कबीर गज़ब है , भारतीय अद्वैत दर्शन किस तरह रग रग में कबीर के घुसा हुआ है, इसकी एक बानगी -
माला जपूं, न कर जपूं और मुख से कहूं न राम !
राम हमारा हमें जपे, और हम पायो विश्राम ..
आगे लिखते हैं -
हर मरे तो हम मरें और हम मरें तो हमरी टले बला
भला हुआ मोरी गगरी फूटी , मैं पनिया भरन से छूटी, मेरे सर से टली बला
( if god dies, then i will also die and if i am dead it would be good in the sense that will get rid of life )
बेचारे श्रीकांत वर्मा 🙏🌹
बहाना श्रीकांत वर्मा का और अंजलि कामदेव (स्मर) को!
हिंदी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली संस्थाएँ भी इतनी असावधान हो सकती हैं कि अपने किसी प्रख्यात लेखक को स्मरण करते हुए काम��ेव को श्रद्धांजलि अर्पित करें!
[स्मर= कामदेव, Cupid, god of love]
मेरी बहन का जब मेडिकल में सेलेक्शन हुआ, उसके पहले दो साल असफल प्रयास थे । पापा नौकरी पेशा थे और तीनों बच्चे बाहर रहकर पढ़ रहे थे तो घर में किसी तरह गरीबी में मां बाप जी रहे थे ।
स्थिति ठीक चलती थी पर परीक्षा के दिनों में पापा को हम बहुत परेशान देखते थे । बेटी को लेकर शहर दर शहर स्लीपर ट्रेन में गर्मी में घूमना , स्लीपर ट्रेन इसलिए क्योंकि
एसी कोच के पैसे नहीं थे । तमाम दिक्कतें । लड़की ज़ात, उसीमें पीरियड शुरु हो जाते थे । खोलकर इसलिए लिख रहा हूं ताकि दिक्कत का अंदाज़ा आपको हो सके ।प्रकट रूप से जो दिक्कतें होती हैं उसके अलावा ऐसी दिक्कते हैं जिसका अंदाज़ा भी आप नहीं लगा सकते यदि आप खुद ही उसी संघर्ष से न गुज़र रहे हों ।
इतने संघर्ष के बाद खबर आती थी , कहीं नहीं हुआ । और अगले दिन से फिर वही संघर्ष शुरु ��
खैर मेरे घर पर ईश्वर की कृपा हुई, मेरी बहन तीसरे साल आलमोस्ट हर जगह टॉप कर गई । वर्द्धा जैसी जगह जहां जेनरल की सिर्फ तीन सीटें होती हैं, वहां भी मेरी बहन टॉप कर गई ।
ये सारा इसलिए बताया क्योंकि एक बच्चे के सेलेक्शन के लिए उसका परिवार घिस रहा होता है । मेरे पापा के पास तो अच्छी नौकरी थी, वो संघर्ष था पर संभालने लायक संघर्ष था । पर कई घरों में इस बात का इंतज़ार होता है कि इस बार सेलेक्शन हो जाएगा तो अच्छा खाना बनेगा । और अच्छे खाने का मतलब सेवन कोर्स मील नहीं है , कुछ मीठा, पनीर की सब्ज़ी ।
तो जो लोग कह रहे हैं 22 लाख बच्चों का एग्जाम कैंसल हुआ , जी न - एक करोड़ लोगों का जीवन आपने बर्बाद किया । ये क्रिमिनल है ।
हर आदमी के संघर्ष का मज़ाक है ।
मेरे बहनोई के पापा दिल्ली में कार्ट पर पानी ��ेचते थे । पचास पैसा ग्लास । मेरे बहनोई वहां से उठकर मेडिकल टॉप किया । तो आप जब इस तरह की कोई चीज़ करते हैं तो तय कर देते हैं कि फिर किसी पानी बेचने वाले का बेटा डॉक्टर न बने । पानी ही बेचे ।
@Sachingupta रैट पॉइजन स्वाद रहित , गंध रहित नहीं होता , जिंक फास्फाइड सहित सभी फास्फाइ�� में तेज लहसुन जैसी गंध पाई जाती है , मछली जैसा स्वाद होता है । उसे तरबूज में मिलाने पर पता क्यों नहीं चला ?
@RebornManish There is diffrence in Mahatma Gandhi's adversaries and Rahul Gandhi's adversaries former's were more civilized. Further Moral ground of Mahatma Gandhi is far far more higher than Rahul Gandhi. ( Rahul Gandhi was part of UPA 1 & UPA 2)
मैं तटस्थ नहीं हूँ।
निष्पक्ष नही हूं।
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सभी सम्मानित अतिथियों को मेरा नमन।
असल में, इस मंच पर इतने चमकते सूर्य एक साथ बैठे हैं, कि सबके तेज का ताप… मुझे जला रहा है।
मैं जानता हूँ कि इस मंच पर खड़ा होने योग्य नहीं हूँ। यह महज आपका बड़प्पन है। मेरी हौसलाअफजाई के लिए आपने मुझे यह जगह दी है।
और जब मैं इस हॉल की ओर देखता हूँ, तो आप ऐसी मोह��्बत भरी आँखों से मुझे निहारते दिखते हैं, कि यह तपिश कम हो जाती है।
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मेरी जो पहचान बताई गई, उससे साफ है कि मैं न तो आदतन लेखक हूँ, न साहित्यकार, और न ही कोई क्रांतिकारी।
हाँ। थोड़ा जिद्दी जरूर हूँ।
और इस जिद को… शब्दों में ढाल लेता हूँ।
मेरी जिद है- अपने परिवार को, अपने परिवेश को, और अपने समाज को, उस राह पर चलते देखने की, जिसका विजन हमें कभी गांधी में…
कभी बुद्ध में मिलता है।
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और जिसका नक्शा उस किताब में दर्ज है,जिसके कवर पर एकता, समानता, न्याय और भाईचारा लिखा है।
हम उसे “संविधान” कहते हैं।
जो हमें रोकता है— चंगेज ख़ान बनने से, सिकंदर बनने से, औरंगजेब बनने से, और गोडसे बनने से।
लेकिन, जब मैं अखबार खोलता हूँ, टीवी देखता हूँ,या सोशल मीडिया पर जाता हूँ। तो उन्हीं का गुणगान मिलता है।
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तब लगता है— यह मेरी तासीर नहीं, यह मेरी शिक्षा नहीं, यह मेरी राह नहीं। और, मे���े बच्चों के लिए यह सही नहीं है।
और जब बात बच्चों की आती है। तो चुप नहीं रहा जाता। मैं लिख देता हूँ।
लिख देता हूँ, जो सच है।
जो उचित है।
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जी हाँ। मैं तटस्थ नहीं हूँ।
निष्पक्ष नही हूं।
सपक्ष हूँ।
मेरा पक्ष है—तथ्य।
मेरा पक्ष है—शांति।
मेरा पक्ष है—निर्माण।
मैं ध्वंस के विरुद्ध हूँ,
झूठ के विरुद्ध हूँ,
और अशांति के विरुद्ध हूँ।
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यह मेरा चयन है।
यह मेरा पक्ष है। और यह नितांत निजी मत ह��� मेरा। लेकिन, देखता हूँ, मैं ऐसा अकेला नहीं हूँ। हर प्रदेश में,हर शहर में, देश के हर को��े में, गाँव और मोहल्लों में, मेरी तरह के लोग हैं।
चुप हैं, परेशान हैं, बेचैन हैं।
कहना चाहते हैं, पर शब्द नहीं मिलते। और कहीं, उन्हें मेरे लिखे में अपनी परछाईं दिखती है। तो वे मुझे अपना लेते हैं।
मेरी बात को आगे बढ़ाते हैं।
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इसलिए, आज इस मंच पर मैं अकेला नहीं खड़ा हूँ। मैं खड़ा हूँ हर उस व्यक्ति की ओर से, जिसने मेरी बात सुनी, उसे आगे बढ़ाया।
कॉपी किया, पेस्ट किया, व्हाट्सएप पर, इंस्टा पर। यह स���्मान, मेरा नहीं, उन सबका है।
आपका है।
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कुछ दोस्तों ने पूछा- “मनीष जी, आपको डर नहीं लगता?”
लगता है भई। क्यों नहीं लगेगा?
डरता सिर्फ वही नहीं- जिसे कौंसिक्वेंस का अंदाजा न हो। या जिसकी सेटिंग हो- ऊपरवाले से।
लेकिन, डरते रहने से जो होगा, वह और भी डरावना होगा। इसलिए, डर के उस बिंदु से आगे बढ़िए। बोलिए। लिखिए। या, जो आपकी बात कर रहा है,
उसके साथ खड़े हो जाइए।
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क्योंकि, खामोशी कभी ब��लाव नहीं लाती। खामोशी, हालात को मजबूत करती है। आज अगर हम चुप रहे—तो कल हमारे बच्चे हमसे सवाल करेंगे।
और उस दिन हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा।
यह वक्त है- डर से नहीं, ज़िम्मेदारी से जीने का। सच बोलना साहस नहीं, जिम्मेदारी है।
डर के इस दरिया के पार, हमें खुद ही चलकर जाना होगा। क्योकि कोई मसीहा नहीं आएगा।
कोई चमत्कार नहीं होगा। जो होगा— वह हमारे बोलने से होगा, हमारे लिखने से होगा,
हमारे साथ खड़�� होने से होगा।
आपकी आवाज़ से होगा…
मेरी आवाज़ से होगा…
हम सबकी आवाज़ से होगा।
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और जब इतनी आवाज़ें, इतनी रोशनियाँ एक साथ उठेंगी- तो अंधेरा टिक नहीं पाएगा।
सूरज उगेगा।
सुबह होगी।
आप सबका आभार।
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और हाँ…
थैंक यू, ज़ुकरबर्ग।
थैंक्यू मोदी जी।
🙏
With @ThePublicIndia