किसी भी धर्म में, किसी भी मजहब में, पंथ में अथवा साधना में, उपासना में, कोई प्रगति करना चाहता है तो उसे मंत्र रूपी शब्द की आवश्यकता पड़ती है। नाम की बड़ी भारी महिमा है। शब्द की बड़ी भारी महिमा है। शब्द में अनंत अनंत शक्ति है। परब्रह्म की एक शब्द शक्ति है। शब्द शक्ति, शब्द ब्रह्म रूप में उपासना करने का अवसर मिल जाए। शब्द की शक्ति से ही योगी नि:शब्द नारायण तक पहुंच जाते हैं। शब्द को ब्रह्म कहा है - शब्द ब्रह्म । उसकी उपासना सभी धर्मों में, सभी मतों में, सभी मजहबों में, सभी संप्रदायों में, सभी व्यक्तियों के लिए शब्द की उपासना तो है। वे शब्द अगर मंत्र हैं तो उसका प्रभाव इस लोक में जो दृश्यमान चीजें हैं, उससे अलग मंत्र की शक्ति, दृश्य में और सूक्ष्म जगत में भी काम करती है।
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ये जो जगत दिखता है, ये स्थूल जगत है, इसको आदि भौतिक कहते हैं। हमारा शरीर 27 तत्वों का बना है, ज��� जीव मर जाता है तो 10 तत्व यहाँ छोड़ देता है।
पृथ्वी और जल अंश छोड़कर बाकी के 17 तत्वों का सूक्ष्म शरीर बनता है, तो उसने जो देखा है, खाया है, भोगा है तो भोगने, खाने, देखने के निमित्त अब उसके पास शरीर तो है नहीं। पृथ्वी तत्व नहीं है, जल तत्व नहीं है। तेज, वायु और आकाश तीन तत्वों का है तो उनकी तृप्ति के लिए किया जाता है तो फिर वो भावना से ही तृप्त होते हैं। उसमें वस्तु थोड़ी होती है लेकिन संतुष्टि हो जाती ��ै और फिर उनके लिए भगवान के नाम का जप कीर्तन करते हैं तो और तृप्त होते हैं और उनकी पुण्याई बढ़ती है तो फिर वो पितृलोक में चले जाते हैं।
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#श्राद्ध_महिमा
श्राद्ध करने के आरंभ में और अंत में, इस श्लोक का उच्चारण करने से श्राद्ध की त्रुटि क्षम्य हो जाती है। पितर प्रसन्न हो जाते हैं, और आसुरी शक्तियां, जो छीन लें, वो भाग जाती हैं।
देवताभ्य: पितृभ्यश्च महा योगीभ्य एव च,
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः।
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जिनके घर में श्राद्ध नहीं होता, उनके कुल खानदान में दीर्घ आयुष्य वाली आत्माएं पैदा नहीं होती और सद्बुद्धि वाले छोरे छोरियां जल्दी पैदा नहीं होते और उनके घर में रोग और कलह - कलेश बना रहता है लेकिन जो श्राद्ध आदि सत्कर्म करते हैं तो दशरथ जी करते तो रामजी प्रगट हुए और रामजी भी करते श्राद्ध दशरथ का तो लव और कुश प्रगट हुए, हनुमान जी को भी बांध के दिखा दिया तो इससे दैवी शक्तियां विकसित होती हैं। #AsharamjiBapuQuotes #श्राद��ध_महिमा
ऐसा नहीं है कि मर के जाएंगे और इष्ट के लोक में रहेंगे। ऐसा कोई लोक नहीं है जो नश्वर ना हो और ऐसा कोई शरीर नहीं जो मरने वाला ना हो और ऐसा कोई संयोग नहीं जिसका वियोग ना होता हो। अगर शाश्वत परमात्मा तुम्हारे हृदय में अभी नहीं तो किसी लोक लोकांतर में कब, कौन, मिलेगा ? कल के ऊपर मत रखो। मरने के बाद पर म��� रखो। इसी जन्म में अभी संस्कारों को संस्कृत करके अपने आत्मा को जान लेंगे।
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भगवान रामजी ने पुष्कर में पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। एकनाथ जी महाराज ने पैठण में अपने पूर्वजों का श्राद्ध आयोजन किया था। गीताप्रेस गोरखपुर, कल��याण मैगजीन आती है। हनुमान प्रसाद पोद्दार को एक पारसी आत्मा ने सपने में प्रार्थना किया कि भाई जी ! हमारे पारसी धर्म में श्राद्ध कर्म नहीं करते तो हमारा रूह भटक रहा है। आप मेरे लिए श्राद्ध करिए तो मेरी कोई ऊंची गति हो जाए। #AsharamjiBapuQuotes #श्राद्ध_महिमा
किसी की किडनी कमजोर हो अथवा पेशाब संबंधी तकलीफ हो तो इंजेक्शन, कैप्सूल, ऑपरेशन के चक्कर में मत पड़ो। ये मक्काई के डोड़े हैं ना, सड़कों पे सेकते रहते हैं मक्काई। मक्का समझते हैं ना मकाई के डोड़े। उसका एक पत्ता उतारोगे तो पत्ते और मकाई के दाने के बीच में कुदरत ने उसकी ���ुरक्षा के लिए जटाएं बनाई हैं ! मक्काई डोडे के बाल तो समझ गए तुम। 50 ग्राम मक्काई डोडे के बाल लेकर मसल डाले, 2 लीटर पानी में। धीमी आंच पर पानी उबालते उबालते 1 लीटर बन गया, वो पानी छानकर जिसको भी पेशाब संबंधी तकलीफ हो, किडनी संबंधी तकलीफ हो, उसको पिलाओ तो किडनी अप टू डेट होने लगेगी। पेशाब संबंधी तकलीफें ठीक होने लगेगी।
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संसार में ��ँस मरने के लिए, पशु-योनि में धकेले जाने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ, परमात्म-ज्ञान पाकर मुक्ति का अनुभव करने के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है ।
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अब आप समझना हिंदू धर्म की महानता। ये हमारा स्थूल शरीर है, 27 तत्वों का होता है । जब ये स्थूल शरीर मर जात��� है तो सूक्ष्म शरीर रह जाता है 17 तत्वों का। उसमें पृथ्वी तत्व और जल तत्व नहीं होता बाकी वायु, तेज और आकाश तत्व होता है। उसक��� बोलते हैं प्रेतात्मा। मृतक हुआ और प्रेत कर्म करो। उन्होंने जो देखा है, खाया है, भोगा है। स्थूल शरीर उनके पास नहीं है लेकिन ख्वाइशें तो अंदर होती हैं तो घूमते रहते हैं तो वर्ष में एक दिन, हमारा एक वर्ष बीतता है तो पितृ लोक का एक दिन होता है तो पितृ लोक में तो उनको पहुंचने की गति हुई न हुई तो घूमते रहते हैं तो जब #श्राद्ध_पक्ष आता है, प्रत्येक महीने में भी श्राद्ध कर सकते हैं लेकिन अभी जो श्राद्ध पक्ष आया उसका प्रभाव विशेष होता है।
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#श्राद्ध_महिमा
श्राद्ध करने से फायदा ये है कि जब मरने वाले मां-बाप का श्राद्ध करते हैं , तो जीते जी मां-बाप का आदर करने की भी प्रेरणा मिलती है। ऐसा नहीं कि जीते जी दंगम दंगा और मर जाए तो पहुंचाओ गंगा। औरंगजेब के बाप ने बहुत बढ़िया बात कही शाहजहां ने। औरंगजेब अपने बाप को जेल में डालकर गद्दी पर बैठ गया था। और शाहजहां को पीने तक के पानी की मटकी भी ठीक से नहीं दी। “अरे बूढ़ा पीता रहेगा उसमें टूटी फूटी मटकी में”। कई बार उसने संदेशा भेजा कि और नहीं तो केवल एक मटकी तो भिजवा दे मेरा बेटा है तू, ठंडा पानी तो पी सकूँ, लेकिन नौकरों ने कहा कि जहांपनाह का ���ुकुम नहीं है आपको मटकी मिले। तब शाहजहां ने चिट्ठी लिखी कि धन भागी हैं वे हिंदू ��ि जीते जी बाप की तो सेवा करते हैं, मरने के बाद भी अपने बापों को, दादाओं को खीर खिलाते हैं और तू जिंदे बाप को पानी की मटकी भी नहीं भेजता है कमबख्त ! जय राम जी बोलना पड़ेगा। हिंदू धर्म हित की प्रधानता से चलता है। आने वाले पुत्र और पुत्रियों का भी हित हो और जाने वाले पिता, माता, दादा, परदादा का भी हित हो और अमावस्या के दिन भूले भटके जो प्राणी हैं जिनका कोई श्राद्ध नहीं करता है उनके लिए भी थोड़े तर्पण या ���ो कण अनाज के डाल दिए जाते हैं तो उनको भी तृप्ति मिले ऐसी भावना होती है।
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दुनिया में जो संबंध हैं वे सब एक-दूसरे का शोषण कर सुख लेने के संबंध हैं। सच्���ा संबंध तो परमात्मा का है अथवा तो परमात्मा को पाये हुए उन ब्रह्मवेत्ताओं का है जो तुम्हें सब संबंधों से मुक्त करना चाहते हैं ।
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श्राद्ध में कुशा, काले तिल और तुलसी की महिमा बड़ी भारी है। श्राद्ध में कुशा, काले तिल और तुलसी का उपयोग पितर���ं को तृप्त करता है। श्राद्ध में भोजन आदि से तो पितरों की बाह्य तृप्ति होती है लेकिन प्रीतिपूर्वक भगवन्नाम कीर्तन, भगव�� स्मृति उनको मानसिक तृप्ति देती है।
तुलसी में पिडार्चन होता है, विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। धन - धान्य जिनके पास है वो उस ढंग से करें और जिनके पास नहीं है तो कम से कम साधन से भी श्राद्ध हो सकता है। कोई पितर अथवा कोई सुह्रद रह गया हो तो अमावस्या को उनकी तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जा सकता है।
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#श्राद्ध_महिमा
मान लो मैं किसी जंगल में हूँ अथवा मैं कंगाल हूँ , गरीब हूँ और श्राद्ध के दिन हैं तो अब मैं क्या करूं ? जो कुछ कंद मूल हैं राम जी की नाईं… राम जी ने कंद मूलों से श्राद्ध किया था। अयोध्या में आए तब व्यवस्थित श्राद्ध किया था लेकिन कंद मूल भी नहीं हैं तो हमारा धर���म कहता है चिंता ना करो! पानी का एक लोटा सूर्यनारायण को चढ़ा दो और दोनों हाथ ऊंचे कर दो, आपकी बगल दिखे ऐसे हाथ ऊंचे कर दो, आप हार मान लो कि मेरे पास देने के लिए श्राद्ध की सामग्री नहीं है। देने के लिए मेरे पास अन्न, धन, दक्षिणा नहीं है। फिर भी सूर्य नारायण की साक्षी में हे यमराज! मेरे पिता फलाने भाई, फलाने भाई और उनका यह गोत्र है, आप उनको सुख दीजिए, उनको शांति दीजिए और उनका आशीर्वाद मुझे मिले। आप इतना ��ी करते हैं तो आपकी प्रार्थना से आपके पितरों को संतोष होता है।
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जिस विद्या से तुम्हारे चित्त में विश्रांति नहीं, जिस विद्या से तुम्हें भीतर का रस नहीं आ रहा वह विद्या नहीं, सूचनाएँ हैं । दुःख में डूबना, विरोध में ड��बना या भगवान की स्मृति करके निर्लेप रहना यह अपने हाथ की बात है ।
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सदियों से इस जीव के साथ जुडें हुए लुटेरे विकार इसको उठते-उठते गिरा देते हैं तो उस गिरने से बचने के लिए भगवान के नाम का उच्चारण है । भगवद् नाम उच्चारण कर्म नहीं अपितु पुकार मानी जाती है ।
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आदमी मर जाने के बाद सवा मुहूर्त, सवा दो घंटा, मरा हुआ जीव मूर्छा में रहता है, सूक्ष्म शरीर में। फिर वो जागता है। फिर सोचता है कि क्या हुआ ? कैसे हुआ ? फिर वो मरा हुआ, ये शरीर मरा है और खुद सूक्ष्म शरीर से अपने शरीर को देखता है। घर वाले रोते हैं तो देखता है ,कि कौन आया ? कौन गया ? तीसरा होता है तो कुटुंबी आ जाते हैं, दूर दूर के आ जाते हैं, फलाना कैसे मरा ? ऐसा हो गया सिर में दर्द था, ऐसा हुआ, फलाना हुआ, जो भी निमित हुआ, हार्ट अटैक हो गया, ये हो गया, वो भाई आदमी तो अच्छे थे, भले थे, चलो भगवान उसकी सद्गति करें। वो सब अपने संबंध की जो तातें हैं, वो तोड़ के चले जाते हैं , ताकि ये कहीं भटके नहीं, आगे जाए! उसमें भी रह जाए तो फिर बारहवां किया जाता है। उसमें भी कहीं उसका रह जाए तो बारह महीने में एक दिन उसका श्राद्ध कर देते । ये हिंदू धर्म की बहुत सुंदर व्यवस्था।
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