This is the new era, India speaks less, acts more......!🇮🇳🇮🇳
In a bold move, IAF targets Pakistan's Sargodha Airbase with a precision strike....!
Bharat Ka Gaurav - Indian Forces
Jai Hind 🇮🇳🇮🇳
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भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 51
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण: |
जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् ||
समबुद्धि युक्त ऋषि मुनि कर्म के फलों की आसक्ति से स्वयं को मुक्त कर लेते हैं जो हमें जन्म-मृत्यु के चक्र में बांधती हैं। इस चेतना में कर्म करते हुए वे उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं जो सभी दुःखों से परे है।
भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 20 से 22
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।।२०।।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।।२१।।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामान���स्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ।।२२।।
अथ’—इस पद का तात्पर्य है कि अब संजय भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवादरूप ‘भगवद्गीता’ का आरम्भ करते हैं। अठारहवें अध्याय के चौहत्तरवें श्लोक में आये ‘इति‘ पद से यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे ही भगवद्गीता के उपदेश का आरम्भ उसके दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से होता है और अठारहवें अध्याय के छाछठवें श्लोक में यह उपदेश सम���प्त होता है।
‘प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते’— यद्यपि पितामह भीष्म ने युद्धारम्भ की घोषणा के लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिये ही शंख बजाया था, तथापि कौरव और पाण्डव-सेना ने उसको युद्धारम्भ की घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथ में उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेना को शस्त्र उठाये देखकर वीरता में भरकर अर्जुन ��े भी अपना गाण्डीव धनुष हाथ में उठा लिया।
व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् दृष्ट्वा’—इन पदों से संजय का तात्पर्य है कि जब आपके पुत्र दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को देखा, तब वह भागा-भागा द्रोणाचार्य के पास गया। परन्तु जब अर्जुन ने कौरवों की सेना को देखा, तब उनका हाथ सीधे गाण्डीव धनुष पर ही गया—‘धनुरुद्यम्य।’ इससे मालूम होता है कि दुर्योधन के भीतर भय है और अर्जुन के भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है।
‘कपिध्वजः’—अर्जुन के लिये ‘कपिध्वज’ विशेषण देकर संजय धृतराष्ट्र को अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान हनुमान्जी का स्मरण कराते हैं। जब पाण्डव वन में रहते थे, तब एक दिन अकस्मात् वायु ने एक दिव्य सहस्र दल कमल लाकर द्रौपदी के सामने डाल दिया। उसे देखकर द्रौपदी बहुत प्रसन्न हो गयी और उसने भीमसेन से कहा कि ‘वीरवर! आप ऐसे बहुत-से कमल ला दीजिये।’ द्रौपदी की इच्छा पूर्ण करने के लिये भीमसेन वहाँ से चल पड़े। जब वे कदल��वन में पहुँचे, तब वहाँ उनकी हनुमान्जी से भेंट हो गयी। उन दोनों की आपस में कई बातें हुईं। अन्त में हनुमान्जी ने भीमसेन से वरदान माँगने के लिये आग्रह किया तो भीमसेन ने कहा कि ‘मेरे पर आपकी
कृपा बनी रहे’। इस पर हनुमान्जी ने कहा कि ‘हे वायुपुत्र! जिस समय तुम बाण और शक्ति के आघात से व्याकुल शत्रुओं की सेना में घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जना से उस सिंहनाद को और बढ़ा दूँगा। इसके सिवाय अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठकर मैं ऐसी भयंकर गर्जना किया करूँगा, जो शत्रुओं के प्राणों को हरने वाली होगी, जिससे तुमलोग अपने शत्रुओं को सुगमता से मार सकोगे।*’ इस प्रकार जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमान्जी विराजमान हैं, उनकी विजय निश्चित है।
‘पाण्डवः’—धृतराष्ट्र ने अपने प्रश्न में ‘पाण्डवाः’ पद का प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्र को बार-बार पाण्डवों की याद दिलाने के लिये संजय (१।१४ में और यहाँ) ��पाण्डवः’ शब्द का प्रयोग क��ते हैं।
‘हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते’—पाण्डव-सेना को देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर चालाकी से भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव-सेना को देखकर जो जगद्गुरु हैं, अन्तर्यामी हैं, मन-बुद्धि आदि के प्रेरक हैं—ऐसे भगवान् श्रीकृष्ण से शूरवीरता, उत्साह और अपने कर्तव्य से भरे हुए (आगे कहे जानेवाले) वचन बोलते हैं।
अच्युत सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय’—दोनों सेनाएँ जहाँ युद्ध करने के लिये एक-दूसरे के सामने खड़ी थीं, वहाँ उन दोनों सेनाओं में इतनी दूरी थी कि एक सेना दूसरी सेना पर बाण आदि मार सके। उन दोनों सेनाओं का मध्य भाग दो तरफ से मध्य था—
(१) सेनाएँ जितनी चौड़ी खड़ी थीं, उस चौड़ाई का मध्यभाग और
(२) दोनों सेनाओं का मध्य भाग, जहाँ से कौरव-सेना जितनी दूरी पर खड़ी थी, उतनी ही दूरी पर पाण्डव-सेना खड़ी थी। ऐसे मध्य भाग में रथ खड़ा करने के लिये अर्जुन भगवान् से कहते हैं, जिससे दोनों सेनाओं को आसानी से देखा जा सके।
‘सेनयोरुभयोर्मध्ये’ पद गीता में तीन बार आया है—यहाँ (१।२१ में), इसी अध्याय के चौबीसवें श्लोक में और दूसरे अध्याय के दसवें श्लोकमें। तीन बार आने का तात्पर्य है कि पहले अर्जुन शूरवीरता के साथ अपने रथ को दोनों सेनाओं क�� बीच में खड़ा करने की आज्ञा देते हैं (पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), फिर भगवान् दोनों सेनाओं के बीचमें रथ को खड़ा करके कुरुवंशियों को देखने के लिये कहते हैं (पहले अध्याय का चौबीसवाँ श्लोक) और अन्त में दोनों सेनाओं के बीच में ही विषादमग्न अर्जुन को गीता का उपदेश देते हैं (दूसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक)।
इस प्रकार पहले अर्जुन में शूरवीरता थी, बीच में कुटुम्बियों को देखने से मोह के कारण उनकी युद��ध से उपरति हो गयी और अन्त में उनको भगवान् से गीता का महान् उपदेश प्राप्त हुआ, जिससे उनका मोह दूर हो गया। इससे यह भाव निकलता है कि मनुष्य जहाँ-कहीं और जिस-किसी परिस्थिति में स्थित है, वहीं रहकर वह प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करके निष्काम हो सकता है और वहीं उसको परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। कारण कि परमात्मा सम्पूर्ण परिस्थितियों में सदा एक रूप से रहते हैं।
‘यावदेतान्निरीक्षेऽहं……..रण���मुद्यमे’—दोनों सेनाओं के बीच में रथ कब तक खड़ा करें? इस पर अर्जुन कहते हैं कि युद्ध की इच्छा को लेकर कौरव-सेना में आये हुए सेना सहित जितने भी राजा लोग खड़े हैं, उन सबको
जब तक मैं देख न लूँ, तब तक आप ��थ को वहीं खड़ा रखिये। इस युद्ध के उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है? उनमें कौन मेरे समान बलवाले हैं? कौन मेरे से कम बलवाले हैं? और कौन मेरे से अधिक बलवाले हैं? उन सबको मैं जरा देख लूँ। यहाँ ‘योद्धुकामान्’ पद से अर्जुन कह रहे हैं कि हमने तो सन्धि की बात ही सोची थी, पर उन्होंने सन्धि की बात स्वीकार नहीं की; क्योंकि उनके मन में युद्ध करने की ज्यादा इच्छा है। अतः उनको मैं देखूँ कि कितने बल क�� लेकर वे युद्ध करने की इच्छा रखते हैं।
जय श्री कृष्ण 🙏
#WhoIs_Kaal_InBhagavadGita
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत के कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और इंफ्लुएंसर्स केंद्र सरकार के रडार पर हैं।
सरकार का कहना है कि,कुछ प्लेटफॉर्म्स राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं और हिंसा भड़काने का खतरा पैदा कर रहे हैं,ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर कार्रवाई होगी।
मुझे लगता है,हम सभी को भी अब सावधानी से पोस्ट करने और एहतियात बरतने की जरूरत है।क्या मेरे तथ्य से आप सहमत हैं जवाब जरूर दीजियेगा...👇
#IndiaPakistanWar | UN Security Council | #Pakistan #PakistanBehindPahalgam
भगवद गीता अध्याय 1 श्लोक 3
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।।
आचार्य’—द्रोण के लिये ‘आचार्य’ सम्बोधन देने में दुर्योधन का यह भाव मालूम देत�� है कि आप हम सबके—कौरवों और पाण्डवों के आचार्य हैं। शस्त्र विद्या सिखाने वाले होने से आप सबके गुरु हैं। इसलिये आप के मन में किसी का पक्ष या आग्रह नहीं होना चाहिये। ‘
तव शिष्येण धीमता’—इन पदों का प्रयोग करने में दुर्योधन का भाव यह है कि आप इतने सरल हैं कि अपने मारने के लिये पैदा होने वाले धृष्टद्युम्न को भी आपने अस्त्र-शस्त्र की विद्या सिखायी है; और वह आपका शिष्य धृष्टद्युम्न इतना बुद्धिमान् है कि उसने आप को मारने के लिये आप से ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या सीखी है।
‘द्रुपदपुत्रेण’—यह पद कहने का आशय है कि आप को मारने के उद्देश्य को लेकर ही द्रुपद ने याज और उपयाज नामक ब्राह्मणों से यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न पैदा हुआ। वही यह द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न आपके सामने (प्रतिपक्ष ��ें) सेनापति के रूप में खड़ा है। यद्यपि दुर्योधन यहाँ ‘द्रुपद पुत्र’के स्थान पर ‘धृष्टद्युम्न’ भी कह सकता था, तथापि द्रोणाचार्य के साथ द्रुपद जो वैर रखता था, उस वैर भाव को याद दिलाने के लिये दुर्योधन यहाँ ‘द्रुपदपुत्रेण’ शब्द का प्रयोग करता है कि अब वैर निकालने का अच्छा मौका है।
‘पाण्डुपुत्राणाम् एतां व्यूढां महतीं चमूं पश्य’—द्रुपद पुत्र के द्वारा पाण्डवों की इस व्यूहाकार खड़ी हुई बड���ी भारी सेना को देखिये। तात्पर्य है कि जिन पाण्डवों पर आप स्नेह रखते हैं, उन्हीं पाण्डवों ने आपके प्रतिपक्ष में खास आप को मारने वाले द्रुपद पुत्र को सेनापति बनाकर व्यूह-रचना करने का अधिकार दिया है। अगर पाण्डव आपसे स्नेह रखते तो कम-से-कम आप को मारने वाले को तो अपनी सेना का मुख्य सेनापति नहीं बनाते, इतना अधिकार तो नहीं देते। परन्तु सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने उसी को सेनापति बनाया है। यद्यपि कौरवों की अपेक्षा पाण्डवों की सेना संख्या में कम थी अर्थात् कौरवों की सेना ग्यारह अक्षौहिणी* और पाण्डवों की सेना सात अक्षौहिणी थी, तथापि दुर्योधन पाण्डवों की सेना को बड़ी भारी बता रहा है। पाण्डवों की सेना को बड़ी भारी कहने में दो भाव मालूम देते हैं—
(१) पाण्डवों की सेना ऐसे ढंग से व्यूहाकार खड़ी हुई थी, जिससे दुर्योधन को थोड़ी सेना भी बहुत बड़ी दिख रही थी और
(२) पाण्डव-सेनामें सब-के-सब योद्धा एक मत के थे। इस एकता के कारण पाण्डवों की थोड़ी सेना भी बल में, उत्साह में बड़ी मालूम दे रही थी। ऐसी सेना को दिखाकर दुर्योधन द्रोणाचार्य से यह कहना चाहता है कि युद्ध करते समय आप इस सेना को सामान्य और छोटी न समझें। आप विशेष बल लगाकर सावधानी से युद्ध करें। पाण्डवों का सेनापति है तो आपका शिष्य द्रुपद पुत्र ही; अतः उस पर विजय करना आपके लिये कौन-सी बड़ी बात है।
‘एतां पश्य’ कहने का तात्पर्य है कि यह पाण्डव-सेना युद्ध के लिये तैयार होकर सामने खड़ी है। अतः हमलोग इस सेना पर किस तरह से विजय कर सकते हैं—इस विषय में आपको जल्दी-से-जल्दी निर्णय लेना चाहिये।
जय श्री कृष्ण 🙏
BIG BREAKING NEWS 🚨
India bans all imports of goods from Pakistan.
HUGE setback for Pakistan’s economy.
India to also ask global agencies, including IMF, to review loans & financial aid to Pakistan.
Pakistan’s economy now facing a tougher road ahead.
#IndiaPakistanWar
कैसे ठरकियों का देश है पाकिस्तान!
जेल में ही पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के साथ पाकिस्तानी सेना के मेजर ने ही रेप (बलात्कार) कर दिया। जिन्ना ने कैसा निहायती देश बना कर गया, पाकिस्तान में न जनता सुरक्षित है नहिं, न���ता।😂😳👇
BIG UPDATE 🚨
Gujarat Police detain 1000+ illegal Bangladeshis and Pakistanis living in India.
Action initiated to trace those who helped them settle.
Mule owner, spotted on tourist’s mobile, also arrested.
Massive crackdown underway!
#IndoPakBorder#PahelgamTerroristattack
BIG BREAKING: Lashkar’s Top Commander Eliminated 🚨
Top LeT terrorist Altaf Lalli neutralized in Bandipora — a big win for our forces.🪖
Justice for Pahalgam begins. India never forgets.🇮🇳
#PahalgamAttack#PakistanBehindPahalgam#GlobalTerrorist
Rohit Sharma – 76(45)*
Suryakumar Yadav – 68(30)*
WHAT. A. CHASE!
Mumbai Indians thrash CSK by 9 wickets!
Rohit & Surya made it look effortless — pure domination!
#MIvsCSK#CSKvsMI#Rohitsharma