Remembering the timeless voice of Kishore Kumar on his birth anniversary, whose melodies continue to inspire and enchant generations.
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राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय से 11,000+ उपप्राचार्यों के सेवा हित प्रभावित होने की आशंका ह��। राज्य सरकार से आग्रह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में शीघ्र SLP दायर कर कर्मचारियों के वैध सेवा अधिकार को संरक्षण प्रदान करे।
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राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय से 11,000+ उपप्राचार्यों के सेवा हित प्रभावित होने की आशंका है। राज्य सरकार से आग्रह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में शीघ्र SLP दायर कर कर्मचारियों के वैध सेवा अधिकार को संरक्षण प्रदान करे
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राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय से 11,000+ उपप्राचार्यों के सेवा हित प्रभावित होने की आशंका है। राज्य सरकार से आग्रह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में शीघ्र SLP दायर कर कर्मचारियों के वैध सेवा अधिकार को संरक्षण प्रदान करे।
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राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय से 11,000+ उपप्राचार्यों के सेवा हित प्रभावित होने की आशंका है। राज्य सरकार से आग्रह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में शीघ्र SLP दायर कर कर्मचारियों के वैध सेवा अधिकार को संरक्षण प्रदान करे। dpc
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राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय से 11,000+ उपप्राचार्यों के सेवा हित प्रभावित ह��ने की आशंका है। राज्य सरकार से आग्रह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में शीघ्र SLP दायर कर कर्मचारियों के वैध सेवा अधिकार को संरक्षण प्रदान करे।
प्रार्थना : आत्मा का परमात्मा से मौन संवाद !
प्रार्थना केवल शब्दों का उच्चारण अथवा संकट की घड़ी में की जाने वाली याचना नहीं है; वह आत्मा का परमात्मा से होने वाला पवित्रतम संवाद है। यह वह दिव्य साधना है, जिसमें सीमित जीव अपने अहंकार, भय, चिन्ता, संशय और समस्त मानसिक बोझ का समर्पण करके अनन्त चेतना से जुड़ जाता है। उसी क्षण अन्तःकरण में ऐसी सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति का उदय ह��ता है, जो मनुष्य की दृष्टि, वृत्ति और सम्पूर्ण जीवन-दृष्टिकोण को रूपान्तरित कर देती है।
प्रार्थना का वास्तविक चमत्कार बाह्य परिस्थितियों को बदलना नहीं, अपितु साधक के अन्तःकरण को परिवर्तित करना है। जब अन्तःकरण निर्मल होता है, तब विपत्तियाँ भी साधना का अवसर बन जाती हैं और असम्भव प्रतीत होने वाले मार्ग भी प्रशस्त होने लगते हैं। प्रार्थना मनुष्य के भीतर सुप्त श्रद्धा, धैर्य, विवेक, साहस और आत्मबल को जागृत करती है। उपनिषद् की अमर प्रार्थना है-
"असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय ।।"
मनुष्य की सम्पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का घोष है। यह केवल दुःख-निवारण की याचना नहीं, अपितु असत्य से सत्य, अज्ञान से ज्ञान और नश्वरता से अमृतस्वरूप की अनुभूति की प्रार्थना है।
जीवन में जब भय, तनाव, चिन्ता और निराशा का अन्धकार छा जाता है, तब प्रार्थना ही अन्तःशान्ति का सर्वोच्च आश्रय बनती है। वह मन को स्थिरता, बुद्धि को स्पष्टता और हृदय को विश्वास प्रदान करती है कि परम करुणामय ईश्वर प्रत्येक क्षण हमारे साथ हैं तथा उनकी कृपा सदैव हमारा पथ आलोकित कर रही है।
सच्ची प्रार्थना माँग नहीं, समर्पण है। उसका सर्वोच्च स्वरूप यह नहीं कि मनुष्य अपनी इच्छा पूर्ण होने का आग्रह करे, बल्कि ��ह कि वह कह सके - “हे प्रभो ! आपकी इच्छा ही मेरा परम मंगल है; उसे स्वीकार करने का विवेक, धैर्य और सामर्थ्य प्रदान कीजिए।” यही भाव प्रार्थना को साधारण याचना से उठाकर आध्यात्मिक साधना बना देता है।
भगवान् श्रीकृष्ण का आश्वासन है -
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।।"
अर्थात्, जो अनन्य भाव से परमात्मा का स्मरण करते हैं, उनके योगक्षेम का वहन स्वयं भगवान् करते हैं। अतः श्रद्धा और निष्कपट भाव से की गई कोई भी प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। कभी वह परिस्थितियों को बदलती है, कभी उन्हें सहने की शक्ति देती है, और कभी उनमें निहित ईश्वरीय प्रयोजन का बोध कराती है।
प्रार्थना का सर्वोच्च स्वरूप मौन है। जब शब्द समाप्त हो जाते हैं और हृदय केवल ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करता है, तब वही मौन आत्मा का वास्तविक संगीत बन जाता है। वहीं अहंकार गलता है, ��ृपा अवतरित होती है और साधक अपने वास्तविक स्वरूप के समीप पहुँचता है।
वस्तुतः प्रार्थना परमात्मा को बदलने का प्रयास नहीं, स्वयं को परमात्मा के अनुकूल बनाने की साधना है। जैसे - सूर्य का प्रकाश सदैव विद्यमान रहता है, किन्तु बन्द द्वारों से भीतर नहीं आ पाता, वैसे ही ईश्वरीय कृपा सर्वदा उपलब्ध है; प्रार्थना हमारे अन्तःकरण के द्वार खोलकर उसे ग्रहण करने की पात्रता प्रदान करती है।
जब प्रार्थना क��वल व्यक्तिगत हित तक सीमित न रहकर समस्त सृष्टि के मंगल की भावना बन जाती है, तब वह ऋषियों की सार्वभौमिक चेतना का रूप धारण कर लेती है !
"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।।"
अतः प्रार्थना दुर्बलता नहीं, आत्मबल का जागरण है; पलायन नहीं, परम सत्य की ओर प्रस्थान है। श्रद्धा, समर्पण और निर्मल अन्तःकरण से की गई प्रार्थना मनुष्य को ईश्वरीय ���नुग्रह, आत्मबोध और परम आनन्द की उस अवस्था तक ले जाती है, जहाँ असम्भव सम्भव ��ो जाता है, अशान्ति शान्ति में रूपान्तरित हो जाती है और जीवन स्वयं ईश्वर की करुणा का दिव्य उत्सव बन जाता है।
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Won a Bronze medal at World Championships at Bahrain 🇧🇭
This is my 8th world championship medal after winning consecutively from 2015 (2015, 2017, 2019, 2022, 2024, 2026)
Super proud of my consistency from last 10+ years