रायपुर से रिश्तों का एक कड़वा सच सामने आया है।
शादी के सिर्फ 4 दिन हुए थे। दुल्हन मायके गई तो पुराना प्रेमी मिला। उसने होटल बुलाया और कहा "वो वाली साड़ी पहनकर आना जो सुहागरात वाली थी"।
सालों का प्यार था, तो वो मान भी गई।
मिलने के बाद दोनों देर तक साथ रहे। जाते समय लड़की हंसकर बोली "अब चलती हूं, देर हो रही"। लड़का उसे घर तक छोड़ भी आया।
घर पहुंचते ही पति का फोन आया। एक ही लाइन बोली "तुम मेरे लिए मर चुकी हो। दोबारा घर आने की कोशिश मत करना। होटल का पूरा वीडियो मेरे पास आ गया है किसी ने भेजा है।"
सफाई देने से पहले ही फोन कट गया। प्रेमी को फोन किया तो नंबर ब्लॉक।
और लड़की वहीं बैठकर अपनी किस्मत को कोसती रह गई।
प्रेमी का नंबर भी ब्लॉक।
बची सिर्फ पछतावा और आंसू।
भर���सा, धोखा और एक गलती... तीनों ने मिलकर एक घर उजाड़ दिया।
दो कश्तियों में पैर रखने वालों का अंजाम अक्सर यही होता है।
@askrajeshsahu नेपाल में पहले भी प्लास्टिक (पॉलीमर) के नोटों का प्रयोग किया गया था, लेकिन वे ज़्यादा सफल नहीं रहे। समय के साथ उन पर छपाई और सुरक्षा फीचर्स घिसने जैस�� शिकायतें सामने आई थीं।
मैंने भी नेपाल के प्लास्टिक के नोट इस्तेमाल किए हैं।
मोदी जी कानून तो बना देते हैं, लेकिन सवाल यह है कि उन कानूनों का पालन कौन कराता है?
कल एक वीडियो देखा, जिसमें छात्रों से जुड़े मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की बात कही गई। यह अच्छी पहल है, लेकिन जब खुलेआम कुछ लोग छात्रों को गालियां दें, अभद्र भाषा का इस्तेमाल करें, धर्म पूछकर अपमानित करें और यहां तक कहें कि "मुझे सरकार के कानून से डर नहीं लगता"—तो सवाल उठना लाजिमी है कि आख��र कानून का डर खत्म क्यों हो गया?
इसी तरह सोशल मीडिया पर भी बिना किसी डर के झूठी और भ्रामक जानकारियां फैलाई जाती हैं। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत सूचना फैलाता है और जांच में वह झूठ साबित होती है, तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
जरूरत सिर्फ फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की नहीं, बल्कि ऐसे न्याय तंत्र की है जहां हर व्यक्ति को यह भरोसा हो कि गलत करेगा तो कार्रवाई निश्चित होगी, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।
गाजियाबाद में जंतर-मंतर जा रहे दो युवकों को कथित तौर पर हिन्दुवादी नेता सत्यम पंडित ने रोका, उनके साथ मारपीट की, गालियां दीं और माफी मंगवाई। किसी भी नागरि�� को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है।
विचारधारा, धर्म या संगठन कोई भी हो—अगर सड़क पर लोगों को रोककर पीटा जाएगा, अपमानित किया जाएगा और डराया जाएगा, तो यह लोकतंत्र नहीं, गुंडागर्दी कहलाएगी।
#Ghaziabad #LawAndOrder #Justice
@askrajeshsahu आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर यदि कभी चर्चा हो भी, तो व्यापक सहमति और शांत माहौल में होनी चाहिए। ऐसे मुद्दों पर जल्दबा��़ी या राजनीतिक टकराव से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
@speak000000 यही नेता चुनाव के सम��� कहते हैं, "हमारी सरकार बनाइए, हम आपके साथ खड़े रहेंगे।"
लेकिन जब जनता और छात्रों के साथ खड़े होने का वक्त आया, तब एक आवाज़ तक नहीं निकली।
वैसे आपको क्या लगता है, धर्मेंद्र प्रधान की जगह सबसे बेहतर विकल्प कौन हो सकता था? या सरकार ने जो फैसला लिया, वही सही है? 🤔
दिल कह रहा है चड्डी ( सायोनी घोष) शिक्षा और दिमाग कह रहा है राघव चड्ढा ?
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के कुछ ही घंटों बाद प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपे जाने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। शिक्षा मंत्रालय देश के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में से एक माना जाता है, क्योंकि इससे करोड़ों ��ात्रों, शिक्षकों और देश की शिक्षा व्यवस्था का भविष्य जुड़ा होता है।
अगर आज प्रदर्शनकारियों पर हमला करने वालों को खुली छूट मिल गई, तो कल यही रवैया किसी छात्र, पत्रकार या आम नागरिक क��� साथ भी दोहराया जा सकता है। कानून का राज तभी कायम रहेगा, जब प्रभावशाली और आम व्यक्ति—दोनों के लिए एक ही नियम लागू हो। लोकतंत्र में संवाद की जगह डंडे और गाली नहीं, बल्कि कानून और संविधान का सम्मान होना चाहिए।