क्यों स्मरण करें उन बातों का जिनका अब अस्तित्व नहीं है
क्यों चिल्लाएं संघर्ष किया, जब अभी कोई व्यक्तित्व नहीं है,
बीती बातें छोड़के खुद का हम सम्मान करें
चट्टान बनें प्रधान बनें हम
आओ मिलकर महान बनें हम। - अर्जुन शर्मा
कितनी बातें याद करें
फिर कितनी उन पर बात करें
अतीत में छलांग लगा लगा कर
खुद ही खुद का गुणगान करें।
ऐसे थे हम जैसे थे, कैसे थे तब वैसे थे
हम बस खाली बैठे थे, लोगों के पास जब ��ैसे थे,
भूत का पल्लू छोड़ के अर्जुन, ऐसा एक काम करें
खुद को बेहतर करके जग में, पंख खोल उड़ान भरें।
पैसा लेके चम्पत हो गए, खीरे उगाके रम्पत हो गए
सालों तक केस चला, चोर अब साले मंत्री हो गए
सही ग़लत की बुद्धि मर गयी, न भय रहा किसी का
कॉकरोच कुचलकर खुद को समझ रहे मसीहा
गुटका थूका रोड पे और मांगा साफ़ हिंदुस्तान
अमीर साला अमीर रहा, ग़रीब जा रहा श्मशान। - अर्जुन शर्मा
समंदर सड़क साफ सफ़र संकोच साथ
दरिया दूर दिशा दृढ़ देह दर्द दो दृश्य दाग़
नदी निर्माण निष्पक्ष निवेश निवासी नायक
अर्णव अक्षम असमं��स अंत अनंत अनादि मैं। - अर्जुन शर्मा
सुन्दर सपना संघर्ष सच्चा सत्य सर्वत्र
तत्व त्याग तपिश तीव्र तन्मय तटस्थ
प्रोत्साहन पुष्प पल पीढ़ा पश्चाताप पाप
मन मैला माया मोती मनुष्य मैं मैं मैं। - अर्जुन शर्मा
किसके लिए छोड़ा वो जो सबसे अधिक ज़रूरी है,
सोलह दिन से ऊपर भूखे, नहीं लगता अब की मजबूरी है।
विचार करना कभी जब समय दिमाग साथ हो,
वजह समझना इसकी जब खुद से तुम्ह��री बात हो
मर जाना है एक दिन सबको, उसको थोड़ा पहले
जीना और कठिन होगा, तब फिर होगा विख्यात वो। - अर्जुन शर्मा
जंतर मंतर समय दिखाये, सच दिखाता गुणवान
मन से तन से शक्तिशाली वो लिए हाथ में विज्ञान,
राजनीति या कुछ और अब फ़र्क नहीं पड़ता हमको,
कभी रहना दो दिन भूखा, तब समझोगे वो इंसान।
नहीं पड़ता फ़र्क हमें किस कीड़े से ये शुरू हुआ,
गुज़र गए दिन काफ़ी तब कहीं मुझे ये यकीं हुआ,
कितनी मन्नत मांगी हैं, कितना हमने सोचा है,
कितना बहाया है पसीना, कितना हमने पोछा है,
समुद्र सी इस ज़िंदगी में, सब रंगों को डाला हमने
हर बार बनाया उसको हर बार ही उसको नोचा है। - अर्जुन शर्मा
एक दिन–
खूब हंसेगी ये दुनिया फिर शांत सी हो जाएगी, आसमान भी रोयेगा तुम देखना बरसात आएगी। - अर्जुन शर्मा
(फील मौत का दे रही है ये कविता पर ट्रस्ट मी नहीं है 🤗)
कर कितना लूंगा अगर अकल आ जाए तो,
जीकर कितना मर लूंगा ये बात समझ आ जाए तो,
रस्ता लंबा कठिन सफर है झमेला नहीं बताने को,
क्या तब भी साथ रहेगा कोई जब कुछ होगा नहीं दिखाने को,
कितना प्यार मिलेगा खुद को अकेला नहीं बताने पर,
कैसे खुद को बेचूंगा दुनिया में मेला नहीं लगाने पर,
खुश रहना हमेशा।
उसका नहीं पता
दूसरों को रखूंगा तो चलेगा?
पहले तुम रहना। बाकी तुम सब संभाल लोगे।
ठीक है। जैसा आप बोलो।
अब मैं चलता हूं।
कहां?
किसी और से पूछने।
क्या?
आंखों में क्या ���िखता है?
आंखों में क्या दिखता है? सपने दिखते होंगे
अरे आंखों में क्या दिखता है? तो अपने दिखते होंगे।
तुम्हें क्या दिखता है?
मुझे दिखता है समय से पहले बड़े हो जाने का मलाल, खुद को बेहतर करने के प्रयास में हो जाना दूसरा कोई।
इतना सब ? सुनाई भी देता है कुछ?
हां एक नटखट बच्चे के मर जान��� की चीख, लोगों की उपहास करने वाली हंसी, घर वालों का आशीर्वाद गुरु की सीख ।
महसूस नहीं होता कुछ?
अब होता है, आत्मविश्वास, ठंडी हवा में सुकून, लज्जा, किसी मजबूर की दृष्टि।
क्या करना है फिर ?
वही हमेशा की तरह खुद को बेहतर करना है।
कर पाओगे?
कर लूंगा।
वो चांद था सरे-आसमां
एक ख़्वाब था निगाह में
इश्क था या थी उन्स ही
रहा खुद खुदा गवाह में
खोजते किनारे पर सभी उसे
भाव जो कि छ���प गया अथाह में
धीरे से रोज एक टुकड़ा टूट जाता है
मन का वहम मेरे या सच में हो रहा तबाह मैं
लोग पास रहते तो न होती खबर कोई
याद ही आया कमबख्त तू सियाह रात मे
बहुत हो गए हैं ये बहाने, अब बदलाव की बारी है
देखूंगा सबका सब कुछ अब टकराव की बारी है
कष्टप्र�� है यात्रा खुद से थोड़ा लगाव की बारी है
नीचे उतर गया काफी अब किस्मत में चढ़ाव की बारी है। – अर्जुन शर्मा
दिन का अंत एक सुंदर शाम नहीं है आराम आंखों को कोई विराम नहीं है मैंने देखकर तुझे बस दिल हल्का किया ज़िदंगी शिकायतें हैं मेरी पर तुझपर इल्ज़ाम नहीं है..... अर्जुन शर्मा
अगहन पूष बात बारात रात
कठिन जीवन नहीं सर्द ख़्वाब
रूठे चांद की सुने ना कोई
बंदिशों में सिर्फ तुम ही नहीं
वो याद किसी के साथ
दो लफ्ज़ ढेर इंतज़ार
तीव्र अच्छे गाने, और एक ख़्वाब
राज���ानी की ठंड, धुआं,कोहरा