सभ्य भाषा और मर्यादित शब्दावली में अपनी बात लिखने वाले ही फॉलो करें।
अमर्यादित शब्दकोश वाले फॉलो करके एहसान न करें।
मेरी पोस्ट पढ़ने के लिए हाईलाइट देखें🙏
नमस्कार दोस्तों 🙏
बहुत लंबे वक्त बाद X को लोग इन करके पोस्ट कर रहा हूं?
सभी सही सलामत?
दोस्ती सभी की कायम है या नफ़रतों की भेंट चढ़ गये?
वक़्त बड़��� तेजी से बदल रहा है और बाजार नफ़रतों का बड़ी चतुराई से सजाया जा रहा है।
उम्मीद है कि पढ़े–लिखे जागरूक लोग नफरत को हराएंगे।
@R_VEER_SINH वक्त नहीं मिलता हुकुम।
अपने काम में ही इतने व्यस्त रहते है कि चाहकर भी वक्त नहीं निकाल पाते।
बहुत लंबे समय से इच्छा थी एक बार सभी मित्रों से पुनः रूबरू होने की।
सभी मित्रों को ,
बस इतना याद रहे,एक साथी और भी था 😂
क्यूं भई महामंत्री! इतना पर्सनल कैसे हो रिया है?
ओरण तुम्हारे बाप दादाओं की है क्या जो तुम हमें देकर मेहरबानी करोगे?
ओरण का मतलब तो समझता है क्या मंदबुद्धि?
ये हमारे बाप दादाओं और हमारे तार���हार देवी–देवताओं की पवित्र भूमि है।
भाटी पर जितनी खीज करोगे उतने नंगे होते जाओगे।
आखिर इन तख्तियों पर ऐसे स्लोगन लिखने वाले कौन है?
रविंद्रसिंह भाटी के लिए रावण शब्द लिखना सारी हदों को पार कर गया।
भोले–भले लोगों के हाथों में इतनी घटिया स्लोगन लिखी तख्तियां थमाने वाले कौन है??
@immahipalbhati@ashokshera94@dineshbohrabmr@DUM__001
X प्लेटफॉर्म पर कुछ महीने पहले तक अच्छा खासा सफर चल रहा था और काफी अच्छे लोग जुड़ रहे थे।
��ब से इस प्लेटफॉर्म पर दूरी बनाई तभी से धीरे धीरे काफी मित्र अपनी फॉलो रूपी संपत्ति लेकर फरार हो गए।
काफी रोचक लोग है यहां🤣🤣
खैर! बहुत ही आभासी दुनियां है ।
जैसाण धणी के प्रत्येक शब्द में उनके पूर्वजों के बलिदानों से खड़े इस जैसलमेर के दुर्गती की पीड़ा झलक रही है।
आज सबसे ज्यादा कोई दुःखी है तो वो महारावल साहब @crsinghbhati जी है जिनके कंधों पर उनके महान पूर्वजों की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी है।
ऐतिहासिक धरोहरें हमारे पूर्वजों की वीरता, बलिदान और गौरवशाली परंपराओं की अमिट छाप हैं। हर एक पत्थर, हर एक स्तंभ, रणबांकुरों के त्याग और समर्पण की मौन गाथा है। ये वही धरोहरें हैं जिन पर हमें गर्व है, जिनसे जैसलमेर की पहचान है। ऐसे स्मारकों के पुनरुद्धार पर कोई आपत्ति जताना, इस भूमि की अस्मिता से विमुख होने जैसा है।
किन्तु बासनपीर में घटित हुए कल के घटनाक्रम ने सिर्फ पत्थरों को नहीं छुआ, बल्कि जैसलमेर की उस आत्मा को आघात पहुंचाया है, जो सदियों से सामाजिक समरसता, अपनत्व और भाईचारे की मिसाल रही है। यह प्रयास केवल एक छतरी को क्षतिग्रस्त करने तक सीमित नहीं था, बल���कि उसने हमारी सामाजिक एकता और ऐतिहासिक चेतना पर भी चोट की है।
हमें ठहरकर सोचना होगा...क्या हम अपने स्वार्थों और मतभेदों की आड़ में आने वाली पीढ़ियों के बीच ऐसी खाई पैदा कर रहे हैं, जिसे न प्रशासन भर पाएगा, न कोई राजनीति। यदि यह प्रश्न हमारी अंतरात्मा को झकझोरता है, तो उत्तर भी वहीं से निकलेगा....सम्मानपूर्वक पुनर्निर्माण।
मैं मानता हूं कि जैसलमेर की सोच सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, यह वो भावना है जो जाति, धर्म और दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर हर संकट में साथ खड़ी होती है। आज उसी विरासत को संजोने का समय है।
समाज के प्रबुद्धजन, बुजुर्ग, युवा और हर जागरूक नागरिक इस मुद्दे को भावनात्मक नहीं, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी के रूप में देखें। छतरियों का पुनर्निर्माण सिर्फ पत्थरों को जोड़ना नहीं होगा, बल्कि टूटते सामाजिक तानेबाने को भी फिर से गूंथने का कार्य होगा।
सोशल म���डिया पर आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है शांति, संवाद और साझा संकल्प। मुझे पूर्ण विश्वास है कि जैसलमेर के बाशिंदे हमेशा की तरह विवेक, समझदारी और एकता से रास्ता निकालेंगे। इस मुद्दे पर प्रशासन विधिसम्मत कार्रवाई कर समन्वय स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में सभी शांति, संयम बनाएं रखें।
जय जैसाण!
ऐतिहासिक धरोहरें हमारे पूर्वजों की वीरता, बलिदान और गौरवशाली परंपराओं की अमिट छाप हैं। हर एक पत्थर, हर एक स्तंभ, रणबांकुरों के त्याग और समर्पण की मौन गाथा है। ये वही धरोहरें हैं जिन पर हमें गर्व है, जिनसे जैसलमेर की पहचान है। ऐसे स्मारकों के पुनरुद्धार पर कोई आपत्ति जताना, इस भूमि की अस्मिता से विमुख होने जैसा है।
किन्तु बासनपीर में घटित हुए कल के घटनाक्रम ने सिर��फ पत्थरों को नहीं छुआ, बल्कि जैसलमेर की उस आत्मा को आघात पहुंचाया है, जो सदियों से सामाजिक समरसता, अपनत्व और भाईचारे की मिसाल रही है। यह प्रयास केवल एक छतरी को क्षतिग्रस्त करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने हमारी सामाजिक एकता और ऐतिहासिक चेतना पर भी चोट की है।
हमें ठहरकर सोचना होगा...क्या हम अपने स्वार्थों और मतभेदों की आड़ में आने वाली पीढ़ियों के बीच ऐसी खाई पैदा कर रहे हैं, जिसे न प्रशासन भर ���ाएगा, न कोई राजनीति। यदि यह प्रश्न हमारी अंतरात्मा को झकझोरता है, तो उत्तर भी वहीं से निकलेगा....सम्मानपूर्वक पुनर्निर्माण।
मैं मानता हूं कि जैसलमेर की सोच सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, यह वो भावना है जो जाति, धर्म और दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर हर संकट में साथ खड़ी होती है। आज उसी विरासत को संजोने का समय है।
समाज के प्रबुद्धजन, बुजुर्ग, युवा और हर जागरूक नागरिक इस मुद्दे को भावनात्मक ���हीं, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी के रूप में देखें। छतरियों का पुनर्निर्माण सिर्फ पत्थरों को जोड़ना नहीं होगा, बल्कि टूटते सामाजिक तानेबाने को भी फिर से गूंथने का कार्य होगा।
सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है शांति, संवाद और साझा संकल्प। मुझे पूर्ण विश्वास है कि जैसलमेर के बाशिंदे हमेशा की तरह विवेक, समझदारी और एकता से रास्ता निकालेंगे। इस मुद्दे पर प्रशासन विधिस���्मत कार्रवाई कर समन्वय स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में सभी शांति, संयम बनाएं रखें।
जय जैसाण!
मेरा नेता जो कहेगा मैं भी वही कहूंगा
मेरा नेता जिसे स्वीकार करेगा मैं भी उसी को स्वीकार करूंगा।
मेरा नेता ही मेरा मान,सम्मान,स्वाभिमान और फलां फलां फलां है।
आजकल केवल यही चल रहा है।
अरे मूर्खों! जहां तुम्हारा न���ता गलत हो वहां पर उसको उसकी नानी याद क्यों नहीं दिलाते?
@immahipalbhati@PratapPuriJi ये वक्त नसीहत या कमियां गिनाने का नहीं है।
छतरियों को पहले तोड़ा गया और अब उनके प��नर्निर्माण को बाधित करने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया ये सार्वभौमिक सत्य है।
भाईचारा,आपसी सौहार्द,प्रेम और फलां फलां फलां कितना सच है इसका आंकलन बाद में करें तो उचित रहेगा।
@js_rajpurohit10@NarayanBeniwal7 यद्यपि आप जन्मना गुरु है तथापि हमारी राय है कि यहां अपना समय खराब नहीं करें।
यहां नफरतों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं।
मेरी 6–7 महीनों की इस सोशल मीडिया से दूरी इस बात का मेरा निजी अनुभव बयां कर रही है ।