस सिरहाने नहीं रहता, ये आत्मा में घर कर गया है। जब भी दुनिया बहुत तेज़ हो जाती है, या अकेलापन बहुत गहरा, तब यही पेड़ है जो कहता है "बैठ जा, थोड़ा रो ले, फिर चलेंगे..."
राघवेन्द्र चतुर्वेदी 🌹
कभी-कभी हम किसी के लिए सब कुछ कर देते हैं,
और वही इंसान हमें ये महसूस करा देता है…
कि हमारी कोई अहमियत ही नहीं थी सच-सच बताओ…
आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है?
सौर ऊर्जा का बाप आ गया! UV Rays वाला सोलर सिस्टम लगवाओ। बिना धूप के भी 24 घंटे बिजली बनाएगा 😱
सामान्य सोलर पैनल मुख्य रूप ��े दिन की रोशनी से बिजली बनाते हैं और UV rays को ज्यादातर बर्बाद हो जाने देते हैं।
नया UV सोलर सिस्टम (जैसे AuREUS) UV rays को अच्छे से पकड़ लेता है। यह फल-सब्जी के कचरे से बना होता है और बादल छाए रहने पर भी काम करता है।
पारदर्शी पैनल बन सकते हैं, जो खिड़की जैसी लगते हैं। देखने में सुंदर लगते हैं।
UV rays हर मौसम में आती रहती हैं, भले धूप कम हो। इसलिए रात, बादल या कम धूप में भी बिजली बनती रहेगी।
भारत में गर्मी और बादल वाले मौसम में बहुत फायदा होगा। Efficiency बढ़ेगी, कम जगह में ज्यादा बिजली बनेगी।
अगर UV पैनल आम हो गए तो पुराने सोलर पैनल कम इस्तेमाल होने लगेंगे। क्योंकि ये हर मौसम में बेहतर काम करते हैं, पुराने महंगे और कम असरदार लगेंगे।
बिजली का झंझट बहुत कम हो जाएगा – घर, दुकान, गांव सब जगह आसानी से बिजली। धूप बहुत ज्यादा होने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बस हल्की UV काफी है।