पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिन्ह न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना , इतिहास यही-
उमड़ी कल थी मिट आज चली!
महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि पर सादर नमन।
#पुण्यतिथि#महादेवी_वर्मा
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ
~ दुष्यंत कुमार
दुष्यंत कुमार को जयंती पर सादर नमन ।
.@poetdushyant#दुष्यंत_कुमार#जयंती
मैं तु��े फिर मिलूँगी
कहाँ किस तरह पता नहीं
शायद तेरे तख़्य्युल
की चिंगारी बन
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
#जयंती
#अमृता_प्रीतम
.@AmritaPritam_
रात ऊँघ रही है…
किसी ने इन्सान की
छाती में सेंध लगाई है
हर चोरी से भयानक
यह सपनों की चोरी है।
अमृता प्रीतम को उनकी जयंती पर सादर नमन।
#जयंती#अमृता_प्रीतम
जिसको साधारण रूप से विराग कहा जाता है, वह केवल अनुराग के केन्द्र को बदलने का दूसरा नाम है।
-भगवती चरण वर्मा
(चित्रलेखा उपन्यास से)
भगवतीचरण वर्मा को जयंती पर सादर नमन ।
#जन्मतिथि#भगवतीचरण_वर्मा
“ करोड़ों व्यक्तियों के हजारों सालों के इतिहास से निकाले गए दो नाम, सीता और सावित्री! मैं पूछता हूँ सीता का नाम लेते समय हमारा माथा शर्म से झुक नहीं जाता निर्दोष नारी के कितने बड़े कलंक और कितनी अमानुषिक यातना को हम लोग झंडों पर गार कर पूजते हैं ? ”
#जन्मतिथि#राजेन्द्र_यादव
“ प्रेम में एक निष्ठा की बातें बहुत करते हैं और वह एकनिष्ठ प्रेम को प्रेम का उदात्त स्वरूप मानते हैं। मगर एकनिष्ठता केवल स्त्री की पुरुष के प्रति हो । पुरुष की एकनिष्ठता का क्या ? ”
( 'मल्लिका' उपन्यास से )
जन्म��िन की शुभकामनाएं ।
.@manishakuls
#मनीषा_कुलश्रेष्ठ
#जन्मदिन
सपने में कवि / पुरुषोत्तम अग्रवाल
कवि के सपने में एक शहर आबाद था
शहर का नाम ग्वालियर ���ा शायद इलाहाबाद था
सपने से निकला कवि
आ गया इस महानगर में
कितने मकान बदले
रह न पाया कभी घर में
#जन्मदिन
#पुरुषोत्तम_अग्रवाल
अगर इच्छा है प्रेम में पड़ने की तो पड़ो
देखो मैंने बढ़ा दिए हैं दोन��ं ��ाथ
अगर इच्छा हो इन्हें थाम लो ।
~तसलीमा नसरीन
तसलीमा नसरीन को जन्मदिन पर शुभकामनाएँ।
.@taslimanasreen
#जन्मदिन
#तसलीमा_नसरीन
“ नशे के मामले में हम बहुत ऊंचे हैं। दो नशे खास हैं: हीनता का नशा और उच्चता का नशा, जो बारी-बारी से चढ़ते रहते हैं। ”
~ हरिशंकर परसाई
जयंती पर सादर नमन।
#जयंती#हरिशंकर_परसाई#व्यंग्यकार
#जयंती#त्रिलोचन
श���्द
मालूम है
व्यर्थ नहीं जाते हैं
पहले मैं सोचता था
उत्तर यदि नहीं मिले
तो फिर क्या लिखा जाए
किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-
लिखा कर
तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे
एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए
........
मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को द���र्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके,जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके , जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके , उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।
#जयंती