कट गई झगड़े में साडी रात वस्ल-ए-यार की
शाम को बोसा लिया था सुबह तक तकरार की
जिंदगी मुमकिन नही अब आशिक-ए-बीमार की
छिद गई है बरछियां दिल में निगाह-ए-यार की
ज़हर देता है तो दे ज़ालिम मगर तसकीन को
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की
सोचिए कि मणिपुर के 60 हजार लोग अपने ही राज्य में कैम्पों में रह रहे हैं, और अपने ही देश मिजोरम के लोगों को मणिपुर के मुख्यमंत्री हवाई जहाज से रेस्क्यू करा रहे हैं... ये चायवाले पानवाले को प्रधान चुनने का साइड इफेक्ट है.
@Imakhtar786@margret_017@pankaj_2210@Shabnam44806561 दोनों ही बराबर के हकदार हैं गृहस्थी की गाड़ी चलाने में। एक के सहयोग के बिना दूसरा सक्षम नहीं है कि अकेले सुचारू रूप से हर फर्ज का निर्वाह कर सके। मजबूरी की बात अलग है कि बहुत लोगों को अकेले ही सब कुछ करना पड़ता है पर जिंदगी नीरस हो जाती है।