भाजपा ने तो मीडिया को गोदी मीडिया बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आज तो अमेरिका भी देश में मीडिया की दुर्दशा पर केंद्र सरकार का सरेआम मजाक उड़ा रहा है। वो भी देश के अंदर ही।
180 देशों में भारत को प्रेस फ्रीडम रैंकिंग में 157 पर ला दिया गया है, पर हम यह जानकारी भी भाजपा को नहीं बताएंगे।
लेकिन @yourBabulal जी @BJP4Jharkhand को यह जरूर बताएंगे कि जैसा वह मध्य प्रदेश या अन्य भाजपा शासित राज्यों में पत्रकार बंधुओं के साथ व्यवहार कर लोकतंत्र का उत्सव मनाती है, भाजपा वो करने से बाज आए।
बाकी बात बाबूलाल जी, रघुबर जी से पूछ सकते हैं। वहीं जिसने आपको झारखंड का ........बोला था।
अब क्यूँकि भाजपा अपने B-टीम, J-टीम के लिए खुल कर सामने आ गई है - तो हमें .@SudeshMahtoAJSU जी की चिंता होना स्वाभाविक है।
भाजपा यूज़-एंड-थ्रो में माहिर है। अपने स्वार्थ के लिए भाजपा किसी की बलि देने और लेने में पीछे नहीं रहती।
.@yourBabulal बाबूलाल मरांडी जी को ही देख लीजिए। जब झाविमो में थे, तब हर समाज को साथ लेकर चलने की बात करते थे। सकारात्मक राजनीति, विकास और लोकतंत्र की बातें करते थे।
पर जैसे ही भाजपा में गए - भाजपा उन्ही के श्रीमुख से निकली शब्दों को रोज़ वापस उन्ही से साफ़ करवा रही है। रोज़ अपनी कही बातों, सोच पर लज्जित होते हैं - पर भाजपा में टिकना है तो नफ़रत तो फैलाना ही पड़ेगा।
खैर - 2029 चुनावों से पहले बाबूलाल जी को भी किनारे लगा मार्गदर्शक मंडली में भेज दिया जाएगा।
यही भाजपा की यूज़ एंड थ्रो राजनीति है।
पहले चेहरे चाहिए।
फिर उनके वोट चाहिए।
फिर उनकी आवाज़ चाहिए।
और जब काम निकल जाए - नया चेहरा खोजो, पुराना किनारे करो।
और अंत में पुनः कहना चाहेंगे
.@SudeshMahtoAJSU जी, समय रहते भाजपा का साथ छोड़िए और झारखंडियों का साथ देना शुरू कीजिए।
आपने MMDR विधेयक पर शुरुआत में झारखंड के हित में सच्चा और स्पष्ट स्टैंड लिया था। लेकिन बाद में भाजपा के दबाव में आपको अपने ही कदम पीछे खींचने पड़े।
झारखंड सब देख रहा है।
हम समझते हैं कि ED-CBI के दबाव और डर ने आपको चुप रहने पर मजबूर कर रखा है। लेकिन सुदेश जी, झारखंड की लड़ाई डरकर लड़ने वालों की नहीं है।
जिस धरती ने बिरसा मुंडा को जन्म दिया, वहां का सच्चा झारखंडी डर के आगे झुकता नहीं।
आपसे आज भी उम्मीद है।
भाजपा का दबाव छोड़िए।
दिल्ली की नहीं, झारखंड की आवाज़ सुनिए।
झारखंडियों के साथ खड़े हो जाइए - इतिहास आपको भी याद रखेगा।
PSU बेचा।
बैंक बेचा।
एयरपोर्ट बेचा।
एयर इंडिया बेचा।
रेलवे की जमीन और परिसंपत्तियां निजी इस्तेमाल के लिए दीं।
हाईवे बनाए—फिर वर्षों तक टोल वसूलने के अधिकार सौंप दिए।
जंगल बेचा।
शहर की ज़मीन बेची।
ISRO बेचा
शिपिंग कारपोरेशन बेचा
LIC बेची
नक़ली पेट्रोल बेची
यहाँ तक की बिहार में इन्होंने
शमसान भी बेच दिया।
इसलिए कहा गया है -
- पूत कपूत तो क्यों धन संचय।
भाजपा ने कमाया कुछ नहीं पर देश का सबकुछ बेच दिया।
भाजपा के लिए हर आदिवासी-मूलवासी का सवाल दिमागी नक्सल :
भाजपा की राजनीति में झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, गरीब और अपने अधिकार की आवाज उठाने वाले हर व्यक्ति को संदेह की नजर से देखना एक खतरनाक मानसिकता बन गई है। सवाल यह है कि क्या भाजपा की नजर में हर आदिवासी-मूलवासी, हर झारखंडी और केंद्र की नीतियों पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति ‘दिमागी नक्सल’ है?
चुनी हुई सरकार और उसके मुख्यमंत्री को बदनाम करने के लिए नक्सल जैसे गंभीर शब्दों का राजनीतिक इस्तेमाल भाजपा की हताशा को दिखाता है। झारखंड के लोग लोकतांत्रिक तरीके से अपनी जमीन, जंगल, पानी, खनिज और रोजगार पर अधिकार मांगते हैं। इसे नक्सलवाद कहना झारखंड की जनता का अपमान है।
खनिज पर आंकड़े गिनाने से पहले गांवों का दर्द समझें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेताओं को झारखंड के खनिज पर आंकड़े गिनाने से पहले उन गांवों का दर्द समझना चाहिए, जिनकी जमीन खदानों के लिए गई, जंगल उजड़े और पीढ़ियां विस्थापन झेलती रहीं। सवाल केवल राजस्व या निवेश का नहीं, बल्कि यह है कि खनिज संपदा से झारखंडी जनता को कितना न्याय मिला।
पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के एमएमडीआर संशोधन अधिनियम संबंधी बयान, भाजपा 11 हजार करोड़ रुपये और करों के प्रतिशत की चर्चा करके मूल सवाल से ध्यान भटका रही है। यदि खनिज से राज्य को लाभ मिलता है तो खनन प्रभावित गांवों में आज भी पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और रोजगार की कमी क्यों है? डीएमएफ की व्यवस्था तभी सार्थक है, जब उसका लाभ वास्तव में प्रभावित समुदायों तक पहुंचे।
झामुमो खनन या औद्योगिक विकास का विरोध नहीं करता। हमारी मांग स्पष्ट है—जमीन का सम्मान, जंगल की रक्षा, आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा, स्थानीय युवाओं को रोजगार और खनिज संपदा में झारखंडी हित की प्राथमिकता।
भाजपा को यह समझना होगा कि झारखंड अब केवल खनिज निकालने की भूमि नहीं है। यहां के लोग अपने संसाधनों पर न्यायपूर्ण अधिकार चाहते हैं। इस आवाज को नक्सलवाद कहना बंद कीजिए और झारखंड के दर्द को समझिए।
बाबूलाल मरांडी से कहना है कि राजनीतिक असहमति को नक्सलवाद से जोड़ना आपकी भाषा की कमजोरी है, झारखंड की जनता की नहीं। जनता सब देख रही है और लोकतंत्र में अंतिम फैसला वही करेगी।
@JmmJharkhand
बिहार में उन्माद पसंद भाजपा लोकतंत्र का उत्सव मना रही है।
पहले झारखंड में छात्रों के शांत आंदोलन को @BJP4Jharkhand ने अपने गुंडों और माफियाओं से हाईजैक करवाया, और इतने से इनका मन नहीं भरा तो अब यह।
सुधर जाओ युवा विरोधी भाजपाइयों!
.@yourBabulal जी - क्या इस अत्याचार पर एक शब्द कहने कि हिम्मत है ?
नहीं
क्यूँकि ये छात्र हैं, रांची की तरह बस भर भर कर लाए - आपके कार्यकर्ता नहीं।
संगठन मंत्री को लाइव टेलीकास्ट के लिए नहीं भेजिएगा ?
भाजपा का बयान हताशा और राजनीतिक दिवालियेपन की पराकाष्ठा :
जिन लोगों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और विपक्षी आवाजों को दबाने की राजनीति को देशभर में स्थापित किया, उन्हें झारखंड की लोकतांत्रिक सरकार को नसीहत देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
झारखंड सरकार की तुलना इतिहास की गंभीर त्रासदियों से करना न सिर्फ राजनीतिक दुरुपयोग है, बल्कि भाजपा की बौखलाहट और राजनीतिक कुंठा को भी दर्शाता है। भाजपा को चाहिए कि वह ऐसे अमर्यादित और गैर-जिम्मेदाराना बयानों के बजाय जनता के वास्तविक मुद्दों पर बात करे।
धरना-प्रदर्शन, कानून-व्यवस्था और सोशल मीडिया से जुड़े नियमों को तोड़-मरोड़कर पेश करना भाजपा की पुरानी राजनीतिक शैली है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान प्रदत्त अधिकार है, लेकिन कोई भी अधिकार कानून से ऊपर नहीं है। सरकार का दायित्व है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ कानून-व्यवस्था भी सुनिश्चित करे। प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक दमन बताना पूरी तरह भ्रामक है।
भाजपा नेताओं को पहले अपने शासन वाले राज्यों में लोकतांत्रिक अधिकारों, छात्रों, किसानों और विपक्षी नेताओं के साथ हुए व्यवहार का हिसाब देना चाहिए। दूसरों को लोकतंत्र का प्रमाणपत्र बांटने से पहले भाजपा अपने राजनीतिक इतिहास के पन्ने पलट ले।
जेपीएससी पर भाजपा की राजनीति तथ्यहीन और अवसरवादी..
न्यायपालिका में सरकार की ओर से कौन अधिवक्ता किस स्तर पर पैरवी करेगा, यह पूरी तरह विधिक प्रक्रिया और सरकार के अधिवक्ताओं का विषय है। इसे राजनीतिक षड्यंत्र का रंग देना न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक सवाल खड़े करने की कोशिश है।
अगर भाजपा के पास जेपीएससी मामले में कोई ठोस तथ्य, दस्तावेज या कानूनी आपत्ति है, तो उसे सक्षम न्यायालय के समक्ष रखना चाहिए, न कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए भ्रम फैलाना चाहिए। विद्यार्थियों के हितों के नाम पर राजनीति करने के बजाय भाजपा को यह बताना चाहिए कि उसने उनके भविष्य को लेकर अपने शासनकाल में क्या ठोस कदम उठाए थे।
हेमंत सोरेन सरकार युवाओं, विद्यार्थियों और आम जनता के हितों के प्रति प्रतिबद्ध है। भाजपा की परेशानी यह है कि झारखंड की जनता अब उसकी राजनीतिक बयानबाजी और झूठे नैरेटिव के बजाय विकास, अधिकार और सामाजिक न्याय की राजनीति को समझ रही है।
भाजपा को नसीहत है कि राजनीतिक विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन लोकतांत्रिक विरोध और तथ्यहीन आरोपों के बीच की मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए। भाजपा नेताओं को अपनी भाषा और तथ्यों दोनों पर संयम रखना चाहिए। झारखंड की जनता को नाजी जर्मनी जैसे भयावह ऐतिहासिक संदर्भों से डराने के बजाय भाजपा अपनी नीतियों और अपने काम का हिसाब दे।
भाजपा पड़ोस में महाराष्ट्र में अपनी सरकार के नए फरमान के बारे में जानकारी हासिल कर लें जिसमें कहा गया है कि मराठी नहीं आता - तो चालान कटेगा - महाराष्ट्र में रोजी रोजगार नहीं करने दिया जाएगा। झारखंड समेत अन्य राज्य के निवासी को महाराष्ट्र में अब गाड़ी चलाने के लिए सिर्फ लाइसेंस और परमिट काफी नहीं - मराठी का टेस्ट भी पास करना होगा। पूरा मराठी आना होगा। भाजपा की अब अपनी राजनीति चमकाने के लिए भाषा को भी डर और दंड का औजार बना दिया है। हिंदी का सम्मान कहां गया ? कल तक “एक देश, एक भाषा” की बातें, और आज रोज़गार के लिए आए आम आदमी से भाषा की परीक्षा? भाजपा बताए - क्या अब देश के हर राज्य में रोज़गार करने के लिए पहले वहाँ की भाषा की परीक्षा होगी? भाजपा पूरे देश को टुकड़ों में बाँटने की घृणित राजनीति कर रही है।
@JmmJharkhand
आज प्रोजेक्ट भवन में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग अंतर्गत CAMPA की राज्य प्राधिकरण की गवर्निंग बॉडी बैठक में शामिल हुआ और अधिकारियों को कई जरूरी दिशा-निर्देश दिए।
भाजपा नेताओं को छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीति करने की आदत छोड़ देनी चाहिए :
भाजपा नेताओं को छात्रों के मुद्दों की आड़ में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश बंद करनी चाहिए। जो लोग सत्ता में रहते हुए युवाओं और छात्रों के सवालों का समाधान नहीं कर पाए, वे आज छात्रों के पीछे खड़े होकर राजनीतिक ड्रामा कर रहे हैं। जबकि हकीकत अब पूरा देश जान चुका है कि माननीय मुख्यमंत्री ने छात्रों की सभी मांगों को मान लिया है, छात्र अपने घर लौट चुके हैं और 25 अगस्त को प्रस्तावित कैबिनेट बैठक में कई और महत्वपूर्ण निर्णय सरकार छात्र हित में लेने जा रही है।
भाजपा नेताओं की राजनीति अब इतनी कमजोर हो चुकी है कि उन्हें अपनी राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए छात्रों को आगे करना पड़ रहा है। छात्र-युवा पढ़ाई, रोजगार और अपने भविष्य को लेकर संघर्ष करें, यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उनके आंदोलनों को राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना भाजपा की पुरानी कार्यशैली रही है।
भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी बताएं कि यदि उन्हें वास्तव में छात्रों की चिंता है तो वे छात्रों के बीच जाकर उनके मुद्दों पर सकारात्मक संवाद क्यों नहीं करते? हर प्रशासनिक कार्रवाई को राजनीतिक दमन बताकर माहौल गरमाना और फिर थाने पहुंचकर राजनीतिक प्रदर्शन करना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीति करना है।
कानून अपना काम करेगा और किसी भी मामले में पुलिस को कानून के दायरे में ही कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति पर कार्रवाई को लेकर बिना पूरी जानकारी के पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाना और उसे राजनीतिक रंग देना जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका नहीं है। भाजपा को कानून और लोकतंत्र की दुहाई देने से पहले अपने राजनीतिक आचरण का आईना देखना चाहिए।
भाजपा नेता लगातार ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे छात्रों और युवाओं के बीच भ्रम और टकराव की स्थिति पैदा हो। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर कानून हाथ में लेने या राजनीतिक उकसावे की राजनीति को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
भाजपा की परेशानी यह है कि झारखंड की जनता ने उसकी राजनीति को नकार दिया है। अब कभी छात्रों के नाम पर, कभी युवाओं के नाम पर और कभी कानून-व्यवस्था के नाम पर भाजपा अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश कर रही है। जनता सब देख रही है और समझ रही है कि कौन छात्रों के भविष्य की चिंता कर रहा है और कौन उनके मुद्दों को अपनी राजनीति का ईंधन बना रहा है।
बाबूलाल मरांडी से सवाल है?.. कि यदि भाजपा को सचमुच छात्रों की इतनी चिंता है तो वह यह बताए कि केंद्र की भाजपा सरकार के कार्यकाल में युवाओं के रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े सवालों पर उसने क्या ठोस कदम उठाए? सिर्फ थाने में दो घंटे बैठ जाने से छात्र हितैषी होने का प्रमाणपत्र नहीं मिल जाता।
झामुमो छात्रों और युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करता है, लेकिन किसी भी आंदोलन को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश का विरोध करेगा। भाजपा नेताओं को सलाह है कि छात्रों को आगे करके अपनी राजनीति चमकाने के बजाय खुद मैदान में उतरें और जनता के सवालों का सामना करें।
भाजपा नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर झामुमो से राजनीतिक लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। जनता के बीच जाकर लड़ना है तो भाजपा नेता खुद मैदान में उतरें।
@JmmJharkhand