जिस वीर के साहस के आगे डर भी झुक गया,
जिसने स्वाभिमान के लिए हर संघर्ष को स्वीकार किया…
ऐसे महान योद��धा महाराणा प्रताप जी को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन।
#MaharanaPratapJayanti
@Swiggy@SwiggyCares@InstamartS@consumerforum_
I have ordered Swiggy Instamart grocery items with order ID 235073585873147. Order not delivered yet but marked delivered. The delivery partner ask for OTP but The delivery partner misbehaved and left without delivering the order.
IRCTC से तत्काल टिकट बुक करना = रेगिस्तान में पानी ढूँढना।
कागजो में नियम है >>
एक आधार कार्ड से 3 से ज़्यादा तत्काल टिकट नहीं।
जमीनी हक़ीक़त ये है कि टिकट तभी मिलेगी जब सिस्टम काम करेगा।
09:45 बजते ही IRCTC का सर्वर घुलने लगता है >
पेज घूमता है , OTP अटकता है,
पेमेंट से पहले “Connection Lost”.
और जैसे ही सारे टिकट बिक जाते हैं ,
सर्वर अचानक ठीक होकर वापस आ जाता है।
सवाल ये है >>
एजेंटों पर रोक सिर्फ़ आम यात्रियों के लिए है क्या?
क्या एजेंटों का सर्वर अलग चलता है?
क्या रेलवे को ये नहीं दिखत�� कि डिमांड सप्लाई नहीं, सिस्टम फेल है?
हर रोज़ लाखों लोग परेशान हैं ,
लेकिन देश के सबसे बड़े ट्रांसपोर्ट सिस्टम के पास
एक ढंग की , भरोसेमंद टिकट बुकिंग व्यवस्था तक नहीं।
सरकार डिमांड-सप्लाई सुधारे न सुधारे ,
कम से कम IRCTC का ऐप और सर्वर तो ठीक कर ले।
खेजडली से अरावली तक….!!!
राजतंत्र बदलकर लोकतंत्र हो गया…!!!
लेकिन सत्ता का नशा आज भी क़ायम है…!!!
खेजडली में सत्ता ने अपने ऐशो-आराम के लिए खेजड़ियाँ काटने का आदेश दिया…
अरावली में सत्ता ने लालच के लिए पहाड़ों के खनन का आदेश दिया…
खेजडली में जनता ने अपने शीश कटवा लिए, लेकिन पेड़ नहीं कटने दिए…
आज हमारे शीश काट सके इतनी हिम्मत सत्ता में नहीं है…
आज हमारी एकजुटता ही काफ़ी है अरावली को बचाने के लिए…!!
इसलिए अरावली के लिए एकजुट बने रहिए….!!!
धरातल पर उतर सको तो उतरो…
सोशल मीडिया पर लिख सके तो लिखो…
लोगों को प्रेरित कर सको तो करो…
अंश मात्र सकारात्मक योगदान भी मायने रखता है…!!!
एक पेड़ माँ के नाम…..!!!
बाक़ी पूरा जंगल अपुन का….!!!
100 मीटर से ऊँचे पहाड़ अरावली के नाम…!!
बाक़ी सारे पहाड़ अपुन के….!!!
वाह मोदी जी वाह….👌
#SaveAravalli#अरावली_बचाओ h
🚨 अरावली: अस्तित्व की आखिरी जंग! 🚨
विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली पर मौत का वारंट जारी हो चुका है! ⚠️ सुप्रीम कोर्ट की 100 मीटर वाली नई परिभाषा 90% अरावली को संरक्षण से बाहर कर देगी।
अगर पहाड़ियाँ खत्म हुईं तो:
🌪️ दिल्ली-NCR में धूल भरी आंधियां बढ���ेंगी।
💧 भूजल स्तर पूरी तरह सूख जाएगा।
🌵 थार का रेगिस्तान आपके दरवाजे तक पहुँच जाएगा!
यह सिर्फ पहाड़ों की नहीं, हमारी सांसों की लड़ाई है। खनन लॉबी के खिलाफ आवाज उठाएं! 📢
#SaveAravali #अरावली_बचाओ #NoTo100MeterRule #EnvironmentFirst #DelhiNCR
♻️ RT करें और इस मुहिम का हिस्सा बनें!
अगर आज हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियां कहेंगी..
हमारे बाप-दादाओं ने तो अरावली को बर्बाद होने दिया!
अरावली हमारा फेफड़ा है, जो राजस्थान से गुजरात तक ऑक्सीजन देता है..
लेकिन अवैध खनन, अतिक्रमण और शहरीकरण से ये जंगल मर रहा है।
#अरावली_बचाओ#अरावली_पर्वतमाला_बचाओ#राजस्थान #SaveAravali #AravaliBachao #ProtectAravali @RavindraBhati__
"विकास के नाम पर विनाश का रास्ता"
भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के बाद 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को “पहाड़” न मानने की व्याख्या सामने आई है, जिसने अरावली के विशाल भूभाग को कानूनी संरक्षण से बाहर कर���े का खतरा पैदा कर दिया है। यह के��ल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय भविष्य को सीधे प्रभावित करने वाले हैं।
अरावली पर्वतमाला लगभग 692 किलोमीटर तक गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली है और इसे लगभग तीन अरब वर्ष पुरानी पर्वत श्रृंखला माना जाता है। इसका दो-तिहाई हिस्सा राजस्थान में स्थित है, जहाँ यह जलवायु संतुलन, वर्षा चक्र और भूजल रिचार्ज की रीढ़ के ���ूप में कार्य करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अरावली न होती, तो पश्चिमी, मध्य और दक्षिण भारत का बड़ा भूभाग रेगिस्तान में बदल चुका होता। ऐसे में इस प्राकृतिक ढाल को कमजोर करना दीर्घकालिक पर्यावरणीय आत्मघात से कम नहीं है।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आँकड़े इस संकट की गंभीरता को और स���पष्ट करते हैं। देश में मैप की गई 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 यानी महज 8.7 प्रतिशत ही 100 मीटर की ऊँचाई के मानक पर खरी उतरती हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इस नई व्याख्या के बाद कानूनी सुरक्षा खो सकता है। यह स्थिति खनन, रियल एस्टेट और निजी परियोजनाओं के लिए रास्ता खोलती है, जबकि पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए यह विनाश का संकेत है।
अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं है। यह 300 से अधिक जीव-जंतुओं और पक्षियों का प्राकृतिक आवास है, लाखों पशुपालकों के लिए चारागाह है और बनास, साबरमती तथा लूणी जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है। इसकी चट्टानी संरचना वर्षा जल को रोककर उसे जमीन के भीतर पहुँचाती है, जिससे पूरे क्षेत्र में भूजल रिचार्ज होता है। पहले से ही जल संकट से जूझ रहे पश्चिमी राजस्थान के लिए अरावली का कमजोर होना सूखे को स्थायी बना देने जैसा होगा।
सरकार की पर���यावरण नीति की वास्तविक तस्वीर जोजरी नदी की उपेक्षा और खेजड़ी वृक्षों के साथ हो रहे व्यवहार से भी साफ होती है। खेजड़ी, जिसे राजस्थान का राज्य वृक्ष माना जाता है और जो रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा है, आज योजनाबद्ध कटाई का शिकार बन रहा है। सरकारी आँकड़ों और जमीनी आकलनों के अनुसार, सोलर परियोजनाओं और औद्योगिक लीज़ के नाम पर अब तक लगभग 26 लाख खेजड़ी पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वा��े समय में करीब 50 लाख और खेजड़ी पेड़ों की कटाई की तैयारी की जा रही है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि एक पूर्ण विकसित खेजड़ी पेड़ के साथ अन्य पेड़ो को तैयार होने में लगभग 100 वर्ष लगते हैं, जिससे मरुस्थल के इस अनमोल पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक और गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
एक पेड़ औसतन 1,200 किलोलीटर ऑक्सीजन प्रतिवर्ष देता है। इस आधार पर, जो 26 लाख पेड़ काटे गए, वे हर साल लगभग 25 करोड़ किलोलीटर ऑक्सीज��� प्रदान करते थे जो अब पूरी तरह बंद हो चुकी है। ��ेड़ों के कटने और बड़े पैमाने पर ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना के कारण तापमान में 3 से 4 डिग्री तक वृद्धि दर्ज की गई है। पर्यावरणविदों के अनुसार, पश्चिमी राजस्थान में बारिश कम होने का यह एक प्रमुख कारण बन गया है। तापमान बढ़ने और आवास नष्ट होने के चलते रेगिस्तान के कई छोटे जीव भी विलुप्ति के कगार पर पहुँच गए हैं। जबकि यही पारिस्थितिकी तंत्र है जो न्यूनतम पानी में पनपता है, मिट्टी को बाँधकर मरुस्थलीकरण को रोकता है, पशुओं के लिए चारा देता है और स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है।
विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में अरावली की रक्षा के लिए ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। 1990 के दशक से लेकर एम.सी. मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया जैसे मामलों में कोर्ट ने राजस्थान और हरियाणा में अनियंत्रित खनन पर रोक लगाई और यह स्वीकार किया कि इससे होने वाला पर्यावरणीय नुकसान अपूरणीय है। ऐसे में आज उसी अ��ावली को कमजोर करने वाली व्याख्या सामने आना न केवल चिंताजनक है, बल्कि न्यायिक परंपरा के भी विपरीत प्रतीत होता है।
"अरावली सिर्फ पत���थर के पहाड़ नहीं, यह वो कुदरती दीवार है जो थार रेगिस्तान को हमारे शहरों और खेतों तक पहुँचने से रोकती है। जिस दिन यह दीवार गिर गई, हमारा हरा-भरा कल रेत में दफन हो जाएगा। जागिये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।"
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मैं अरावली हु जो लाखों सालों से इस धरती मां की रक्षा में अड़ींग खड़ा हु, मेने भूकंप रोके, मैने तूफान रोके, मेने गर्मी से बचाया, मैने ठंड से बचाया, मैने हमेशा ऑक्सीजन दी,
मैने बाहरी आक्रांताओं से बचाया,
आज मेरे अस्तित्व को खतरा है, क्या भारत के वीरों मुझे बचाओगे आप?
#SaveAravalli