हीरोगिरी फू फू (सांप को) करवाने में नहीं है। बिना ��ाथ लगाए भी सांप को इंसानों से बचाया जा सकता है, खासकर जब ज़हरीला हो।
जयसिंहपुरा से आज सुबह का रेस्क्यू। #Snakerescue
#snakehead #savesnakes
महिला कुश्ती में ओलंपिक के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान विनेश फोगाट ने आज इतिहास रच दिया, देश की बेटी ने आज फिर देश की शान बढ़ाई है !
बहुत -बहुत बधाई हो विनेश, फाइनल में जीत के लिए शुभकामनाएं !
@Phogat_Vinesh
🇮🇳 #GoForGold 🥇
Winning this medal is a dream come true, not just for me but for everyone who has supported me. I am deeply grateful to the NRAI, SAI, Ministry of Youth Affairs & Sports, Coach Jaspal Rana sir, Haryana government and OGQ. I dedicate this victory to my country for their incredible support and love.
Winning this medal is a dream come true, not just for me but for everyone who has supported me. I am deeply grateful to the NRAI, SAI, Ministry of Youth Affairs & Sports, Coach Jaspal Rana sir, Haryana government and OGQ. I dedicate this victory to my country for their incredible support and love.
मैंने नागौर जिले के डेगाना क्षेत्र में टंगस्टन का खनन पुन:प्रारंभ करने व इस क्षेत्र में लिथियम की उपलब्धता का सर्वेक्षण करवाने के लिए लगातार सरकार से सवाल पूछे है, आज इस मामले को लेकर मेरा सवाल सदन में सूचीबद्ध था, केंद्रीय खान व कोयला मंत्री जी ने सवाल का लिखित में जवाब भी दिया और सरकार के जवाब से प्रतीत हो रहा है की लगातार किए जा रहे प्रयासों का सकारात्मक परिणाम मिले ! नागौर जिले में टंगस्टन और लीथियम समृद्ध खनिज क्षेत्रों के लिए भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वक्षण द्वारा सर्वेक्षण कार्य प्रग���ि पर है,व��्ष 2017-18 से कार्य सत्र 2023 -24 तक जीएसआई ने राजस्थान के नागौर जिले में टंगस्टन और लिथियम के लिए 8 गवेषण परियोजनाएं शुरू की है !
जीसी द्वारा वर्ष 2017-18 के दौरान डेगाना के निकट रेवत पहाड़ी क्षेत्र में किए गए G3 चरण के गवेक्षण के उत्साहवर्धक परिणाम के आधार पर वर्ष 2019-20 तथा 2020-21 के दौरान डेगाना क्षेत्र की रेवंत पहाड़ी तथा उसके आस - पास टंगस्टन तथा लिथियम के लिए एक जी - 2 चरण का गवेषण कार्यक्रम शुरू किया गया और वर्�� 2022-23 के दौरान टंगस्टन और लिथियम युक्त खनिज क्षेत्र की निरंतरता की जांच करने के लिए रेवत पहाड़ी ब्लाक के उत्तर पश्चिम एक्सटेंशन और दक्षिण पूर्व एक्सटेंशन में दो जी 2 परियोजनाएं और पिपलिया ब्लॉक में एक जी 3 परियोजना शुरू की गई ! जीएसआई द्वारा नीलामी के लिए रेवत पहाड़ी (संयुक्त ब्लॉक) पर संसाधन संबंधी रिपोर्ट खान मंत्रालय को सौंप दी गई है, इस क्षेत्र में टंगस्टन खनन पुन:प्रारंभ करने की मांग से जु���़े बिंदु पर सरकार ने कहा की केंद्र सरकार नीलामी के लिए उपयुक्तता की जांच हेतु रेवत पहाड़ी में टंगस्टन ब्लॉक की भू -वैज्ञानिक रिपोर्ट की समीक्षा कर रही है,ब्लॉक की सफल नीलामी के बाद अधिमानित बोलीदाता उत्पादन शुरू करने से पहले आवश्यक वैधानिक मंजुरिया प्राप्त करेगा ! नागौर संसदीय क्षेत्र व नागौर जिले के विकास हेतु संकल्प हूं !
#MPNagaur #RLPNews
आज लोक सभा में नियम 377 के देवासी समाज की जन - भावना को ध्यान में रखते हुए राईका बाग पैलेस जंक्शन के नाम में सुधार करने की मांग रखी, मैने रेल मंत्री जी का ध्यान आकर्षि�� करते हुए अपने प्रस्ताव में बताया की जोधपुर शहर में ही जोधपुर रेल मंडल के उपनगरीय रेलवे स्टेशन राई का बाग पैलेस जंक्शन के नाम में स्पेस खत्म करते हुए संशोधन करके राईका बाग किया जाए, राजस्थान ,गुजरात सहित कई राज्यों में देवासी समाज जिन्हे राइका या रेबारी भी कहा जाता है,इस समाज की भावना इस स्टेशन के साथ जुड़ी हुई है और रेलवे की गलती से ही राईका बाग नाम में राई और का के मध्य स्पेस दे दिया गया जो पू���्ण रूप से अनुचित है और पुन: नाम संशोधन की मांग को लेकर राजस्थान में देवासी समाज आंदोलित है, देवासी समाज पशुपालक कौम है जिसका बहुत बड़ा इतिहास राजस्थान और गुजरात सहित देश भर में रहा है,भारत की प्राचीन परंपरा और संस्कृति को जीवंत रखने में भी देवासी समाज का बड़ा योगदान आज भी है, लोक देवताओं के इतिहास पर परिदृश्य डालेंगे तो भी यह सामने आएगा की देवासी समाज भी भरोसे और मजबूती का दूसरा नाम रहा है ! रा��� का बाग पैलेस जंक्शन रेलवे स्टेशन के नाम में राई और का के बीच का स्पेस खत्म करने की मांग को लेकर देवासी समाज मुहिम ��ी चला रहा है और राजस्व रिकार्ड में भी राई और का शब्द के मध्य स्पेस नही है,इसलिए देवासी समाज की जन भावना,उनके मजबूत इतिहास को मध्य नजर रखते हुए अविलंब जोधपुर रेल मंडल के उप नगरीय रेलवे स्टेशन राईका बाग में राई और का के मध्य स्पेस खत्म करके राईका बाग करने के आदेश शीघ्रता से जारी किए जाए !
@RailMinIndia
मध्यप्रदेश के सागर जिले के रहने वाले 22 वर्षीय ठेका कर्मी सौरभ पटेल की आज भीलवाड़ा में विद्युत विभाग के जिम्मेदारों की लापरवाही ने जान ले ली, इसे केवल दुर्घटना कहना ही सही नहीं है,वास्तविक रूप में देखेंगे तो यह प्रकरण सरकारी सिस्टम की नाकामी से हुई एक हत्या है,सिस्टम के गैर जिम्मेदाराना रव��ए से हर रोज होते विद्युत हादसे बहुत बड़ी चिंता का विषय है ! इस घटना मे FIR दर्ज होनी चाहिए एवं दोषी अभियंताओं की जिम्मेदारी तय करके उनके विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए ! चुंकी मृतक मध्यप्रदेश से यहां अपनी रोजी रोटी के लिए आया था ऐसे में राजस्थान सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए दिवंगत के परिजनों को आर्थिक पैकेज भी देना चाहिए ! राज्य सरकार को विद्युत हादसों पर लगाम लगाने के लिए एक्शन प्लान बनाना च���हिए !
@BhajanlalBjp @RajCMO @Bhilwara_Police @RajGovOfficial
आख़िर राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रों पर हर बरस क्यों बरसती हैं लाठियां?
उनकी कौनसी माँग ग़लत और ग़ैरकानू���ी है?
जैसे हमारे देश में हर काम शुरू क��ते हुए एक ब्राह्मण को बिठाया जाता है और वह मंत्र पढ़ता है : ॐ अपवित्र: पवित्रो ...य: ...पुण्डरीकाक्षं ....ठीक वैसे ही हर साल जुलाई के इन दिनों में छात्र एक ज़रूरी और सामान्य मांग शुरू करते हैं और प्रशासनिक मशीनरी पुलिस को बुलाती है और वह लाठियां बरसाना शुरू कर देती है। पहली लाठी पीठ पर ...इदन्नमम्। दूसरी लाठी टांगों पर इदन्नत्वम्...। लाठियां ही लाठियां।
हमारे देश के प्रात:स्मरणीय राजनेताओं का जैसा ��ुहरा-तिहरा-चौहरा चरित्र है, उसका सानी दुनिया में कहीं नहीं।
वे ऐसी जुगत सीख गए हैं कि लाठी मारने वाला भी उसी परिवार का और लाठी खाने वाला भी उसी परिवार का। लेकिन न मारने वाले को समझ आ रहा और न मार खाने वाले को।
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हमारे सम्मानित और विचारवान नेता सत्ता में एक समान संस्कृति को अपनाते हैं और सत्ता से बाहर होते ही ठीक उसके विपरीत। ऐसा लगता है कि संवाद लिखे हुए हैं और सिर्फ़ उन्हें बोलने वाले मुख अलग हो जाते हैं।
विधानसभा में भी यही होता रहता है।
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केंद्रीय चुनाव आयोग किसी बेबसी में भी विधानसभा या लोकसभा का चुनाव दो दिन इधर से उधर करने की कोशिश करे तो लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाता है; लेकिन जैसे ही सत्ता इन विशालहृदय नेताओं के हाथ आती है तो ये विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के चुनावों पर सबसे पहले रोक लगाते हैं।
हो सकता है, इसकी कोई आंतरिक वजह बहुत उचित हो, लेकिन मुझ अज्ञानी को आजतक वह वजह समझ नहीं आ सकी।
इसके लिए राजनेतागण हम जैसे अधम लोगों को माफ़ ही कर सकता है।
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राजस्थान में इस समय छात्रसंघ चुनावों की मांग हो रही है।
कल प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों पर पुलिस ने बहुत ही बेमुरव्वत अंदाज़ में लाठियां बरसाई हैं।
पिछली बार कॉंग्रेस की सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले छात्र संघों के चुनाव हार जा���े की आशंक�� भर में चुनाव टाल दिए थे। हालांकि मेरी जानकारी के अनुसार उसके युवा नेता कॉलेज परिसरों में अधिकांश चुनाव जीत रहे थे। जैसा कि उन्होंने विधानसभा और लोकसभा में साबित भी किया।
काँग्रेस सरकार ने वह ग़लती नहीं की होती और छात्र संघों के चुनाव हुए होते तो उसके पक्ष की बयार सामने आ जाती और वह एक ऐसा चुनाव नहीं हारती, जो उसके लिए जीतना बहुत ज़रूरी था और जिसमें ढेरों राजनीतिक चूकों के बावजूद वह मामूली अंतर से हारी।
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अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं चाह रही है कि ये चुनाव करवाए जाएं।
सच अब भी वही है।
कॉलेज परिसरों में चुनाव होंगे तो भाजपा समर्थक युवाओं के जीतने की संभावना है और इससे उसे अगले पांच उप चुनावों में मदद मिल सकती है। लेकिन सत्तारूढ़ दल ने वही ग़लती शुरू कर दी, जो काँग्रेस ने की थी।
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आख़िर राजस्थान में 76 विश्वविद्यालय हैं, 3,982 कॉलेज हैं और उनमें 13 लाख 25 हजार 607 विद्यार्थी अ��्ययनरत हैं। इनमें 6,03,554 लड़के और 7,22,058 लड़कियां हैं। यह आंकड़ा अभी का उच्च शिक्षा विभाग का है।
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छात्र संघ चुनावों की मांग करने वाले हमारे ही बच्चे हैं और हमीं उन पर लाठियां भांजना शुरू कर दें तो यह प्रथम ग्रासे मक्षिका पाते नहीं, प्रथम ग्रासे गिद्धं पाते जैसा कुछ हो जाता है।
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सवाल ये है कि राजस्थान में छात्रसंघों के चुनाव क्यों नहीं होने चाहिए? यह ज्ञान उन लोगों को कहाँ से मिलता है, जो ख़ुद चुनाव से जीतकर आए होते हैं।
हमारे कॉलेज और विश्वविद्यालय सिर्फ़ शिक्षा के केंद्र ही नहीं,
लोकतंत्र की पाठशालाएं भी हैं। यहीं से भारतीय लोकतंत्र को आम हिंदुस्तानी युवक नेताओं के रूप में मिलते हैं।
इन्हीं छात्र संघ चुनावों से ही राजस्थान कई प्रमुख नेता मिले हैं।
छात्र संघों के चुनाव नहीं होते तो राजस्थान श्योपतसिंह, योगेंद्रनाथ हांडा, हेतराम बेनीवाल, सुरेंद्रसिंह राठौड़, राजेंद्रसिंह राठौड़, अमराराम, अश्क अली टाक, राजपालसिंह, दर्शन कोडा, कालीचरण सराफ, हनुमान बेनीवाल, महेश जोशी, सतीश पूनिया, गजेंद्रसिंह शेखावत जैसे नेताओं से वंचित हो जाता। देवीसिंह भाटी और शांति धारीवाल भी छात्र राजनीति से आगे आए राजनेता हैं। अशोक गहलोत और सीपी जोशी भी छात्र राजनीति की सौगाते हैं। ओम बिड़ला भाजयुमो से ही निकले हैं। रघु शर्मा, प्रतापसिंह खाचरियावास, राजपाल शर्मा, राजकुमार शर्मा, महेंद्रजीत मालवीय, जीतमल खांट आदि छात्र संघों के चुनावों की बदौलत ही चमके। कैलाश मेघवाल और मन्ना बापू यानी यशवंतसिंह भी आदिवासी इलाकों के छात्र नेता रहे। जगतसिंह दायमा और जगमालसिंह ने कॉलेज परिसरों से ही चेतना पाई। राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे जयनारायण व्यास तो स्कूल में ही नेता बन गए थे। हरीश चौधरी जैसा नेता भी जोधपुर विश्वविद्यालय की छात्र संघ की राजनीति की ही देन है।
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इनमें कुछ नेता तो ऐसे रहे हैं, जो सत्ता में नहीं रहने के बावजूद वंचितों और उत्पीड़ितों के लिए अकल्पनीय काम करते रहे हैं।
हनुमान बेनीवाल जैसा नेता राजस्थान को कहाँ स�� मिला, जिसने काँग्रेस और भाजपा जैसी ताक़तवर पार्टियों को नत��िर कर रखा है।
अभी रवींद्रसिंह भाटी, निर्मल चौधरी और सोमू आनंद जैसे अध्यक्ष भी बने।
पहले दो के पास जाति और क्षेत्र का बल भी था; लेकिन सोमू ने एक अलग नैतिक आभा और जेंडर इक्वैलिटी के साथ एक छोटा लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण चुनाव जीता
आज रवींद्रसिंह भाटी और निर्मल चौधरी राजस्थान की युवा राजनीति के बड़े सितारे हैं। सोम अब एक रिपोर्टर है और उनकी समझ गहरी है।
कभी छात्र राजनीति से ही राजस्थान की प��्रकारिता को ओम सैनी जैसा जज्बे वाला पत्रकार मिला था।
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श्योपतसिंह, योगेंद्रनाथ हांडा, हेतराम बेनीवाल, मोहन पूनमिया, अमराराम जैसे नेताओं के संघर्ष को सलाम कि जिन्होंने भ्रष्टाचारियों की मुश्कें कसने में कसर नहीं छोड़ी और कितने ही किसान आंदोलन लड़े।
सुरेंद्रसिंह राठौड़ जैसा साहसिक व्यक्तित्व जिसकी कहानी हॉलीवुड की किसी फ़िल्म के हीरो जैसी रही, क्या वह कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसर के बिना संभव था?
एक औसत सा गुंडा कहलाने वाला शराबी लड़का ऐसे ट्रांस्फोर्मेशन से भी गुजर सकता है, यह कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों के पेड़-पौधे तो बता सकते हैं; लेकिन हमारे वे जड़ शिक्षक नहीं, जिनमें अधिकांशत: शिक्षा के अलावा बाकी सब में सब तरह की महारत रखते हैं।
आज राजेंद्रसिंह राठौड़ के बिना भाजपा संसदीय और विधायी प्रबंधनों में एकदम लचर ओर लाचार प्रतीत होती है तो इसीलिए कि उस नेता के पास ज़ीरो से हीरो बनने की एक ऐसी कहानी है, जो किसी प्रेरक पुस्तक में नहीं मिल सकती।
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आज अगर आदिवासी इलाकों का दिपदिपाता सितारा लोकसभा में पहुंचकर चर्चित हो चुका है तो इसलिए कि कभी राजकुमार रोत डूंगरपुर के कॉलेज परिसर में एक उम्मीद लेकर आया था।
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अगर हम सरकारी चयन के मानदंडों के हिसाब से देखें तो वह हमारी युवा प्रतिभाओं काे शिखर पर नहीं, गहरे गड्ढ़ों में धकेलने वाला एक बुरा लेकिन आकर्षक खेल है।
ये मानदंड जिनमें एक अच्छा गार्ड या बॉडी गार्ड या बॉक्सर देखते हैं, उनमें राजनीतिक शासन की प्रतिभा भी संभव है, यह उनके विचार के दायरे से परे की बा�� है।
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आज जिस अल्पसंख्यक वर्ग को दरकिनार करने के लिए कुछ लोग इन्सानियत और राष्ट्रीयता के समस्त संवैधानिक सरोकारों को पलीता लगा रहे हैं, तब यह सहसा याद आता है कि कोई अश्क अली टाक था जो नोहर के एक सामान्य परिवार से निकला और राजस्थान की राजनीति में सुदूर तक गया।
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भारत पाकिस्तान बॉर्डर के इलाक़ों में ठेले पर सब्ज़ी बेचने या कभी-कभार एक गधे पर कपड़े बेचने का काम करने वाले परिवार के एक ठिग्गू से लड़के का हर कोई उपहास उड़ाता; लेकिन वही लड़का कालांंतर में कॉलेज में पढ़ने लगा और वह गंगानगर से जयपुर के लिए चलता तो ट्रेन के टीटी थर-थर काँपते और राजस्थान विश्वविद्यालय का कुलपति उस दिन सिहर-सिहर रह जाता तो उसकी वजह छात्र राजनीति थी।
यह शिक्षा के परिसर ही हैं, जो एक अदने से लड़के को दर्शन कोडा बनाते हैं और बाद में वह श्रमिकों के शोषण के ख़िलाफ़ इतना बड़ी चट्टान बन जाता है कि भाजपा और काँग्रेस दोन��ं दलों से जुड़े दो नेता उसकी हत्या करवा देते हैं।
क्या कोई दर्शन कोडा ऐसे ही बिना किसी विचार के बन जाता है? और क्या यह विचार बिना किसी जीवंत शिक्षा परिसर के आ सकता है?
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राजस्थान विश्वविद्यालय ने एक छात्र संघ अध्यक्ष दिया था। नाम था राजपालसिंह शेखावत।
मुझे नहीं लगता कि राजस्थान के किसी राजनेता के पास इतिहास, संस्कृति, मूल्यबोध और आर्थिक मामलों की ऐसी अंतर्दृष्टि किसी अन्य नेता के पास ह��। अब अभागे राजनीतिक दलों में किसी की क्या छवि है, इसका तो इलाज किसी के पास नहीं।
कालीचरण सराफ, सतीश पूनिया, गजेंद्रसिंह शेखावत सरीखे नेता छात्र संघों की बदौलत ही हैं।
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छात्र संघों के चुनाव नहीं होंगे तो राजनीति के लिए नेता कहाँ से आएंगे?
वे या तो सत्तावादी-परिवारवादी नेताओं की संतानें होंगी या वे प्रॉपर्टी डीलर्स होंगे या वे आर्थिक अपराधी होंगे या सामाजिक अपराधी होंगे या फिर पैसे, सांप्रदायिकता और जातिवाद के बल पर आए हुए लोग होंगे या फिर वे शराब ठेके चलाकर आने वाले कारोबारी होंगे, जो सरकारों में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की गर्दनों को ऐंठ देने के नुस्ख़ों ��ी महारत में पारंगत होंग।
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राजनीति के लिए कॉलेज परिसर ही सबसे अच्छी नर्सरी हैं; लेकिन जन आंदोलन भी एक बड़ी उर्वरा भूमि हैं। लेकिन अब सरकारें चाहे किसी भी दल की हों, उन्होंने जनआंदोलनों को ख़त्म करने का बीड़ा सा उठा लिया है। इसलिए ले देकर छात्र संघ चुनाव बचते हैं।
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सच कहा जाए तो छात्र संघों के चुनावों को न करवाना भारतीय राजनीति के गर्भाशय को निकाल फेंकना है।
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आज यह भी समझने की ज़रूरत है कि छात्र संघों के चुनाव क्यों होने चाहिए? इसके लिए हम इन बिंदुओं पर विचार कर सकते हैं :
1. लोकतंत्र की आधारशिला हैं ये चुनाव
छात्र संघों के चुनाव ज़मीनी स्तर पर वह प्रशिक्षण है, जो हमें भविष्य के लिए अच्छे नेता दे सकता है। इस प्रक्रिया को जारी रखते हुए इसमें सुधार की ज़रूरत है। छात्र संघों के चुनाव के लिए भी एक आयोग होना चाहिए, जो उन्हें धनबल-जातिबल और धार्मिक ध्रुवीकरण की बुराइयों और लोकतां��्रिक मूल्यों के बारे में समझाए। लेकिन यह बहाना बनाकर चुनाव रोके नहीं जाएं।
2. लोकसमाज में से नए नेतृत्व का उभार
- ये चुनाव छात्रों को लीडरशिप स्किल डवलप करने, गवर्नेंस की जिम्मेदारियों को समझने और भविष्य की राजनीतिक भूमिकाओं के लिए तैयार होने के अवसर प्रदान करते हैं। छात्र यह सीखते हैं कि उन्हें लोगों से किस तरह संपर्क करना है और लोगों की वास्तविक समस्याएं क्या हैं। छात्र संघों के चुनाव से उन जड़ लोगों को बाहर करना आसान है, जो राजनीति में दुकान जमा लेते हैं।
3. छात्र हितों की बेहतर नुमाइंदगी
- निर्वाचित छात्र संघ यह सुनिश��चित करते हैं कि निर्वाचित संघों में विविध इलाक़ों की विविध आवाज़ों और ऐसे इलाक़ों के युवाओं को जगह मिलती है, जिन्हें यह कल्पना भी नहीं होती। उनकी चिंताओं और सरोकारों को समझने वालों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है। कॉलेज और विश्वविद्यालय की समस्याओं को वे बेहतर तरीके से समझते हैं और उनके आसान हल उनके पास रहते हैं।
4. पॉलिटिकल अवेयरनेस बढ़ाने में मददगार हैं छात्र संघ चुनाव
- चुनावों में भाग लेने से युवाओं में राजनीतिक जागरूकता और सहभागिता बढ़ती है। युवा देशवासी वेल इन्फोर्म्ड और एक्टिव होते हैं। लिहा��ा, अब यह संशोधन करने की आवश्यकता है कि छात्र संघ में मेल-फीमेल रिजर्वेशन रहे और 50 प्रतिशत लड़कियां हों ही। जातिगत और धर्मगत प्रचार पर रोक के लिए बेहतरीन वातावरण बने, ताकि एक अच्छा राजनीतिक माहौल पैदा हो।
5. जवाबदेही और पारदर्शिता का प्रशिक्षण
- छात्र संघ के पदाधिकारी होते हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन पर नियंत्रण रखते हैं। निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा म��लता है। आज राजस्थान विश्वविद्यालय अपना वार्षिक प्रतिवेदन जारी करता है तो यह नहीं बताता कि इस परिसर में कितने लड़के-लड़कियां पढ़ रहे हैं? वे किन पाठ्यक्रमों में कितने हैं? आम तौर पर 22 हजार से 25 हजार स्टूडेंट वोटर होते हैं, लेकिन इस संख्या का हिसाब विश्वविद्यालय छुपाए रखता है।
6. टकरावों को कम करने में मददगार
-निर्वाचित छात्र संघ चुनाव ग्रीवेंसेज को हल करने के लिए एक स्ट्रक्चर्ड प्लेटफॉर्म देते हैं। इनके माध्यम से विरोध और टकराव को टाला जा सकता है। लेकिन इस तर्क पर बहुत से शिक्षक हंसे��गे। हालांकि वे खुद जब-तब प्रदर्शन करते हैं, नारे लगाते हैं, काली पट्टियां बांधते हैं और विद्यार्थियों को जाने कैसे-कैसे शब्दों में कोसते हैं। यह दुहरा आचरण ही है कि जो शिक्षक कक्षा में लोकतंत्र पर लंबे व्याख्यान और आख्यान प्रस्तुत करते हैं, उस कक्ष से बाहर आते ही लोकतंत्र की शिक्षाओं को पलटने के लिए पूरा दमख़म लगा देते हैं।
7. हाशिये पर पड़े मार्जिनैलाइज्ड समूहों को एम्पावर करने में मददगा��
- छात्र संघ हाशिये पर पड़े मार्जिनैलाइज्ड समूहों को एम्पावर करने का काम तो करते ही हैं, वे ऐसे समूहों को भी मौके मुहैया करवाते हैं, जिन्हें कभी प्रतिनिधित्व नहीं मिला होता। अनसुनी आवाज़ों को अवसर देने का मौका और कहां मिलेगा? छात्र संघ चुनाव यह सुनिश्चित करते हैं कि उनके मुद्दों को उजागर किया जाए और उनका समाधान किया जाए। आप सहमत हों या असहमत; लेकिन अगर रवींद्रसिंह भाटी ने जोधपुर विश्वविद्य��लय का चुनाव नहीं जीता होता तो आज न तो एक सामान्य शिक्षक का बेटा विधानसभा में इतना प्रखर होकर बोल रहा होता और न ही कॉंग्रेस का सांसद लोकसभा में पहुंच पाता। यह सब रवींद्रसिंह भाटी की लोकप्रियता के कार��� ही है।
8. अकादमिक और एक्स्ट्राकरिकुलर के बीच बैलेंस
- अकादमिक और एक्स्ट्राकरिकुलर के बीच बैलेंस छात्र संघों के चुनाव ही रख सकते हैं। छात्र हितों का प्रतिनिधित्व वे ही कर सकते हैं। निर्वाचित छात्र नेता अकादमिक और एक्स्ट्राकरिकुलर के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण की वकालत कर सकते हैं, जिससे समग्र छात्रों के अनुभव संसार में वृद्धि होती है। दिक्कत यह है कि युवा छात्रों की भाषा एक ऊर्जा स्रोत से निकलती है और वह शिक्षक नामक उस जीव को बहुत बुरी लगती है, जो अपने आपको लोकतांत्रिक प्रणाली का शिक्षक समझने की वास्तविकता के बजाय भारतीय पौराणिक काल के गुरु की भूमिका में आ चुका होता है और हर समय हर छात्र को पांवोंं में शरणागत पाकर ही प्रसन्न होता है।
9. डेमाक्रेटिक इंस्टीट्यूट्स को मज़बूत बनाना
- लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में प्रारंभिक भागीदारी या तो पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से की जा सकती है या फिर स्थानीय निकाय में। लेकिन युवाओं के लिए सबसे बेहतर जगह कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसर ही हैं। युवा छात्र जब निर्वाचन की प्रक्रिया से गुजरते हैं तो इससे देश की ��ोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूती मिलती है। इन परिसरों में ही छात्र जीवन मूल्यों को सीखते हैं और प्रोफेशनल निजी जीवन में संतुलन हासिल करते हैं। अगर कहीं कमी रहती है तो उसे अच्छे नियम बनाकर दुरुस्त किया जा सकता है।
10. छात्र संघों के चुनावों से कैंपस में जीवंतता आती है
- छात्र संघों के चुनावों की वजह से कैंपस जीवंत रहते हैं। चुनाव में उतरने वाले युवा भविष्य के नेताओं के रूप में नई कोंपलों की तर��� खिलते हैं और भविष्य के प्रमुख भारतीय नेताओं के रूप में उभरते हैं, जो साबित करते हैं कि ये चुनाव भविष्य के राजनीतिक और सामाजिक नेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण उर्वर भूमि हैं। ऐसी ज़रख़ेज़ ज़मीन से निकले नेता एक बेहतर मज़बूत व्यक्तित्व के धनी बनते हैं।
कुल मिलाकर, छात्र संघ चुनाव सिर्फ़ परंपरा का मामला भर नहीं है; बल्कि यह युवा व्यक्तियों में लोकतांत्रिक मूल्यों और नेतृत्व कौशल को बढ़ावा देन�� वाली एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया ही सुनिश्चित करती है कि छात्रों की आवाज़ सुनी जाए और उस पर कार्रवाई की जाए, जिससे एक अधिक इन्क्लूज़िव और रीप्रेजेंटेटिव अकैडमिक एन्वायर्नमेंट ��नाने में मदद मिले। अगर छात्र संघों के चुनाव होंगे तो कॉलेज और विवि परिसर जीवंत होंगे। फर्जी छात्रों और फर्जी शिक्षकों की पोल खुलेगी। फर्जी डिग्रियों का कारोबार रुकेगा और एक अच्छा वातारण बनेगा, जहाँ अच्छे और सुचिंतित अध्ययनशील शिक्षकों का सम्मान बहाल होगा।
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और अंत में
इस ज़रख़ेज़ ज़मीन को मक्तल में मत बदलो शासकीय तंत्र के सिपहसालारो।
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@RavindraBhati_ @AmraRamMPSikar @Rajendra4BJP @Rajpal_BJP @NirmlChoudhary @PSKhachariyawas @NirmlChoudhary @SomuAnand_ @Barmer_Harish
( ये तथ्य और मान्यताएं अंतिम नहीं हैं। कृपया संशोधन नि:संकोच सुझाएं। इसके लिए DM करें।)
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