क्यों घरती पर बैठी निढाल,
क्यों सिर पीटती बार बार,
मत रोओ ऐसे ज़ार ज़ार,
काहे का है ये दुःख अपार।
ये हार तुच्छ , वो जीत महान,
जीता है तुमने , आसमान।
उस झोपड़ी से तुम जीती हो,
नलके को तुमने पछाड़ दिया,
१/३ @TheHockeyIndia#womenhockeyindia
खुद की,
और रख देती हूँ मो��़़ कर,
तकिये की नीचे,
कि शायद कभी कोई खोल कर परते पढ़े,
केवल कविता, मेरा नाम नहीं।
अब तो कविताऐं ज़्यादा हैं तकिये में,
कम हो गयी है रूई,
मैंने कहा ना,
मेरी कविता नहीं पढता कोई।
सब है ,
सुख, सम्मान, ख़ुशी, आराम,
सिन्दूरी मांग, आँचल में आसमान,
दोस्त भी है, वही पुराने,
होती भी है,
दुआ सलाम ,राम राम,
कोई नहीं सुख पालना ,
जिसमें मै ना सोई,
पर मेरी कविता,
मेरी कविता नहीं सुनता कोई।
अब तो कभी कभी लिखती हूँ
पढ�� कर सुनती हूँ खुद को,
खुद ही तारीफ करती हूँ ,
@ashish30sharma अपनी लिखी कविता को अपनी आवाज़ दे कर जीवंत कर दिया आपने पंडित जी...... सही भाव कवि की आवाज़ ही दे सकती है......इसका अर्से से इंतज़ार था। धन्यवाद।