सुनकर नाम कबीर का, थर-थर कापे काल।
नाम भरोसे जो रहे, उसका होवे न बका बाल।।
भावार्थ :-
कबीर दास जी कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति सच्चे मन से ‘कबीर नाम’ का स्मरण करता है, तो काल (मृत्यु/संकट) भी उसके नाम से काँप उठता है।
जो भक्त ईश्वर के नाम पर भरोसा करके जीवन जीता है, उसका बाल भी बाँका नहीं होता—अर्थात् उस��� कोई विपत्ति, संकट या मृत्यु भी नुकसान नहीं पहुँचा सकती।
🌿 सारांश :-
दोहा बताता है कि नाम-स्मरण (ईश्वर के नाम की शक्ति) अत्यंत प्रभावशाली और रक्षक है।
भक्त जब नाम पर दृढ़ विश्वास रखता है, तब वह भय, संकट और मृत्यु से सुरक्षित रहता है।
परमात्मा का नाम ही सच्ची ढाल और सुरक्षा है।
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📘 शब्दार्थ:
सुनकर नाम कबीर का — कबीर/ईश्वर के नाम का प्रभाव
थर-थर कापे काल — मृत्यु/संकट भी काँप जाता है
नाम भरोसे �� ईश्वर के नाम पर विश्वास रखकर
बका बाल — तनिक भी हानि, एक बाल बराबर भी नुकसान
कदली शीप भुजंग मुख, एक स्वाति गुण तीन।
जैसी संगति बैठिए, वैसा ही फल दीन।।
भावार्थ :-कबीर दास जी कहते हैं कि स्वाति नक्षत्र की वर्षा जब कदली (केला), सीप और साँप के मुँह पर गिरती है, तो तीनों अलग-अलग फल देती हैं—
सीप में मोती बनता है, केले में रस बढ़ता है, और साँप के मुँ�� में वह विष बन जाता है। इसका अर्थ यह है कि एक ही चीज़ अलग-अलग संगति में जाकर भिन्न-भिन्न परिणाम देती है। इसी प्रकार मनुष्य का फल भी उसकी संगति (संग) पर निर्भर करता है।
🌿 सारांश :-यह दोहा बताता है कि संगति मनुष्य के जीवन को बदल देती है—अच्छी संगत अच्छा फल देती है और बुरी संगत बुरा फल।
मनुष्य का स्वभाव, विचार और कर्म उसी दिशा में ढल जाते हैं, जहाँ वह बैठता और जिनका साथ करता है।इसलिए सज्जनों की संगति जीवन को प्रकाशमय बनाती है।
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📘 शब्दार्थ:
कदली — केला
शीप — सीप
भुजंग मुख — साँप का मुँह
स्वाति — स्वाति नक्षत्र की वर्षा
गुण तीन — एक ही वर्षा से तीन अलग गुण
संगति बैठिए — जिस संग में बैठें
फल दीन — वैसा ही फल प्राप्त होता है
#GodMorningSunday ❤️🙏
जब तूं आया जगत में, लोग हंसे तू रोए।
ऐसी करनी न करी, पाछे हंसे सब कोए।।
भावार्थ :-कबीर दास जी कहते हैं कि जब मनुष्य जन्म लेता है, तब संसार के लोग हँसते हैं औ��� वह स्वयं रोता है।कबीर उपदेश देते हैं कि जीवन में ऐसे कर्म करने चाहिए कि मृत्यु के समय आपकी विदाई पर लोग रोएँ और आप प्र��न्नता से संसार छोड़कर जाएँ।अर्थात् जीवन ऐसा जियो कि तुम सबके लिए प्रेम, सदभाव और भलाई का कारण बनो।
🌿 सारांश :-यह दोहा हमें श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देता है—ऐसा जीवन जिसमें सच्चाई, भलाई, सेवा और प्रेम हो।मनुष्य को ऐसे कर्म करने चाहिए कि जाने के बाद भी उसकी याद लोगों के हृदय में सम्मान और प्रेम से बस जाए।
सच्ची सफलता वही है जिसका जीवन दूसरों के लिए उपयोगी बने।
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📘 शब्दार्थ:
जब तूं आया जगत में — जन्म लेने पर
लोग हंसे तू रोए — लोग खुश थे, तुम रोए
ऐसी करनी न करी — ऐसे कर्म मत करना
पाछे हंसे सब कोए — मृत्यु के बाद लोग तुम्हारी हँसी उड़ाएँ/खुश हों
#GodMorningSunday
मन चलता तन भी चले, ताते मन को घेर।
तन मन दोई बसि करै, राई होवे सुमेर।।
भाव��र्थ :-कबीर दास जी कहते हैं कि जब मन व्याकुल होता है, तो शरीर भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ता है। इसलिए सबसे पहले मन को नियंत्रित करना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति अपने तन और मन दोनों को वश में कर ले, तो उसके लिए राई (सरसों का दाना) भी सुमेर (बड़े पर्वत) समान महान बन जाती है—अर्थात् उसका छोटा-सा प्रयास भी महान फल देता है।
🌿 सारांश :-यह दोहा मन की शक्ति और नियंत्रण का संदेश देता है।जो मन पर विजय पा लेता है, वह संसार के हर कार्य में सफल होता है।मन जीत लो—तो कठिन कार्य भी सरल बन जाते हैं। मन हार जाए—तो आसान काम भी असंभव लगते हैं।
📘 शब्दार्थ:मन चलता — मन भटकता है / मन विचलित होता है
तन भी चले — शरीर भी उसी दिशा में चल देता है
ताते मन को घेर — इसलिए मन को नियंत्रित करो
तन मन दोई बसि करै — शरीर और मन दोनों को वश में कर ले
राई होवे सुमेर — छोटा कार्य भी पर्वत जैसा महान बन जाता है
#GodMorningSaturday
मैं मेरा घर जालिया, लिया पलीता हाथ।
जो घर जारो आपना, चलो हमारे साथ।।
भावार्थ :-कबीर दास जी कहते हैं कि मैंने ‘मैं’ और ‘मेरा’ के घर को जला दिया—अर्थात् अहंकार, लोभ और मोह के भावों को समाप्त कर दिया। कबीर आगे कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार और आसक्ति के इस घर को जला देता है, वही मेरे मार्ग का साथी बन सकता है। सच्ची आध्यात्मिकता अहंकार त्यागने से शुरू होती है।
🌿 सारांश :-यह दोहा हमें ��मझाता है कि आध्यात्मिक पथ पर सबसे बड़ी बाधा ‘मैं–मेरा’ का अहंकार है। जिसने स्वयं को मिटा दिया, भीतर के लोभ–मोह को जला दिया—वही मुक्त होकर सत्य और प्रभु के मार्ग पर चल सकता है।
अहंकार से मुक्ति ही मुक्ति का द्वार है।
📘 शब्दार्थ:मैं मेरा घर — अहंकार और मोह का निवास
जालिया — जला दिया / समाप्त कर दिया
पलीता हाथ — हाथ में दीया/आग का पलीता
घर जारो आपना — जो अपने भीतर के अहंकार को जला दे
हमारे साथ — ��ेरे मार्ग का सच्चा साथी
#GurukulShiksha
#GodMorningSaturday
क्या भरोसे देह का, बिनस जाय क्षण माही।
सांस-सांस सुमिर�� करो, और जतन कछु नाही।।
भावार्थ :-कबीर दास जी कहते हैं कि इस नश्वर शरीर पर क्या भरोसा करना—यह तो एक क्षण में नष्ट हो सकता है।
इसलिए मनुष्य को चाहिए कि हर सांस के साथ ईश्वर का स्मरण करे, क्योंकि शरीर, धन और संसार क्षणिक हैं।
सच्चा सहारा क���वल भक्ति और भगवन्नाम है।
🌿 सारांश :-
यह दोहा हमें जीवन की अनिश्चितता और भक्ति के महत्व का बोध कराता है।
जब मृत्यु का समय निश्चित नहीं, तब समय को साधना चाहिए और हर पल ईश्वर स्मरण में बिताना चाहिए।
स्थायी सुख केवल भक्ति, संतोष और सदाचार में है।
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📘 शब्दार्थ:
क्या भरोसे देह का — शरीर पर क्या भरोसा
बिनस जाय क्षण माही — एक क्षण में नष्ट हो सकता है
सांस-सांस सुमिरन करो — हर सांस में ईश्वर का स्मर�� करो
और जतन कछु नाही — और कोई प्रयास ज़रूरी नहीं
#GodMorningSaturday
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर ह���य।
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।।
भावार्थ :-कबीर दास जी कहते हैं कि कभी भी एक छोटे-से तिनके को भी तुच्छ या अपमानित नहीं समझना चाहिए, चाहे वह इस समय पैरों के नीचे ही क्यों न हो।क्योंकि वही तिनका अगर उड़कर आँख में पड़ जाए, तो बहुत अधिक पीड़ा देता है। इसी प्रकार छोटा, कमजोर या साधारण समझकर किसी का अपमान नहीं करना चाहिए—कभी न कभी वही व्यक्ति जीवन में बड़ी सीख या कष्ट दे सकता है।
🌿 सारांश :-यह दोहा विनम्रता, सम्मान और नम्र व्यवहार का संदेश देता है। बड़ा–छोटा कुछ नहीं होता, जीवन कभी भी किसी को ऊँचा उठाकर दूसरों को नीचे दिखा सकता है।इसलिए सभी के साथ सम्मान से व्यवहार करना ही सच्ची बुद्धिमानी है।
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📘 शब्दार्थ: तिनका — छोटा घास का तिनका
कबहुँ ना निन्दिये — कभी तुच्छ न समझो
पाँवन तर होय — पैरों के नीचे पड़ा हो
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े — उड़कर आँख में जा पड़े
पीर घनेरी होय — बहुत तीव्र पीड़ा होती है
🙏🙏 #यथार्थ_गीता_ज्ञान 🙏🙏