सोनिया विहार-सभापुर वार्ड के साढ़े चार पुस्ता मेन 25 फुटा रोड, सनी बाजार रोड की हालत देखिए। सड़क नहीं, नरक बना दिया है! इसी रास्ते से छोटे-छोटे बच्चे रोज स्कूल जाने को मजबूर हैं।
ये है कपिल मिश्रा जी के विकास की तस्वीर।
ये है सांसद मनोज तिवारी जी के विकास की तस्वीर।
ये है यहाँ के बीजेपी निगम पार्षद के विकास की तस्वीर।
ये है दिल्ली के चार इंजन सरकार के विकास की तस्वीर ।
सोचिए, ये कोई दूर-दराज का क्षेत्र नहीं, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली है। फिर भी बीजेपी की चार इंजन वाली सरकार में बच्चों को स्कूल जाने के लिए ऐसे नरकीय रास्ते से गुजरना पड़ रहा है।
यही है बीजेपी का विकास मॉडल!
@ArvindKejriwal@msisodia@SanjayAzadSln@Saurabh_MLAgk@gupta_rekha@Sanjeev_aap@ipathak25@AtishiAAP
“जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मार जाता है ”
तबेले में चल रहे जिस स्कूल को छिपाने के लिए CJP कार्यकर्ताओं पर हमला हुआ,,
उस स्कूल की तस्वीर आज पूरे हिंदुस्तान ने देख लिया अब तो BBC भी पहुँच गया है !!
देखिए BBC की ये रिपोर्ट 👇
राजस्थान सरकार ने कहा की बिना अनुमति के कोई भी स्कूल भवन में नहीं आ सकता, वीडियो भी नहीं बना सकते है !!
इस पत्रकार ने बिना भवन का स्कूल ढूँढ लिया 😄
ये राजस्थान के डबल इंजन के शिक्षा की हालत है 👇
मध्यप्रदेश में शिक्षक बनने का सपना देखने वाले युवाओं के सामने अब पढ़ाई से पहले फीस का पहाड़ खड़ा कर दिया गया है। शासन ने डीएलएड की वार्षिक फीस स्थान के अनुसार ₹30 हजार से ₹35 हजार निर्धारित की है, लेकिन निजी कॉलेजों में कथित तौर पर डेढ़ लाख रुपए प्रतिवर्ष तक मांगे जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यानी सरकारी दर से चार-पांच गुना तक इंदौर भोपाल, खंडवा और सतना के कॉलेजों से बातचीत में निर्धारित फीस से कहीं अधिक रकम मांगने की बातें सामने आईं। और कमाल देखिए—फीस के नाम भी कितने आधुनिक हैं: डेवलपमेंट चार्ज, प्रैक्टिकल, मेंटेनेंस, स्पेशल अटेंडेंस और न जाने कितने नए शैक्षणिक टैक्स ! रसीद में सरकारी फीस, बाकी रकम अलग रास्ते से—मानो कॉलेज नहीं, कोई निजी टोल नाका कहीं अन्य मदों के नाम पर अतिरिक्त वसूली के आरोप हैं। कबीर ने कहा था— माया मरी न मन मरा, मर-मर गया शरीर। लगता है शिक्षा के बाजार में अब माया भी नहीं मरती, बल्कि हर नए सत्र में नई फीस के साथ जवान हो जाती है। विडंबना देखिए—जिस डीएलएड की पढ़ाई भविष्य के शिक्षक तैयार करने के लिए है, उसी में प्रवेश के नाम पर अभिभावकों की जेब का परीक्षण शुरू हो जाता है। शिक्षक बनना है तो ज्ञान चाहिए, लेकिन निजी कॉलेजों के इस कथित फीस मॉडल में लगता है पहले धन की पात्रता परीक्षा पास करनी होगी। सरकार कहती है शिकायत मिली तो कार्रवाई होगी। सवाल है—जब फीस की दर तय है, फिर तय दर से कई गुना वसूली आखिर किसकी छत्रछाया में हो रही है? शिक्षा सेवा है या शिक्षा का ठेका? सरकार को जांच नहीं, दिखने वाली कार्रवाई करनी होगी।
@schooledump@sanjaygupta1304@Anurag_Dwary@drbrajeshrajput
बालाघाट के बैगा बहुल बिरसा अंचल से आई खबर मध्यप्रदेश के विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। अप्रैल से राशन बंद, आंगनबाड़ियों में रेडी-टू-ईट पोषण आहार बंद, कई जगह पेयजल व्यवस्था ठप, स्वास्थ्य सेवाओं और एंबुलेंस की कमी के आरोप—और इसी बीच बच्चों की मौतों का सिलसिला जारी है। गुरुवार को 5 वर्षीय रिहांश की मौत के बाद आंकड़ा 23 बच्चों तक पहुंचने की बात सामने आई है। चार विभागों की कथित लापरवाही के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब गांवों में बच्चों को समय पर पोषण, साफ पानी और अस्पताल तक पहुंचने के लिए एंबुलेंस तक नहीं मिल रही, तब सरकार किस विकास की तस्वीर दिखा रही है? एक तरफ विज्ञापनों में 2047 का विकसित मध्यप्रदेश, दूसरी तरफ बैगा गांवों में आज भी झिरिया का पानी और पोषण के लिए बंद राशन सरकार एयर एंबुलेंस और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन गरीब आदिवासी परिवारों के लिए सवाल आज भी वही है—बीमार बच्चा अस्पताल तक पहुंचेगा कैसे? 2047 की चिंता बाद में कर लीजिए सरकार, पहले 2026 के बच्चों को बचा लीजिए।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कहते हैं कि हर युवा को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है। बात बिल्कुल सही है—हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं। लेकिन सवाल यह है कि फिर युवाओं के लिए निजी रोजगार के दरवाजे कौन खुले रखेगा? तीन साल में मध्यप्रदेश के 5,374 MSME बंद हो गए और 42 हजार से अधिक रोजगार खत्म हो गए। देश में बंद हुए MSME में अकेले मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी करीब 4.5% बताई गई है। 2025-26 में ही 2,861 इकाइयां बंद हुईं और 21 हजार से ज्यादा रोजगार प्रभावित हुए। यानी एक तरफ सरकारी नौकरी के अवसर सीमित हैं और दूसरी तरफ रोजगार देने वाली छोटी फैक्ट्रियों के शटर गिर रहे हैं। फिर युवा जाए तो जाए कहां?
कबीर का दोहा याद आता है—
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥
सरकार सब्सिडी और निवेश के आंकड़े गिना सकती है, लेकिन असली सवाल रोजगार का है। जिस MSME सेक्टर से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी चलती है, अगर वही कर्ज, बढ़ती लागत, सरकारी देरी और नीतिगत अस्थिरता से दम तोड़ने लगे तो केवल सरकारी नौकरी का विकल्प बताना युवाओं के साथ न्याय नहीं है।सरकारी नौकरी नहीं दे सकते, तो कम से कम रोजगार देने वाले उद्योग तो बचाइए सरकार!
धेगदा के 100 सीटर बालिका छात्रावास को बने 16 साल हो गए, लेकिन छात्राओं की सुरक्षा के लिए बाउंड्रीवॉल आज तक नहीं बन सकी। हैरानी की बात यह है कि दिसंबर 2022 में तत्कालीन कलेक्टर ने अतिक्रमण हटाकर सीमांकन और बाउंड्रीवॉल बनाने के निर्देश दिए थे। सीमांकन हुआ, अतिक्रमणकारियों को नोटिस भी दिए गए, लेकिन चार साल बाद भी न अतिक्रमण हटा और न दीवार बनी। छात्रावास परिसर में बढ़ता कब्जा, कचरा, लकड़ी के ढेर और असामाजिक तत्वों की आवाजाही छात्राओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अधीक्षिका के अनुसार परिसर दिन-ब-दिन छोटा होता जा रहा है सरकार बालिका सुरक्षा और सुरक्षित शिक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन यहां सुरक्षा की पहली जरूरत—चारदीवारी—ही 16 साल से अधूरी है। सवाल सीधा है—जब कलेक्टर के आदेश और सीमांकन के बाद भी सरकारी जमीन सुरक्षित नहीं रह सकती, तो छात्रावास में रहने वाली बेटियां खुद को सुरक्षित कैसे महसूस करें? बेटियों को सुरक्षित परिसर चाहिए, आश्वासन की दीवार नहीं। @collectordhar
निवाड़ी की नर्सिंग छात्रा आरती कुशवाहा की प्रधानमंत्री से गुहार— नर्सिंग करते-करते शादी हो गई, बच्चा भी हो गया… अब क्या बूढ़े हो जाएंगे, कब आएगा रिजल्ट? मध्यप्रदेश की नर्सिंग व्यवस्था की बदहाली अब विद्यार्थियों के धैर्य की सीमा तक पहुंच गई है। निवाड़ी की छात्रा आरती कुशवाहा ने प्रधानमंत्री से भावुक अपील करते हुए लंबित नर्सिंग परीक्षा परिणाम जल्द जारी करने की मांग की है। आरती का कहना है कि पढ़ाई पूरी करने के इंतजार में उनकी शादी हो गई और बच्चा भी हो गया, लेकिन रिजल्ट का अब तक पता नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर वह मानसिक तनाव या डिप्रेशन में जाती हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा? यह सिर्फ आरती की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों नर्सिंग विद्यार्थियों की पीड़ा है, जिनका भविष्य परीक्षा, परिणाम, पंजीयन और प्रशासनिक देरी के बीच अटका हुआ है। सवाल यह है—जो विद्यार्थी कल अस्पतालों में मरीजों की जिंदगी बचाएंगे, आज उनके भविष्य की जिम्मेदारी कौन बचाएगा? प्रधानमंत्री जी, विद्यार्थियों को आश्वासन नहीं, समय पर परीक्षा और परिणाम चाहिए। @INCIndia@INCMP
जयपुर में स्कूल की जांच करने पहुंचे CJP नेता आशुतोष रांका पर हमला किया गया। लात घूंसों से मारपीट की गई, गाड़ियां तोड़ी, जमीन पर गिराकर मारा।
आशुतोष रांका का आरोप है कि ये बीजेपी के लोग हैं। ग्राम प्रधान भू माफिया है सरकारी स्कूल में तबेला खोल रखा है, सच्चाई सामने आने के डर से CJP कार्यकर्ताओं पर हमला करवाया गया।
#CJP #AshutoshRanka #School
भैंस के तबेले में सरकारी स्कूल चलाएंगे लेकिन किसी ने अगर सच दिखाया तो उस पर हमले करेंगे.
ABP न्यूज के हवाले से जयपुर के पास चल रहे सरकारी स्कूल का हाल देखिए
मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी करना अब केवल पढ़ाई का खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह ESB के 'अजीबोगरीब गणित' को सुलझाने की एक अंतहीन पहेली बन चुका है। राज्य सरकार ढोल पीटकर कहती है कि हमने अनुसूचित जनजाति (ST) को 20% आरक्षण का कवच दिया है, लेकिन जब ग्रुप-3 सब-इंजीनियर भर्ती का नोटिफिकेशन आता है, तो यह 'कवच' किसी छलनी जैसा नजर आने लगता है। ST वर्ग का 20% बनाम 'जीरो' का सच ESB की साइट पर मौजूद 42 विभागों के विस्तृत पदों के विवरण को यदि गौर से देखें, तो समझ आता है कि रोस्टर का पालन करना जैसे विभाग की जिम्मेदारी ही नहीं है। नियम के मुताबिक, यदि 100 पद निकलते हैं, तो 20 पद ST के हिस्से आने चाहिए। लेकिन कृषि विस्तार अधिकारी और पंचायत समन्वय अधिकारी की तरह यहाँ भी कई महत्वपूर्ण विभागों के 'नियमित पदों' में ST का कॉलम ऐसा सूना पड़ा है जैसे किसी रेगिस्तान में हरियाली। कई विभागों के नियमित और उच्च पदों (Direct Recruitment) में ST के पद कुल पदों के 5% तक भी नहीं पहुँच पा रहे हैं। आखिर वह 20% का संवैधानिक हक किस फाइल की धूल चाट रहा है? ESB की ग्रुप 3 भर्ती विज्ञापन में फिर रोस्टर विवाद, पीडब्ल्यूडी के 225 में एसटी को केवल 5 पद https://t.co/6uI60mD7QN
प्रदेश में सरकारी स्कूलों के युक्तियुक्तकरण और सांदीपनि स्कूलों में विलय की ऐसी ‘शानदार व्यवस्था’ बनाई जा रही है, जिसमें स्कूल तो पास का बंद हो रहा है, लेकिन पढ़ाई अब कई किलोमीटर दूर जाकर करनी पड़ेगी। सवाल सीधा है—जब एक वोट के लिए मतदान केंद्र गांव-गांव तक बनाया जा सकता है, तो बच्चों के लिए स्कूल क्यों नहीं? कहीं दिव्यांग बच्चा तीन किलोमीटर दूर भेजा जा रहा है, कहीं 450 बच्चों को फोरलेन पार करना पड़ेगा, तो कहीं बारिश में उफनती नदी बच्चों की पढ़ाई रोक देगी। रायसेन में बसें कम पड़ गईं तो नया समाधान निकला—एक दिन छात्र जाएंगे, दूसरे दिन छात्राएं! यानी शिक्षा व्यवस्था भी अब ‘ऑल्टरनेट डे’ पर चलेगी। सरकार शायद मानती है कि स्कूल जितना दूर होगा, शिक्षा उतनी ही ‘गुणवत्तापूर्ण’ होगी। बच्चों की सुरक्षा, दिव्यांगों की सुविधा और बारिश के रास्तों की चिंता शायद फाइलों में ही पूरी हो जाती है। स्कूल बचाने की जगह स्कूल बंद करना आसान है, लेकिन इसका खामियाजा गरीब, ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के बच्चे भुगतेंगे। विकास का मतलब बच्चों को स्कूल से दूर करना नहीं, बल्कि शिक्षा को उनके दरवाजे तक पहुंचाना है।
#jays#the_jays_EXPESS#मिशन_युवा_नेतृत्व
मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा ब्लाक पिछले डेढ़ माह से बच्चों की मौतें हो रही है पूरे सिस्टम पर सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है अब तक 20 से जायदा बैगा आदिवासी बच्चों की मौतें गंभीर चिंता का विषय है जबकि मध्यप्रदेश में में बैगा जनजाति को केंद्र सरकार के द्वारा संरक्षित घोषित किया गया है ऐसे में बैगा जनजाति में एक भी आदिवासी बच्चे की मौत होती है तो पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा होता है महामहिम राष्ट्रपति महोदया द्रौपदी मुर्मू जी से अनुरोध करते है कि मध्यप्रदेश में बैगा जनजाति के बच्चों की हो रही मौतों के मामले पर संवेदनसिलता दिखाते हुवे आपसे हस्तक्षेप करने की अपेक्षा रखते है
_डॉ हिरालाल अलावा
विधायक मनावर
राष्ट्रीय जयस संरक्षक
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महामहिम राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल जी, माननीय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी, माननीय लोक निर्माण मंत्री श्री राकेश सिंह जी, माननीय नेता प्रतिपक्ष श्री उमंग सिंघार जी सहित मुख्य सचिव श्री अशोक बर्णवाल जी, अपर मुख्य सचिव सामान्य प्रशासन श्री संजय शुक्ल जी, प्रमुख सचिव लोक निर्माण श्री सुखवीर सिंह जी, प्रमुख सचिव जनजातीय कार्य श्री गुलशन बामरा जी, प्रमुख सचिव विधानसभा श्री अरविंद शर्मा जी, इंजीनियर-इन-चीफ लोक निर्माण विभाग तथा अध्यक्ष कर्मचारी चयन मंडल से विनम्र अनुरोध है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के आरक्षण से जुड़े इस गंभीर प्रकरण में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
लोक निर्माण विभाग की उपयंत्री (सिविल) भर्ती में 225 पदों के विरुद्ध ST वर्ग को मात्र 05 पद दिया जाना केवल एक भर्ती का प्रश्न नहीं है। इससे पूर्व कृषि विस्तार अधिकारी भर्ती, ग्रुप-2 उपसमूह-4 संयुक्त भर्ती परीक्षा में लगभग 40 विभागों की भर्तियों में आरक्षण एवं रोस्टर संबंधी गंभीर विसंगतियों के आरोप सामने आए थे। पंचायत समन्वय अधिकारी भर्ती में स्वयं विभाग द्वारा रोस्टर त्रुटि स्वीकार करते हुए भर्ती को डिनोटिफाई करना पड़ा था। अब ग्रुप-3 संयुक्त भर्ती परीक्षा में भी अनेक विभागों में ST वर्ग को कहीं केवल एक-दो पद, तो कहीं शून्य पद दिए जाने की स्थिति सामने आई है, जो निष्पक्ष रोस्टर परीक्षण की आवश्यकता को और गंभीर बनाती है। अतः सभी संबंधित संवैधानिक एवं प्रशासनिक प्राधिकारियों से मांग है कि प्रत्येक विभाग का स्वीकृत रोस्टर, रोस्टर बिंदु एवं वर्गवार गणना सार्वजनिक कर स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही अथवा नियम-विरुद्ध कार्रवाई से ST आरक्षण प्रभावित हुआ है तो उसके विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई करते हुए कारणयुक्त आदेश जारी किया जाए, ताकि प्रदेश में सामाजिक न्याय एवं संविधान सम्मत आरक्षण व्यवस्था पर जनता का विश्वास बना रहे।