🚨 ARMY STANDS FIRM IN HYDERABAD ON THEIR LAND CLAIM
Army personnel at Shaikpet, Jubilee Hills answered in same language after a 2,500-sq-yard plot claimed by Army, was allotted for a Muslim graveyard by Waqf
The Army objected, claiming the land falls under Defence control. The Waqf Board disputes this, saying it is notified Waqf property.
A clear message: Defence land cannot be claimed by simply declaring it Waqf property. 🇮🇳
Yesterday I got a random call!
He asked, आप CA हो ना!
I said yes!
He told that I have some Tax Audit files. Will you certify it?
So I asked will I get books of accounts and proper Audit Documents?
He said no!
I also said no! How can I sign off Audits I have never seen? Books that I have never touched?
But then I realised some young CA might fall for it?
You are signing your membership, your name, your liability on someone else’s mess?
When it unravels, the client vanishes but your signature remains!
To every young CA: CA Certification is not a service you sell over a phone call. Never sign what you haven’t audited!
Has anyone else got calls like this?
@Airtel_Presence@TRAI@Airtel_Presence has no proper customer care.. untrained staff to resolve queries.
In the name of 5g they are selling 3g speed.
Complaint raised on 6th and they say 21st is due date to resolve issues.
They will charge me for 15 days on unused service as well.
@airtelindia@Airtel_Presence
You guys should train your customer care to solve issues. I have network issues in the heart of city and you guys tell me u need 15 days time to reset.
How sensible is it ? 15 days ?
माननीय वित्त मंत्री जी के नाम एक वेतनभोगी नागरिक का खुला पत्र
माननीय निर्मला सीतारमण जी, @nsitharaman
सादर प्रणाम.
मैं इस देश का वह प्राणी हूं जिसे सरकारी भाषा में "करदाता" कहा जाता है और घरेलू भाषा में "तनख्वाह आने से पहले ही गरीब हो चुका आदमी."
आपके कर-विभाग की कृपा से मेरी हालत अब आध्यात्मिक हो चुकी है. पहले मैं कमाता था. अब मैं सिर्फ सरकार के लिए संग्रह करता हूं. तनख्वाह आती है, और उसमें से सौ रुपये में इकतीस रुपये ऐसे निकल जाते हैं जैसे घर में कोई बुजुर्ग बिना पूछे दान-पुण्य कर आया हो. फर्क इतना है कि पुण्य सरकार को मिलता है और आत्मग्लानि मुझे.
आप कहती हैं कि कर देना राष्ट्रनिर्माण है. हम मानते हैं. पर राष्ट्रनिर्माण में हमारा योगदान इतना अधिक हो गया है कि अब अपने घर का निर्माण स्थगित करना पड़ रहा है. बच्चा स्कूल जाए, मां-बाप की दवा आए, मकान की किस्त जाए, गाड़ी में पेट्रोल पड़े, राशन आए, बिजली का बिल भरा जाए इन सबके बाद जो बचता है, उ��े देखकर मन में देशभक्ति अपने आप आंखों में पानी बनकर आ जाती है.
सबसे प्यारी बात तो बचत खाते का ब्याज है. आदमी बड़ी मुश्किल से दो पैसे बचाता है. बैंक उस पर चार-पांच प्रतिशत ब्याज देता है. वह ब्याज भी ऐसा नहीं कि उससे आदमी स्विट्��रलैंड चला जाए. उससे तो अधिकतम वह एक किलो काजू देखकर वापस मूंगफली खरीद सकता है. लेकिन सरकार को उस पर भी प्रेम उमड़ आता है. वह कहती है ... "यह आय है."
माननीय जी, यह आय नहीं है. यह वेतनभोगी आदमी की राख में बची हुई आखिरी गरमी है. आप उस पर भी टैक्स का ठंडा पानी डाल देती हैं.
हमारी तनख्वाह पर टैक्स. सामान खरीदें तो जीएसटी. पेट्रोल भरवाएं तो टैक्स. बीमा लें तो टैक्स. मोबाइल चलाएं तो टैक्स. होटल में चाय पिएं तो ��ैक्स. और अंत में अगर कुछ बच जाए और वह बैंक में पड़ा रहे तो उसके ब्याज पर भी टैक्स. अब तो डर लगता है कि कहीं सरकार सांस लेने पर भी यह न पूछ ले ... "इनहेल किया है, पर आउटपुट दिखाइए."
वेतनभोगी आदमी इस देश का सबसे आज्ञाकारी जीव है. उसकी आय छिपी नहीं रहती. उसका टीडीएस पहले ही काट लिया जाता है. वह चोरी नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी चोरी भी फॉर्म 16 में पकड़ी जाएगी. वह नकद नहीं खा सकता, हवाला नहीं चला सकता, शेल कंपनी नहीं खोल सकता. वह सिर्फ एक्सेल शीट खोलकर अपने खर्चे देख सकता है और चुपचाप दुखी हो सकता है.
आपके बजट भाषण में जब "मध्यम वर्ग" शब्द आता है, तब हम टीवी के सामने सीधे बैठ जाते हैं. लगता है आज कुछ होगा. फिर घोषणा होती है और हमें पता चलता है कि हमारा दुख अगले वित्तीय वर्ष में भी जारी रहेगा.
माननीय जी, मध्यम वर्ग कोई चुनावी स्लाइड नहीं है. वह बस में खड़ा आदमी है. वह देर रात असाइनमेंट पूरा करती लड़की है. वह बुजुर्ग पिता की दवा और बच्चे की फीस के बीच कैलकुलेटर दबाता बेटा है. वह मां है जो गैस सिलेंडर की कीमत देखकर सब्जी में पानी थोड़ा और बढ़ा देती है. वह पत्रकार है जो महंगाई पर खबर लिखकर घर लौटता है और पत्नी से पूछता है ... "इस महीने कैसे चलेगा?"
हम कर देने से भाग ��हीं रहे. हमें देश से शिकायत नहीं है. हमें सिर्फ यह समझ नहीं आता कि ईमानदार आदमी को हर साल यह क्यों सिद्ध करना पड़ता है कि वह अभी भी थोड़ा और निचोड़ा जा सकता है.
कृपया कभी बजट बनाते समय एक वेतनभोगी आदमी की पासबुक भी देखिए. उसमें अर्थव्यवस्था का सबसे ईमानदार डेटा मिलेगा कमाई सीमित, खर्च अनंत, बचत प्रतीकात्मक और टैक्स वास्तविक. आपसे विनम्र आग्रह है कि कभी बचत खाते के छोटे से ब्याज को भी आय मानने से पहले उस आदमी का चेहरा देख लीजिए जो उसे देखकर खुश नहीं होता, बस थोड़ा कम दुखी होता है.
बाकी हम करदाता हैं. देशहित में कटते रहेंगे. बस इतना ध्यान रहे कि कहीं ऐसा न हो कि अगली बार बजट में राहत नहीं, बल्कि वेतनभोगी आदमी की श्रद्धांजलि पढ़नी पड़े.
आपका ही,
एक ईमानदार, थका हुआ और टैक्स-कटा हुआ नागरिक ( जो साल भर टैक्स कटवाकर रिटर्न भरने के दौरान बचत खाते में भी टैक्स कटवाने से दुखी है )