बंधुआ मज़दूर ने रो-रो जो
बताया, सुनक��� कांप जाएंगे
UP News: मामला यूपी के मुज़फ्फरनगर का है, जहां 12,000 रुपये महीना, दिन में तीन बार चाय और खाने का वादा करके मज़दूरों को लाया गया. लेकिन बाद में उन्हें बंधुआ मज़दूर बना लिया गया.
एक मज़दूर का कहना है कि उसके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था. रोते हुए उसने बताया कि उसे दिन में सिर्फ़ एक बार खाना मिलता था, जिसमें नमक के साथ चोकर की रोटी दी जाती थी. उसका आरोप है कि मालिक ने बेल्ट से पीटकर उसके कान तक काट दिए थे.
मज़दूरों की निगरानी के लिए कुत्ते रखे गए थे, ताकि कोई भाग न सके. जब मालिक किसी शादी समारोह में शामिल होने के लिए शहर से बाहर गया, तब किसी तरह यह मज़दूर वहां से भाग निकलने में सफल हुआ.
सुनिए उसकी पूरी कहानी...
मुज़फ्फरनगर में मजदूरों की बंधुआ मजदूरी का मामला बेहद चौंकाने वाला है।
बिना मज़दूरी दिए काम करवाने के अलावा, मजदूरों को कुत्तों से कटवाया गया, भाले से गोदा गया, कोड़े मारे गए, और उन्हें मवेशियों का चारा खिलाया गया। यह इंसानी गरिमा पर हमला है - पीड़ितों को न्याय के साथ पुनर्वास और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
साथ ही हमें यह भी पूछना ज़रूरी है कि मज़दूर ऐसी खतरनाक परिस्थितियों में किन मजबूरियों में फंस जाते हैं।
जब रोज़गार ख़त्म हो जाते हैं, आमदनी ठहर जाती है, और सबसे कमज़ोर वर्गों के लिए बने मनरेगा और श्रम कानूनों ��ैसी सुरक्षाएं कमज़ोर कर दी जाती हैं, तो हताशा बढ़ती जाती है। जिन लोगों के पास कोई और विकल्प या सुरक्षा नहीं होती, वो ऐसे शोषण का आसान शिकार बन जाते हैं।
यह कोई आम आपराधिक घटना नहीं है - यह एक धराशाई हुई अर्थव्यवस्था का मलबा है।
विचारधारा गई तेल लेने, जाति सर्वोपरि है!
तभी तो फणीश्वरनाथ रेणु ने ठीक ही कहा था कि -
जाति बहुत बड़ी चीज़ है। जात-पात नहीं माननेवाले की भी जाति होती है।
क्या बेहतरीन मुद्दा उठाया है आपने,
मैं तो कह रहा हूं कि मेहमानों को घर आने से मना कर देना चाहिए,
इससे पानी की बचत, पेट्रोल की ब��त, खाना बनाने में गैस की बचत, और समय की बचत भी होगी।
यहां 200 करोड़ चंदे का हिसाब नहीं मिल रहा है, चांदी की ईंटें नहीं मिल रही हैं, ये एक घूंट पानी बचा रही हैं।
ग़ुलामी! जानते हैं क्या होती है? इस विडीओ में समझ आएगा।
समस्या भाषा नहीं है, नरेंद्र मोदी अंग्रेज़ी नहीं बोल पाते, इसलिए हिन्दी बोल रहे हैं और अनुवादक अंग्रेज़ी में बोल रहा है, यहाँ तक कोई दिक़्क़त नहीं है।
दिक़्क़त है शब्दों में, दिक़्क़त है बॉडी लैंग्वेज की, दिक़्क़त है राग-दरबारी गाने से। आमतौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति को 'मिस्टर प्रेसिडेंट' कह कर सम्बोधित किया जाता है। लेकिन यहाँ ���रेंद्र मोदी उन्हें बार-बार 'एक्सेलेन्सी' कह रहे हैं। ये है सबसे बड़ी ग़ुलामी की निशानी।
अब आते हैं शब्दों पर। नरेंद्र मोदी, डॉनल्ड ट्रम्प की किस बात के लिए भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे हैं? पूरी दुनिया में तहलका मचाने के लिए? पश्चिमी एशिया में कौन सी शांति स्थापित की ट्रम्प ने, जिसकी नरेंद्र मोदी इतनी तारीफ़ किए जा रहे हैं?
हमारे नाविक मारे गए, उसके लिए इतने मीठे शब्दों में अनुनय-विनय? कि उनकी जान की रक्षा महत्वपूर्ण है? माना कि डिप्लोमैटिक बात��ीत में आप किसी का कॉलर नहीं पकड़ सकते, लेकिन इतना घिघियाया भी नहीं जाता। आपको बोलना चाहिए था कि भारत शान्ति का पक्षधर ज़रूर है, लेकिन भारत की सेनाओं ने चूड़ियाँ नहीं पहन रखी हैं। अमेरिका की ऐसी कोई भी धृष्टता, हमारे सम्बन्ध हमेशा के लिए चौपट कर सकती है।
आप हाथ में पर्ची लिए एक-एक लाइन डर-डर के बोल रहे हैं, आपका हलक़ सूखा जा रहा है। बुला लीजिए किसी बॉडी लैंग्वेज एक्स्पर्ट को, और पूछिए उससे कि क्��ा ये विडीओ देख कर ऐसा नहीं लग रहा है कि शहंशाह के दरबार में बैठा एक मुलाज़िम, उस शहंशाह की शान में क़सीदे पढ़ रहा है?
पुराने ज़माने में अगर बादशाह सलामत किसी को चाकू फेंक कर मारें और निशाना चूक जाए तो दरबारी कहते थे कि 'ख़ंजर ने ना-फरमाबरदारी कर दी' मतलब चाकू ने महराज के आदेश की अवहेलना की है। आप भी कुछ वैस�� करते नज़र आ रहे हैं।
@narendramodi जी, पूरी दुनिया में एक सनकी ने जीना हराम कर रखा है, और आप उसे 'शान्ति के प्रयासों' के लिए धन्यवाद कर रहे हैं?
बेहद शर्मनाक है ये!
मोदी जी आपके फ्रेंड ट्रम्प के देश अमेरिका में भारत की शान “तिरंगा झंडा” फाड़ा जा रहा है।
क्या आप इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ेंगे?
कभी ट्रम्प भारत को नरक बोलता है कभी उसके देश में हमारे “तिरंगे” का अपमान होता है।
आप कब बोलोगे?
ट्रम्प के लिए पूजा करने वाले अंधभक्तों तुम भी देखो।
पूरी कोशिश चल रही है कि मुख्य मुद्दे से जनता का ध्यान डाइवर्ट कर दिया जाए….
आज की तारीख़ में शिक्षा क्षेत्र में जो हो रहा है उस पर नज़र रखिए….
पीएम या शिक्षा मंत्री से सवाल पूछिए …जवाब, ज़िम्मेदारी और हालात बदलने की कूवत उन्हीं के पास है..
चवन्नी फ़र्क़ नहीं पड़ता कि दो तीन महीने पहले पुतिन से किसने क्या सवाल पूछा…
भटकिए मत
जिसने वर्षों तक पत्रकारिता को TRP, प्रोपेगेंडा और सत्ता के पक्ष-विपक्ष की लड़ाई में बदल दिया हो, उसे शिक्षकों को 'धंधेबाज' कहने से पहले आत्ममंथन करना चाहिए।
शिक्षा में गलत लोग भी हैं।
लेकिन पत्रकारिता में भी हैं।
राजनीति में भी हैं।
व्यापार में भी हैं।
तो क्या कुछ गलत लोगों के कारण पूरे शिक्षक समाज को "दो कौड़ी का" कह दिया जाएगा?
anjana शिक्षक का सम्मान कमाने में वर्षों लगते हैं।
भर्तियाँ अटक रही थीं,
लाखों युवाओं की उम्र निकल रही थी,
तब आपके स्टूडियो की आवाज़ कहाँ थी?
शिक्षकों ने पैसे लेकर शिक्षा दी है।
लेकिन पैसे लेकर किस�� राजनीतिक दल का प्रवक्ता बन जाना,
व्यवस्था की हर गलती पर पर्दा डालना,
और जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाना...
यह सिर्फ पत्रकारिता का पतन नहीं,
बल्कि अपने पेशे के साथ गद्दारी है।
शिक्षक फीस लेकर ज्ञान देता है,
मेहनत करवाता है,
बच्चे का भविष्य बनाता है
शिक्षकों ने पैसे लेकर पढ़ाया है,
देश के लाखों युवाओं को रोजगार तक पहुँचाया है।
लेकिन गलत को सही और सही को गलत साबित करने की कीमत लेकर काम करना,
समाज और लोकतंत्र दोनों के साथ विश्वासघा��� किसने किया ?
~NEET पेपर लीक - कोई आवाज नहीं
~पेट्रोल डीजल मंहगा - कोई आवाज नहीं
~रुपया की गिरावट - कोई आवाज नहीं
~भयानक मंदी की आहट - कोई आवाज नहीं
~नौकरी पर खतरा - कोई आवाज नहीं
लेकिन "मेलोडी टॉफी" पर सुबह से हंगामा काटे हुए हैं।
पता नहीं क्या मजबूरी है इनकी, जो इनको शर्म भी नहीं आती है?
विपक्ष नकारा हो तो सत्ता पक्ष आजाद रहता है -
1- गैस के दाम 993 रुपए बढ़े
2-छोटू सिलेंडर 261 रुपए बढ़ा
3- पेट्रोल डीजल के दाम बढ़े
4- सीएनजी के दाम बढ़े
5- सोना चांदी बढ़ा
6- डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा
लेकिन फिर ��ी विपक्ष दबाव नहीं डाल पाया, इससे घटिया विपक्ष आज तक नहीं देखा।
पेट्रोल डीजल और सोना कम खरीदने की अपील से पहले आपको ये सब करना था -
1- आप कोई भी रैली नहीं करते
2- सभी राज्यों के मुख्यमंत्री विधायक को रैली के लिए नहीं बुलाते
3- सांसदों के फ्री विदेश यात्रा में रोक लगा देते
4- गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन वर्चुअल करते, 3000 बसे नहीं बुलवाते
5- जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन वर्चुअल करते
6- विधायकों सांसदों को फ्री पानी बिजली सब बंद करते
7- सुधीर चौधरी का 14 करोड़ वाला पैकेज बंद करते
8- चुनाव में फ्रीबीज का वादा न करते
9-मुख्यमंत्रियों को हेलिकॉप्टर में उड़ने पर प्रतिबंध लगाते।
लेकिन नहीं, आप सोचते हैं कि बस जनता ही सारी कुर्बानी दे, नेता मौज काटें।
मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे - सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो।
ये उपदेश नहीं - ये नाकामी के सबूत हैं।
12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है - क्या ख़रीदे, क्या न ख़रीदे, कहां जाए, कहां न जाए। हर बार ज़िम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि ख़ुद जवाबदेही से बच निकलें।
देश चलाना अब Compromised PM के बस की बात नहीं।
कल कहीं पढ़ रहा था कि आपका रिटायरमेंट आराम से कटे तो 40 करोड़ होने चाहिए! अब ये असमानता देखिए इस पिकअप वाहन में जिसमें 10 लोग भी मुश्किल से खड़े हो पाए 45-46 मजदूर खड़े थे टक्कर हुई 16 की मौत हो गई जिसमें कई बच्चे भी हैं ...क्या मजदूर खबर हैं??
मध्य प्रदेश में आदिवासी 11 दिन से कीचड़ में लिपटकर , भूखे रहकर , लाशों की तरह लेटकर विरोध कर रहे हैं।
मांग भी कोई बहुत बड़ी नहीं है ...
घर छीना है तो घर दो, जमीन छीनी है तो जमीन दो।
लेकिन सरकार के लिए गरीब शायद इंसान नहीं, बस हटाने लायक बाधा हैं।
जो लोग हजारों साल से जंगल-जमीन के साथ जी रहे थे , उन्हें अब बताया जा रहा है कि
भाई , विकास आ गया है… अब तुम साइड हो जाओ।
ओडिशा में बहन ���ा कंकाल लेकर बैंक पहुंचा शख्स, कंधे पर लेकर 3 किलोमीटर पैदल चला ... बैंक कर्मचारियों ने कहा था ... जिसका खाता है, उसे लेकर आओ।
भारत अब सचमुच डिजिटल हो चुका है ... यहाँ आदमी मर सकता है, पर सिस्टम की फाइल में जीवित होना चाहिए। यहाँ बहन कब्र में दफन हो सकती है, पर बैंक के सर्वर पर उसे स्वयं उपस्थित होना पड़ेगा। यहाँ मृत्यु प्रमाण पत्र से ज्यादा ताकतवर है क्लर्क की कुर्सी।
जीतू मुंडा अपनी बहन का कंकाल लेकर नहीं गया था, वह इस देश की उस संवेदनहीन व्यवस्था का एक्स-रे लेकर गया था, जिसमें इंसान की सांस से ज्यादा महत्व फॉर्म के कॉलम का है।
बैंक वालों ने शायद सोचा होगा ... ग्राहक सेवा हमारी प्राथमिकता है, बस ग्राहक ज��िंदा होना चाहिए। यह वही भारत है जहाँ सरकारें गरीबों के लिए योजनाओं के विज्ञापन में मुस्कुराती हैं, पर गरीब अगर अपना ही पैसा मांग ले, तो उससे कहा जाता है... पहले मृतक को साथ लाइए।
कब्र से निकला कंकाल दरअसल एक बहन का नहीं था, वह सरकारी करुणा का ढांचा था, जो वर्षों पहले मर चुका है। जीतू अनपढ़ था, ऐसा कहा गया। सच तो यह है कि वह अनपढ़ नहीं था वह इस ��्यवस्था के असली पाठ को पढ़ चुका था। उसे समझ आ गया था कि यहाँ कागज़ आदमी से बड़ा है, और दस्तखत इंसानियत से। इस देश में आदमी की पहचान आधार कार्ड से है, और आत्मा की पहचान बैंक पासबुक से।
अब अगली बार क्या होगा? पेंशन के लिए बुजुर्ग अपनी अस्थियाँ लेकर लाइन में लगेंगे? यह घटना खबर नहीं है, यह भारतीय प्रशासन की चिता से उठता धुआँ है और सबसे बड़ा सवाल कंकाल बैंक में देखकर अफरा-तफरी क्यों मची? सिस्टम तो वर्���ों से खुद कंकाल हो चुका है। उसे अपने ही चेहरे से डर लग गया क्या?
ये हमारे सरकारी अस्पताल, ये हमारी स्वास्थ्य सेवा ... लड़खड़ाती, लंगड़ाती ... मैं अक्सर पूछता हूं क्या मध्यप्रदेश में कोई स्वास्थ्य मंत्री है ... ?? मरीज को जो व्हीलचेयर दी गई वो अस्पताल परिसर में ही बैसाखी खोजने लगी!
इस मां की चीख से कलेजा फट जाएगा, सतना में 11 साल के मासूम शिवराज की हत्या सिर्फ एक अपराध नहीं, एक मां की दुनिया उजड़ने की कहानी है। शादी से इनकार का बदला लेने के लि��� आरोपी ने बच्चे का गला रेतकर शव ड्रम में छिपा दिया। जब मां ने बेटे को खोजा, तब तक सब खत्म हो चुका था… उसके आंसू अब भी पूछ रहे हैं।किस बात की सज़ा थी ये?