राजस्थान में CET व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता: क्या अब 'एक राजस्थान, एक परीक्षा' का समय आ गया है?
क्या राजस्थान की सरकार केंद्र की तर्ज पर भर्ती प्रक्रिया का निर्माण कर य��वाओं को और अधिक सुविधा प्रदान कर पाएगी।
राजस्थान में कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट (CET) लागू होने के बाद से लाखों अभ्यर्थियों के बीच लगातार असंतोष देखने को मिल रहा है। जिस व्यवस्था को भर्ती प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया था, व���ी आज अनेक सवालों के घेरे में है। ऐसे में राज्य सरकार को युवाओं की चिंताओं पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि CET ऐसी परीक्षा बन गई है जिसका आयोजन किसी एक निश्चित भर्ती के लिए नहीं, बल्कि पात्रता तय करने के लिए किया जाता है। इससे अभ्यर्थियों को पहले पात्रता परीक्षा और फिर अलग-अलग भर्तियों की अगली प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि एक ही अभ्यर्थी का समान स्तर की कई भर्तियों में बार-बार चयन हो जाता है। जैसे VDO और पटवारी भर्ती शामिल है।
CET को लेकर एक तथ्य ये भी है कि ये देश में केवल तीन राज्यों में होती हैं। जिसमें राजस्थान, हरियाण और UP शामिल है। तीनों राज्यों में ही इसे लेकर भारी विवाद है।
राजस्थान में अब "एक राजस्थान, एक परीक्षा" जैसी अवधारणा पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए। यदि समान स्तर के पदों के लिए एक सुव्यवस्थित और समयबद्�� परीक्षा प्रणाली विकसित की जाए, तो भर्ती प्रक्रिया अधिक सरल, पारदर्शी और प्रभावी बन सकती है।
युवाओं की अपेक्षा केवल परीक्षा लेने की नहीं, बल्कि एक ऐसी भर्ती प्रणाली की है जो पारदर्शी, निष्पक्ष, समयबद्ध और अवसरों की समानता सुनिश्चित करे। इसलिए राज्य सरकार को CET व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कर विशेषज्ञों, भर्ती एजेंसियों और अभ्यर्थियों से संवाद स्थापित करना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो परीक्षा प��रणाली में सुधार या वैकल्पिक मॉडल अपनाने पर भी विचार किया जाना चाहिए।
राजस्थान का युवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और भरोसेमंद भर्ती व्यवस्था चाहता है। यही समय है जब सरकार युवाओं की आवाज़ सुनते हुए भविष्य की भर्ती प्रणाली को और अधिक प्रभावी तथा पारदर्शी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
महत्वपूर्ण बात ये भी है कि CET से केवल प्रारंभिक परीक्षा को ही एकीकृत किया जा सका है।
प्रदेश के मु��िया @BhajanlalBjp ब्यूरोक्रेसी के मुखिया @svoruganti1466 को इस तरफ जरूर ध्यान देना चाहिए। ताकि प्रदेश के युवाओं को सहूलि��त मिल सके।
@alokrajRSSB @RajCMO
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सर, इस मामले में गलती से विभाग (Department) को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि पूरी चयन सूची RUPA कमेटी ने अपने स्तर पर तैयार और अंतिम रूप दी है।
राजस्थान विश्वविद्यालय में पहली बार पूरी पीएचडी प्रवे��� प्रक्रिया को पूरी तरह केंद्रीकृत (Centralized) कर दिया गया है। पहले मेरिट सूची विभागीय स्तर पर तैयार होती थी, लेकिन अब पूरी प्रक्रिया विश्वविद्यालय स्तर से संचालित की जा रही है।
यहाँ तक कि इंटरव्यू प्रक्रिया में भी DRC की भूमिका समाप्त कर दी गई है। अब इंटरव्यू बोर्ड में केवल विभागाध्यक्ष (Head) और कुलपति (Vice-Chancellor) द्वारा नामित दो सदस्य ही शामिल होंगे। यानी प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े लगभग सभी महत्वपूर्ण ���िर्णय अब विश्वविद्यालय प्रशासन, विशेष रूप से VC के स्तर पर नियंत्रित होंगे।
राजस्थान विश्वविद्यालय का पीएचडी चयन : यह त्रुटि नहीं, शैक्षणिक न्याय की हत्या है
राजस्थान विश्वविद्यालय की समाजशास्त्र की पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में जो तथ्य सामने आए हैं, वे किसी साधारण लिपिकीय भूल, तकनीकी चूक या सूची-संशोधन की निर्दोष कहानी नहीं कहते। वे एक ऐसी प्रशासनिक संरचना की ओर संकेत करते हैं, जिसमें अभ्यर्थी का नाम पहले मेरिट सूची में सम्मानपूर्वक दर्ज होता है, फिर संशोधित सूची में बिना कारण विलीन हो जाता है और अंततः अयोग्य अभ्यर्थियों की सूची में भी उसका कोई अस्तित्व नहीं बचता। यह प्रकरण राजस्थान के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की छवि को धूल धूसरित करता है।
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यह चयन नहीं, अभिलेखीय अपहरण है; यह भूल नहीं, किसी नागरिक की शैक्षणिक अस्मिता को दस्तावेज़ों के अँधेरे में निर्वासित कर देना है।
जैसे एक केस को लें। शिकायत के अनुसार, सुश्री संभावी पंत का आवेदन क्रमांक RUPA1779953243233 पहली सूची में 19वें स्थान पर था। 43 घोषित सीटों के विरुद्ध जारी 78 पात्र अभ्यर्थियों की सूची में उनका नाम स्पष्ट रूप से उपस्थित था। उन्होंने यूजीसी-नेट में 300 में से 200 अंक अर्जित किए। इसके बाद पहली सूची वापस ली गई और 15 जुलाई 2026 को 66 अभ्यर्थियों की नई सूची जारी हुई। इस सूची में उनका नाम नहीं था।
अधिक गंभीर बात यह कि उनका नाम “न���ट एलिजिबल” अथवा दस्तावेज़ की कमियों संबंधी सूची में भी नहीं मिला। यानी विश्वविद्यालय ने उन्हें न योग्य माना, न अयोग्य; उसने उन्हें बस अनुपस्थित कर दिया। कानून में ऐसी स्थिति का कोई तीसरा प्रदेश नहीं होता। कोई अभ्यर्थी या तो पात्र होगा या अपात्र। यदि अपात्र है तो कारण दर्ज होगा। यदि पात्र है तो उसे निर्धारित प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। लेकिन किसी व्यक्ति को दोनों सूचियों से मिटा देना इस बात का संकेत है कि ��िर्णय प्रक्रिया स्वयं अपने कारणों से लज्जित है।
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यूजीसी के Minimum Standards and Procedure for Award of Ph.D. Degree Regulations, 2022 सभी राज्य विश्वविद्यालयों पर लागू होते हैं। विनियम 5 स्पष्ट करता है कि पीएचडी प्रवेश उस पूर्व-प्रकाशित मानदंड के अनुसार होना चाहिए जिसे विश्वविद्यालय ने अधिसूचित किया हो और उसमें यूजीसी के निर्देशों तथा आरक्षण नीति का पालन आवश्यक है।
विश्वविद्यालय को पहले से वेबसाइट पर प्रॉस्पेक्टस जारी कर वि��यवार सीटों, प्रवेश-मानदंड, प्रक्रिया तथा सभी प्रासंगिक सूचनाओं का स्पष्ट प्रकटीकरण करना होता है। जून 2024 से लागू यूजीसी व्यवस्था में नेट के श्रेणी-2 और श्रेणी-3 अभ्यर्थियों के लिए 70 प्रतिशत वेटेज नेट अंकों और 30 प्रतिशत वेटेज इंटरव्यू को दिया जाना है और अंतिम प्रवेश संयुक्त मेरिट पर आधारित होना चाहिए।
लिहाजा, यह कहना पर्याप्त नहीं है कि किसी अभ्यर्थी का नाम संशोधित सूची में नहीं आया। विश्वव��द्यालय को यह बताना होगा कि उसका नेट स्कोर, श्रेणी, पात्रता, सीट-वितरण और संवीक्षा किस नियम के अनुसार परखा गया। यदि कम अंक वाले अभ्यर्थियों को साक्षात्कार सूची में रखा गया और अधिक अंक वाले अभ्यर्थी को बिना कारण बाहर किया गया तो विश्वविद्यालय को श्रेणीवार कटऑफ, आरक्षण रोस्टर, शोध-पर्यवेक्षक की उपलब्धता, सीट-वितरण और संवीक्षा का लिखित आधार सार्वजनिक करना होगा। केवल संशोधित सूची जारी कर देना विधिक उत्तर नहीं है।
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यह दरअसल पेपर लीक से भी अधिक खतरना��� मामला है। क्योंकि पेपर लीक परीक्षा की गोपनीयता को नष्ट करता है। लेकिन पात्रता और मेरिट-सूची में मनमाना हस्तक्षेप परीक्षा के बाद भी अभ्यर्थी के भविष्य को बदल सकता है। पेपर लीक में अपराध बाहर से परीक्षा में प्रवेश करता है; ऐसी सूची-हेराफेरी में अपराध स्वयं संस्थान की मेज पर बैठता है, मुहर का उपयोग करता है और शासकीय भाषा में अपने लिए वैधता लिखता है। पेपर लीक में प्रश्नपत्र चोरी होता है। यहाँ ���भ्यर्थी का नाम, उसकी मेरिट और उसका वैधानिक अवसर चोरी होता है। यह अधिक खतरनाक इसलिए है कि इसकी कोई टूटी तिजोरी नहीं मिलती। कोई वायरल प्रश्नपत्र नहीं मिलता। केवल एक सूची ब��लती है, कुछ नाम सरकते हैं, कुछ गायब हो जाते हैं और पूरा अपराध “संशोधित परिणाम” की शालीन भाषा पहन लेता है।
कानून की दृष्टि में संशोधन कोई जादुई स्नान नहीं है, जिसमें पहली सूची की सारी अनियमितताएँ धुल जाएँ। यदि पहली सूची गलत थी तो यह बताया जाना चाहिए कि उसे किस समिति ने तैयार किया, किसने सत्यापित किया और किसने अनुमोदित किया। ये सारे नाम बाहर आने चाहिए। यदि दूसरी सूची सही है तो हर हटाए गए नाम का ��ारण दर्ज होना चाहिए। और यदि कोई अभ्यर्थी न पात्र सूची में है न अपात्र सूची में तो यह केवल प्रशासनिक अक्षमता नहीं, रिकॉर्ड की अखंडता पर प्रश्न है।
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सच कहा जाए तो यह साफ़ साफ़ प्राकृतिक न्याय का नग्न उल्लंघन है; क्योंकि किसी अभ्यर्थी की पहले स्वीकृत पात्रता को बाद में बिना कारण समाप्त करना तीन बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है: पहला, कारण बताने का दायित्व। प्रशासनिक निर्णय मनमाना नहीं हो ���कता। जिसका अधिकार या अवसर प्रभावित हुआ है, उसे कारण जानने का अधिकार है। ��ूसरा, समानता। समान परिस्थिति वाले अभ्यर्थियों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। कम अंक वाले चयनित हों और अधिक अंक वाला बिना स्पष्टीकरण गायब हो जाए तो अनुच्छेद 14 के तहत मनमानी का प्रश्न उठता है। तीसरा, वैध अपेक्षा।
पहली आधिकारिक सूची में पात्र घोषित अभ्यर्थी को यह वैध अपेक्षा होती है कि उसके विरुद्ध कोई प्रतिकूल परिवर्तन पारदर्शी, तर्कसंगत और अभिलिखित आधार पर ही होगा।यहाँ विश्वविद्��ालय ने मानो एक अभ्यर्थी के नाम पर पहले रोशनी डाली, फिर वही रोशनी बुझा दी और बाद में दावा किया कि वहाँ कोई था ही नहीं। प्रशासन की यह दृष्टि अकादमिक नहीं, सामंती है।
एक सूची 78 कहती है, दूसरी 66—बाकी बारह कहाँ गए?
यदि प्रारंभिक सूची में 78 नाम थे और संशोधित सूची में 66, तो बारह नाम कम हुए। विश्वविद्यालय को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए: इन बारह अभ्यर्थियों के नाम क्या हैं?
प्रत्येक का नाम किस कारण हट��या गया?
क्या उनके विरुद्ध कोई दस्तावेज़गत कमी थी?
क्या आरक्षण रोस्टर बदला?
क्या सीटों की संख्या बदली?
क्या नेट श्रेणी की व्याख्या बदली?
क्या कोई तीसरी सूची भी जारी हुई?
प्रत्येक सूची का अ��ुमोदन किस अधिकारी ने किया?
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यदि “नॉट एलिजिबल” सूची में नौ नाम हैं तो शेष तीन अभ्यर्थियों की स्थिति क्या है? विश्वविद्यालय कोई रहस्य-कथा नहीं लिख रहा कि तीन पात्र धीरे-धीरे कोहरे में गायब हो जाएँ। यह सार्वजनिक विश्वविद्यालय है, जहाँ प्रत्येक नाम के साथ कारण, रिकॉर्ड और उत्तरदायित्व होना चाहिए। मामला दर्ज क्यों होना चाहिए
तत्काल एफआईआर की माँग किसी प्रतिशोध की भाषा नहीं, साक्ष्य-सुरक्षा की आवश्यकता है।
यदि प्रथमदृष्टया यह सामने आता है कि पात्रता सूची में जानबूझकर नाम जोड़े या हटाए गए, रिकॉर्ड बदला गया, मेरिट प्रभावित की गई या अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ अथवा हानि पहुँचाई गई तो यह महज विभागीय गलती नहीं रह जाती। ऐसी स्थिति में निम्न प्रश्न आपराधिक जाँच की माँग कर सकते हैं:
क्या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में बदलाव हुआ?
किस लॉग-इन से सूची संशोधित की गई?
किस अधिकारी ने अंतिम सूची अप���ोड की?
क्या मूल स्क्रूटनी शीट और प्रकाशित सूची में अंतर है?
क्या किसी अभ्यर्थी को अनुचित लाभ दिया गया?
क्या सरकारी रिकॉर्ड में जानबूझकर मिथ्या प्रविष्टि या विलोपन हुआ?
क्या किसी अधिकारी ने अपने पद ��ा दुरुपयोग किया?
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जाँच से पहले किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता, लेकिन जाँच से बचने के लिए इसे “क्लेरिकल एरर” कह देना भी स्वीकार्य नहीं है। जहाँ चयन-सूची और अभिलिखित स्थिति पर संदेह हो, वहाँ संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड, ईमेल, संशोधन-इतिहास, समिति कार्यवाही, नोटशीट, रोस्टर और अनुमोदन फाइल तत्काल सुरक्षित की जानी चाहिए।
प्रश्न है कि विश्वविद्यालय की भाषा इतनी निर्दोष क्यों है? श��क्षणिक प्रशासन की सबसे मोहक चाल उसकी भाषा होती है। वह क्रूरता को कभी क्रूरता नहीं कहता। वह नाम मिटाने को “रिवाइज्ड लिस्ट” कहता है, अवसर छीनने को “स्क्रूटनी” और उत्तरहीनता को “प्रक्रिया प्रचलित है।” लेकिन सुंदर प्रशासनिक शब्दावली अन्याय की दुर्गंध नहीं ढँक सकती। एक अभ्यर्थी ने परीक्षा दी। उसने योग्यता अर्जित की। विश्वविद्यालय ने स्वयं उसे मेरिट सूची में स्थान दिया। फिर उसी संस्थान ने ���से बिना निर्णय, बिना कारण और बिना सुनवाई के सूची से बाहर कर दिया। यह ऐसा है जैसे कोई न्यायालय किसी व्यक्ति को पहले पक्षकार माने, फिर निर्णय से उसका नाम मिटा दे और रजिस्टर में यह भी दर्ज न करे कि उसके साथ हुआ क्या।यह अकादमिक प्रशासन नहीं; यह दस्तावेज़ों के माध्यम से अस्तित्व की हत्या है।
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अब क्या होना चाहिए?
कुलाधिपति और राज्य सरकार को समाजशास्त्र विभाग की संबंधित पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया तत्काल स्थगित करानी चाहिए। विश्वविद्यालय से बाहर के वरिष्ठ शिक्षाविदों, विधि विशेषज्ञ और तकनीकी ऑडिट विशेषज्ञ क��� स्वतंत्र समिति गठित हो।जाँच में कम-से-कम निम्न रिकॉर्ड सुरक्षित और परीक्षण किए जाएँ:पहली और सभी संशोधित सूचियों की मूल डिजिटल प्रतियाँ तथा मेटाडेटा।
प्रत्येक अभ्यर्थी की स्क्रूटनी शीट।
श्रेणीवार सीट-वितरण और आरक्षण रोस्टर।
नेट स्कोर तथा लागू वेटेज का गणना-पत्र।
सूची तैयार करने और अनुमोदित करने वाली समितियों की कार्यवाही।
वेबसाइट पर अपलोड, संशोधन और हटाने के सर्वर लॉग।
हटाए गए प्रत्येक अभ्यर्थी को कारणयुक्त आदेश।
जाँच पूरी होने तक साक्षात्कार या अंतिम प्रवेश आगे बढ़ाना विवादित प्रक्रिया को अपरिवर्तनीय बना सकता है। यदि किसी स्तर पर जानबूझकर हेरफेर, पक्षपात, रिकॉर्ड-परिवर्तन ��ा पद के दुरुपयोग के प्रमाण मिलें, तो जिम्मेदार व्यक्तियों को निलंबित कर विभागीय कार्रवाई के साथ आपराधिक मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
सच कहा जाए तो यह विश्वविद्यालय है, किसी कुलपति या विभागाध्यक्ष का निजी दरबार नहीं। विश्विवद्यालय की कुलपति बीट देखने वाले पत्रकारों से बातचीत करना तक पसंद नहीं करती हैं और अपने अहंकार को लेकर बैठी रहती हैं, जबकि पत्रकारिता विश्वविद्यालय की कुलपति रह चुकी ���ॉ. सुधि राजीव ने अपने कार्यकाल में कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी विवादित से विवादित विषय पर भी बात नहीं की हो या किसी संवाददाता का कॉल नहीं उठाया हो। कितने ही कुलपति हैं, जो संवाददाताओं से खुलकर बातचीत करते हैं। आखिर राजस्थान विश्वविद्यालय की जाती हुई कुलपति अपने पीछे क्या छोड़कर जाएंगी, जिसे याद किया जाएगा?
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राजस्थान विश्वविद्यालय की पीएचडी सीटें किसी की कृपा, निकटता, संकेत या निजी सौंदर्य��ोध की संपत्ति नहीं हैं। वे सार्वजनिक अवसर हैं। प्रत्येक सीट के पीछे संविधान की समानता, यूजीसी के नियम, आरक्षण नीति और अभ्यर्थी के वर्षों का श्रम खड़ा है।किसी युवा शोधार्थी का नाम सूची से मिटाना केवल एक पंक्ति हटाना नहीं है। वह उसके जीवन से संभवतः पाँच वर्ष का शोध, विश्वविद्यालय में प्रवेश, अकादमिक रोजगार और भविष्य की पूरी दिशा छीन सकता है।
विश्वविद्यालय को समझना होगा कि मेरिट-सूची कोई रूमानी पांडुलिपि नहीं, जिसमें लेखक अपनी इच्छा से पात्रों को जन्म दे और मिटा दे। यह विधिक दस्तावेज़ है। इसमें प्रत्येक नाम के पीछे अधिकार है और प्रत्येक विलोपन के पीछे कारण होना चाहिए। यदि एक सूची कुछ और कहती है और दूसरी कुछ और तो इन दोनों के बीच की दरार में केवल तीन अभ्यर्थियों के नाम नहीं गिरे हैं—उसमें राजस्थान विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता, उसकी अकादमिक गरिमा और विद्यार्थियों का भरोसा गिरा है।और भरोसा एक बार गिर जाए तो उसे किसी “संशोधित सूची” से वापस नहीं लाया जा सकता।
@BagadeHaribhau @BhajanlalBjp@DrPremBairwa @VinodJakharIN @ShankarGora
कॉलेज PTI भर्ती-2023: क्या अधूरी जांच से फिर विवादों में घिरेगा RPSC?
कॉलेज PTI भर्ती-2023 को लेकर राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) एक बार फिर सवालों के घेरे में आने की आशंका है। चर्चा है कि शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) के लिए केवल पदों के बराबर मुख्य सूची और एक सीमित आरक्षित सूची जारी की जा सकती है। यदि ऐसा होता है और दस्तावेजों का समुचित सत्यापन बाद के चरण में किया जाता है, तो बाद में किसी अभ्यर्थी के अयोग्य पाए जाने की स्थित�� में पूरी चयन प्रक्रिया अनावश्यक विवादों, रिक्तियों और न्यायिक चुनौतियों में उलझ सकती है। सवाल यह है कि क्या आयोग पिछली भर्तियों से मिले अनुभवों से सीख लेगा या फिर वही पुरानी भूल दोहराने की ओर बढ़ रहा है?
भर्ती प्रक्रिया से जुड़े अभ्यर्थियों का कहना है कि जिन अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए पात्र माना गया है, उन्हें शारीरिक दक्षता परीक्षा में शामिल होने का अवसर दिया जाना अधिक व्यावहार���क और पारदर्शी व्यवस्था होगी। इसके बाद नियमों के अनुरूप दस्तावेजों का गहन सत्यापन कर अपात्र अभ्यर्थियों को बाहर किया जाए। इससे य���ग्य उम्मीदवारों का अधिकार सुरक्षित रहेगा और बाद में सूची में फेरबदल की नौबत भी नहीं आएगी। भर्ती का उद्देश्य केवल सूची जारी करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष चयन सुनिश्चित करना होना चाहिए।
सूत्रों के अनुसार, इंटरव्यू तक पहुंचे कुछ अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता और दस्तावेजों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यदि ऐसे मामलों की समय रहते विधिवत जांच नहीं की गई और सीमित संख्या में ही अभ्यर्थियों क�� PET के लिए बुलाया गया, तो बाद में अपात्रता सामने आने पर योग्य अभ्यर्थियों का नुकसान हो सकता है। ऐसे में आयोग के लिए यह आवश्यक है कि वह नियमों के अनुरूप पहले दस्तावेजों की पूर्ण जांच सुनिश्चित करे और उसके बाद आगे की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे, ताकि पूरी भर्ती कानूनी रूप से मजबूत और विवादमुक्त बनी रहे।
आयोग की साख निष्पक्ष और पारदर्शी चयन प्रक्रिया से बनती है, जल्दबाजी से नहीं। यदि हर चरण नियमों के अनुरूप और समय पर पूरा किया जाए तो न अदालतों के दरवाजे खटखटाने की नौबत आएगी और न ही योग्य अभ्यर्थियों को अपने अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। आखिर भर्ती प्रक्रिया का उद्देश्य उम्मीदवारों की परीक्षा लेना है, धैर्य ��र न्याय व्यवस्था की नहीं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आयोग दूरदर्शिता दिखाता है या फिर एक और भर्ती को विवादों की दहलीज तक पहुंचने देता है।
@RPSC1 @BhajanlalBjp @RajCMO
मेडल के वक्त 'देश का गौरव'... और हक़ मांगने पर 'फाइल विचाराधीन'। अगर खिलाड़ियों का सम्मान सिर्फ फोटो, माल्यार्पण और बधाइयों तक ही सीमित रह जाए, तो यह सम्मान नहीं, औपचारिकता कहलाएगी। असली सम्मान तब होगा, जब पदक विजेताओं को उनका अधिकार समय पर मिले।
@BhajanlalBjp@RajCMO
पत्र के बाद फिर पत्र लिखा गया...लेकिन RPSC में कथित धांधली को लेकर मुख्यमंत्री @BhajanlalBjp को पूर्व में लिखे पत्र का क्या हुआ? बजट सत्र से पहले लिखा गया था पत्��
इस पत्र का लगता है क्या कुछ होगा?
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हाईकोर्ट के आदेश के दो महीने बाद भी नहीं मिली जॉइनिंग, 11 मई 2026 को नियुक्ति देने का दिया था आदेश, वरिष्ठता सहित...
#SachBedhadak#RajasthanHighCourt@Kunal_Alwar