यूपी में फतेहपुर वाले जिओ टेक्नीशियन को टॉवर ���े बांध दिए हैं क्योंकि इंटरनेट धीमा चलता है।
सरकार सड़क बिजली पानी शिक्षा और स्वास्थ्य इतनी धीमी रफ्तार से भी नहीं पहुंच पाती; मगर सरकार के लोगों को बंधक नहीं बनाते हैं।
मूर्ख लोग कमजोर पर ही जोर आजमाते हैं।
•जेपी नड्डा कह रहे हैं कि 2014 में मोदी ने हर जिले में BJP का कार्यालय बनाने का संकल्प लिया था, उनके मुताबिक, अब तक 290 कार्यालय बन चुके हैं, 115 निर्माणाधीन हैं और 123 के लिए जम���न भी अधिग्रहित की जा चुकी है
•माहौल क्या है वाले राजीव भैया का दावा है कि इनमें से हर कार्यालय की कीमत कम से कम ₹5 करोड़ है
•सवाल है—BJP के पास इतना पैसा आया कहां से? 🤔
•कांग्रेस 55 साल तक सत्ता में रहने के बावजू�� इस स्तर पर अपने कार्यालय नहीं बना सकी, लेकिन BJP ने महज 12 साल में इतनी बड़ी संख्या में कार्यालय खड़े कर दिए।
•और फिर BJP कहती है कि कांग्रेस भ्रष्ट है😂
"चमार हमारे इंहा कुर्सियों पर नही बैठ सकते, यह हमारे गाँव की मर्यादा है"
मामला मध्य प्रदेश के कटनी जिले का बताया जा रहा है।
एक महिला के घर के बाहर दुकान पर समोसा बेचा जा रहा था। रक्षा बंधन कर मौके पर गांव में आये धनीराम चौधरी भी समोसा खाने चला गया। वँहा ग्राहकों के लिए रखी कुर्सी पर वो बैठ गया।
घर से महिला निकलती है, कहती है कि चमार होकर कुर्सी पर न बैठो। हमारे गाँवो की मर्यादा भंग हो जाएगी।।
विकास कुमार जाटव
इस विडियो में महिला ने दावा किया कि चाय की दुकान पर उसकी जाति के कारण उसे गिलास में चाय देने से मना कर दिया गया। अगर यह आरोप सही है, तो यह सिर्��� एक व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं, बल्कि समाज में आज भी मौजूद छुआछूत की गंभीर तस्वीर है।
संविधान ने हर नागरिक को बराबरी और सम्मान का अधिकार दिया है, लेकिन जमीन पर ऐसी घटनाएं कई सवाल खड़े करती हैं। जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी का सवाल भी यही है—समस्या से मुंह मोड़ने के बजाय उसे स्वीकार कर खत्म करने की कोशिश क्यों नहीं की जाती...
#dalit #inc @RahulGandhi
श्यामलाल य���दव जी ने आरक्षण की बहस में अपनी बात को बड़े ही तर्क के साथ रखा.
उन्होंने कहा जो लोग आरक्षण खत्म करने की मांग करते हैं उनसे सवाल पूछना चाहता हूँ जहां आरक्षण नही है क्या वहां मैरिट के आधार पर नियुक्ति हो��ी है ?
न्यायपालिका में आरक्षण नही है. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति मैरिट पर नही, कॉलेजियम करता है. यहां बड़ी मुश्किल से एक दो जज ओबीसी या एससी होंगे.
ज्यादातर जज अगड़ी जातियों से हैं. बिना आरक्षण का ये हाल है.
देश में 500-550 यूनिवर्सिटी हैं. कितने वाईस चांसलर ओबीसी एससी और आदिवासी है. क्यों नही 150 ओबीसी, 100 एससी और 50 आदिवासी वाईस चांसलर को चुना जाता है.
जहां आरक्षण नही है वहां ये ह��ल है, तो जब संविधान का दिया हुआ आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा तब क्या हाल होगा ?
श्यामलाल यादव जी के इस तर्क के बाद वहां बैठा आरक्षण विरोधी का चेहरा मायूस हो गया.
इन 8 सालों में लगभग 847 जज हाई कोर्ट में नियुक्त हुए.
SC : 33 [3.9%]
ST : 17 [2%]
OBC : 104 [12.3%]
टोटल : 154 [18 18%]
हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति में जाति आधारित आरक्षण नही है. ।
सारी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की कोलेजियम की सिफारिश पर होती हैं.
देश का हर दूसरा नागरिक ओबीसी है. देश का हर तीसरा आदमी एससी-एसटी हैं.
क्या हाइकोर्ट में बहुजन समाज के जजों के प्रतिनिधित्व कितना स��तुलित है ?
क्या यह कुछ विशेष जातियों का ओवर रिप्रजेंटेशन नही है.
दिल्ली के जंतर मंतर पर आरक्षण हटाओ आन��दोलन चल रहा है, जहां दलितों को नस्लीय गालियां दी जा रहीं हैं। आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे ये लोग जातिगत आधार पर देखिए कैसे गालियां दें रहें हैं..
ये है मनुवादियो की सोच नेहा बोरा को लेकर कितनी भद्दी भद्दी बातें बोल रही है
जो अपने माँ बहन को मुग़लों के पास छोड़ के आते थे ये बोलेंगे नेहा बोरा के बारे मैं
अगर आपको लगता है की SC/ST समुदाय अब किसी भी तरह से पीछे नहीं है— तो एक बार IIT में PhD की रिजर्व्ड सीट्स के आंकड़ों को भी देख लीजिए।
कई बार ये सीट्स इसलिए खाली रह जाति हैं क्योंकि उन्हें भरने के लिए पर्याप्त योग्य उम्मीदवार नहीं मिलते. इसका मतलब यह नहीं की क्षमता की कमी है,
बल्कि यहां बहुत से छात्रों को बचपन से वो माहौल, गुणवत्ता-पूर्ण शिक्षा, आर्थिक स्थिरता, सही मार्गदर्शन और रिसर्च की तैयारी ही नहीं मिलती है जो आईआईटी जैसे संस्थानों तक पहुंचने के लिए जरूरी होती है।
एकरा नाम Harsh Dubey है. ठीक लिखना पढ़ना भी नही आता है.
केवल भकर भकर बोलना आता है.
बेरोजगारी से इसको कोई समस्या नही है.
महंगाई से इसको कोई समस्या नही है.
शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण से इसको कोई समस्या नही है.
स्वास्थ्य सेवाओं का खस्ताहाल है, इसको कोई समस्या नही है.
जातिवाद से इसको कोई समस्या नही है.
जातीय हिंसा से इसको कोई समस्या नही है.
एक ही जाति के पुजारी, शंकराचार्य और मठाधीशों से इसको कोई समस्या नही है.
सवर्णों के ओवर रिप्रजेंटेशन से इसको कोई समस्या नही है.
इसको समस्या केवल OBC SC ST आरक्षण से है. इसके जाति के न्यूज़ एंकरों ने न्यूज़ चैनलों को बुला बुला कर इसको बोलने का मौका दिया, क्यों कि ये आरक्षण के खिलाफ बोलता है. इसका नाम हामिद दानिश नही, सरनेम Dubey है. इसके परिवार ने इसे आरक्षण से नफरत करना सिखाया है.
इतनी घोर लापरवाही ये हालात है कि कोई अपने पेट का इलाज कराने जाय और उसका हाथ काट दिया गया
ये हालात राजधानी लखनऊ के सरकारी अस्पताल का है
@CMOfficeUP@PMOIndia
आख़िर क्यों यूपी अस्पताल मौत के कुआँ बन चुके है ?
अक्सर आरोप लगाया जाता है बसपा के पास मीडिया सेल नही है.
भले बसपा के पास मीडिया सेल नही है. बसपा के पास करोड़ों कैडर हैं.
उसी का परिणाम है इंडिया का टॉप ट्रेंड हैशटैग #बहन_जी_का_संदेश सोशल मीडिया पर नंबर वन बना हुआ है.
आदरणीय मित्रों, इस हैशटैग को आज 24 घंटे तक टॉप पर रखना है. यह केवल ट्रेंड नही है, हमारी एकता और ताक़त का प्रदर्शन है.
34 साल का ऋषभ शाह खुद को Gen Z बताकर आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत का इंटरव्यू कर रहा था.
इस मंच पर आरक्षण व्यवस्था की जमकर आलोचना की गयी. ऋषभ शाह जो कि गुजराती जैन है.
एक सवाल में कहा रहा था आरक्षण 10 साल के लिए था और डॉ आंबेडकर आज होते तो खुद हैरान हो जाते.
ऋषभ शाह झूठ बोल रहा है. शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए संविधान में 10 वर्ष की समय सीमा कहीं नही लिखी गयी है.
मोहन भागवत को यह बात ��ता है लेकिन उन्होंने ऋषभ शाह को दुरुस्त नही किया, बल्कि झूठे नैरेटिव को फैलने दिया. इस देश का मुद्दा है है सवर्ण समाज जातिवाद क्यों करता है और सामाजिक प्रिविलेज को छोड़ना क्यों नही चाहता है.
-40 नंबर पर मेडिकल में एडमिशन हुआ एक्सपोज़्ड। SC/ST/ओबीसी ने नहीं जनरल लड़के ने लिया था सबसे कम मार्क्स पर एडमिशन।
लड़के ने पूरी पोल सबूतों के साथ खोल दी। Must Watch
“मेरे बहनोई से क़मीज़ उतरवा ली, यह कहते हुए कि हमने ऐसी क़मीज़ नहीं पहनी। तुमने पहनना कब से शुरू कर दिया?”
सोचिए, जब हर दलित परिवार जातिवाद से तंग आकर आज के समय में गाँव छोड़ने को मजबूर हो जाए, उस वक़्त यह कहना कि “आरक्षण ख़त्म करो”, कैसी हैवानियत है।
जो आरक्षण-विरोधी है, वह संविधान विरोधी है।
सीधे-सीधे देश-विरोधी।