It is tragic that this young man is so dejected by the government’s continued denial and inaction over China’s push into our territory in Arunachal Pradesh that he has resigned himself to his fate and issued a goodbye message to India.
How will the government respond?
▪️Deny that there is Chinese encroachment in Arunachal Pradesh?
▪️Call Meta and suppress this and other such messages?
▪️Find this young man, hound him, harass him and force him to apologise - so that the Prime Minister can then make a midnight reel to “forgive” him?
The truth is that we face a grave danger as a country. And this government cannot address it because it refuses even to acknowledge it - because doing so would expose its own incompetence and lies.
Did India's biggest automakers just take a U-turn on E20 fuel damages?
Days after writing to the @PetroleumMin that E20 fuel was likely causing damage to vehicle parts, @siamindia withdrew its own letter, stating that there was "no cause for concern".
What changed in a week?
अहमदाबाद में प्लेग फैला।
मजदूर शहर छोड़कर भागने लगे। फैक्ट्रियां बन्द होने का खतरा था। सेठो ने दांव खेला- मजदूरी दोगुनी कर दी।
जो केवल पेट और तन भर का कमाते थे, उन्हें उम्मीद दिखी। रुक गए, जान पर खेलकर। चिमनियों से धुंआ नही रुका। प्लेग के बावजूद अहमदाबाद की मिलें चलती रही।
और जब प्लेग खत्म हो गया,
मजदूरी वापस घटा दी गई।
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मजदूरों ��े विरोध किया। गांधी से सहायता मांगी। गांधी ने मलिकों बात की। वे नही माने, तो मजदूरों के साथ बैठकर उन्होंने हड़ताल का आव्हान किया।
मिलें रुक गयी।
अब सेठों ने फिर दांव खेला।
जो मजदूर, हड़ताल में शामिल थे, उन्हें नौकरी से निकालने लगे। मजदूर ��र गए। हड़ताल से खिसक कर वापस काम पर लौटने लगे। अब गांधी ने वो किया..
जो अनोखा था।
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अनशन पर बैठ गए। सेठों के खिलाफ नही, अपने ही उन समर्थकों के खिलाफ, जो मिलो में जाकर वापस काम करने लगे थे। अब मजदूरों को शर्म आयी।
एक एक कर सारे लौट आये।
गांधी ने अनशन तोड़ा।
अहमदाबाद की मिलो की वो हड़ताल, ऐतिहासिक थी। चंपारण में किसानों की लड़ाई लड़ने के बाद, गांधी का यह दूसरा समर था- मजदूरों के लिए।
अपने ही देशवासी सेठों से लड़ गए। धनपतियों को झुकना पड़ा। मजदूरी की नई दरें तय हुई।
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नेहा का यह उदास मुखमण्डल देखकर बुरा लगा।
जिनके संघर्ष के शामिल होने गयी, उन्ही में से किसी ने मुंह पर स्याही फेंक दी। कारण पूछने पर वामपन्थी, देशद्रोही, उमर खालिद समर्थक होने के इल्जाम धर दिये।
लेकिन आंदो��न, एक्टिविज्म, न्याय की लड़ाई में ऐसा अक्सर होता है। कि जिसके लिए आप लड़ते हैं, वही कम्प्रोमाइज्ड हो जाता है।
कारण भय, भ्रम, या लोभ- कुछ भी हो, मगर यह लड़ने वाले के बिलीफ सिस्टम को तोड़ता है।
उदास करता है।
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कभी गांधी ने इसका स्वाद चखा, आज नेहा ने चखा है। लेकिन इस युवा लड़की ने जब संघर्ष, औऱ नेतृत्व की राह, राह चुनी है, तो उसे ऐसे बिट्रियल का से निराश नही होना चाहिए।
कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फल��षु कदाचनम!! 1918 में अहमदाबाद के गांधी की तरह, अपने भीतर की रोशनी पर, अपने उद्देश्य की पवित्रता पर यकीन रखकर वह आगे बढ़ती रहे। यही संदेश है।
और शुभकामनाएं हैं।
ये है UP के बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह, विधानसभा में हिंदी नहीं बोल पा रहे है, और जो कुछ बोल रहे है उससे अर्थ का अनर्थ हो रहा है।
और लोग उम्मीद में है कि ये प्रदेश के करोड़ों बच्चों का भविष्य संवार देंगे !!!
अगर संवेदनाएं शेष है तो इस वीडियो को देखने के बाद आपको गुस्सा आना चाहिए।
देहरादून में दृष्टि दिव्यांग छात्राओं को पर्सनल दिक्कतों के लिए कई कई दिन तक दवाई नहीं मिलती, अच्छा खाना नहीं मिलता और पर्सनल टारगेट करके टॉर्चर किया जाता है। देहरादून में ये वही राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान है जिसमें विगत 20 जून को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू अपना जन्म दिन मनाते हुए भावुक होकर रो पड़ी थी।
यहाँ इन छात्र छात्राओं के लिए न किताबों के लिए आर्थिक मदद, न स्वास्थ्य सुविधाएं, न ट्रेंड इंस्ट्रक्टर और न स्थाई निदेशक। लड़कियों ने शिकायत की है कि डिस्पेंसरी में बदसुलकी भी की जाती है,, हॉस्टल में मिलने वाले खाने से लेकर किताबों के दाम बढ़ने पर भी स्टूडेंट्स ने नाराजगी जताई है, इनका कहना है कि कोई सुनने वाला नहीं कई बार लिखित शिकायत की लेकिन नतीजा शून्य।
@DraupdiMurm@PMOIndia@pushkardhami@priyankagandhi
लाठियाँ चलीं, आँसू गैस चले, पेलेट चले।
अब स्याही चली है।
तारीख़ गवाह है – जो कलम से हारते हैं, वही स्याही फेंकते हैं।
In solidarity and rage with our AISA All India President Neha Bora (@neha_aisa).
ये है भाजपाई तरक़्क़ी की नई हवा… कुछ दिनों पहले ही जिसका उद्घाटन हुआ हो उस सड़क को मरम्मत की ज़रूरत पड़ गई और एक्सप्रेस स्पीड से मरम्मत को सुखाने के लिए पंखे का इस्तेमाल किया जा रहा है ये भी हास्यास्पद है। 2-3 हफ़्ते में ही जिस एक्सप्रेसवे का दम उखड़ने लगा है उस पर चलने का जोखिम कौन उठाएगा?
सवाल ये भी है कि ‘अटल प्रोग्रेस वे’ योजना में ही रहेगा या कभी बनेगा भी… या काग़ज़ों में बनकर उसका ‘हिस्सा-बाँट’ हो चुका है।
भाजपा राज में हुआ हर निर्माण चलता कम है… धँसता, ढहता, गिरता ज़्यादा है।
बड़ी ख़बर-
विज्ञापन के मामले में मोदी से आगे निकले योगी।
मोदी सरकार जहां 11 साल में करीब 6 हज़ार करोड़ खर्च करती है,
योगी सरकार ने सिर्फ 8 साल में 7 हज़ार करोड़ के करीब विज्ञापन पर ख़र्च करके इतिहास रच द���या।
जनता की गाढ़ी कमाई के खर्चे से खुद की ब्रांडिंग का नया मधुमास रच दिया।
अब खुद ही समझ लीजिए कि यूपी की ‘करप्शन सुनामी’ का मीडिया में कवरेज इतना कम क्यूं है?
हिंदू-मुसलमान की भकभका कर जलती हुई लौ, मीडिया की नज़र में मद्धम क्यों है?
News laundry के लिए बसंत कुमार की शानदार रिपोर्ट।