अगर पैसे नही हो ट्रेक्टर के तो क्या हुआ ।।
दिमाग तो है ही।।
देखिये कैसे इसने बहुत भारी दिखने वाले काम को आसान बना दिया ।।
जो तरीका अपनाया देख कर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।।
क्या हुआ?
75 किलो वर्ग में भारत की काजल दोचक और अमेरिका की डायमंड गिल्डफोर्ड।
स्वर्ण पदक के लिए मुकाबला 3-3 से बराबर था। समय खत्म होने वाला था। डायमंड ने ताकतवर डिफेंस से काजल को रोक रखा था।
समय पूरा होते ही सबने उतावली डायमंड का शानदार सेलिब्रेशन नृत्य देखा।
लेकिन?
😀😀
असम के लिए प्रार्थना
असम की भीषण बाढ़ ने दिल दहला दिया है चारों ओर तबाही का मंजर जो देखकर हर एक के आंख में आंसू आ जाएगा
भगवान, सभी की रक्षा करें और जल्द राहत दें 🙏
क्या सत्ता की खीर ने रालोद को किसानों की हकीकत से दूर कर दिया?
"मोदी से कोई किसान नाराज़ नहीं"
क्या यह बयान ज़मीनी हकीक़त या सत्ता की मजबूरी?
राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) किसानों की हितैषी और उनकी आवाज़ होने का दावा करती है। आज वही पार्टी सत्ता के मंच से कह रही है क�� "देश का कोई किसान मोदी से नाराज़ नहीं है। कभी मोदी में चौधरी चरण सिंह जी की छवि दिखती है"।
दरअसल, यह बयान सिर्फ़ सियासी नहीं, बल्कि उन लाखों किसानों की भावनाओं पर कुठाराघात है जिन्होंने 13 महीने के आंदोलन में 700 किसानो को मरते दम तोड़ते देखा है। शहीद किसानों के परिवार, एमएसपी का जुमला सुनने वाले, फसल मूल्य, कर्ज़, बिजली, भूमि अधिग्रहण और अन्य मुद्दों पर सवाल उठाने वाले किसान आंदोलन के लिए दिल्ली कूच कर रहे हैं।
सवाल यह है कि यदि वास्तव में कोई किसान नाराज़ नहीं है, तो दिल्ली की ओर बढ़ते किसान कौन हैं? क्या वे किसान नहीं हैं? क्या उनकी समस्याएँ वास्तविक नहीं हैं? लोकतंत्र में असहमति को नकार देना किसी भी राजनीतिक दल के लिए खतरनाक प्रवृत्ति हो सकती है।
रालोद का राजनीतिक जन्म किसान अस्मिता और चौधरी चरण सिंह की विचारधारा से हुआ था। लेकिन आज ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता की साझेदारी ने उसकी राजनीतिक भाषा और प्राथमिकताओं को बदल दिया है। कभी जो पार्टी किसानों के सवालों पर सरकारों को घेरती थी, वही आज सरकार की ओर से बचाव करती और सफाई देती दिखाई दे रही है।
राजनीति में गठबंधन करना अलग बात है, लेकिन यदि ��ठबंधन की कीमत अपनी मूल विचारधारा और सामाजिक आधार को ही नकारना बन जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी दल की विश्वसनीयता का होता है। सत्ता क्षणिक हो सकती है, लेकिन जनविश्वास खो जाने की भरपाई वर्षों में भी नहीं होती।
रालोद को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसान केवल चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक पहचान की नींव हैं। यदि वही किसान अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं, तो उनका दर्द सुनना चाहिए, न कि यह घोषित कर देना चाहिए कि कोई नाराज़ ही नहीं है।
- के. पी. मलिक
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राममंदिर में चोरी की बात @yadavakhilesh
ने बताई , शुरू में मुझे लगा हर बार की तरह फिर बकवास कर रहे हैं। मगर लवकुश मिश्रा के घर पर गोबर में छुपाकर रखें 10 लाख रूपये मिलने पर मंदिर प्रशासन पर उंगली उठनी जायज है।
मैं भगवान में गहरी आस्था रखता हूं , कोई ग़लत काम या ग़लत चीज सोच भी लेता हूं तो आत्मा मना कर देती है यही सोचकर की भगवान देख रहा है।
वहां मंदिर के लोग आंखों के सामने कितनी शातिर तरीके से दान के पैसों की चोरी कर लेते हैं , ऐसे लोगो पर क्या विश्वास किया जाए ,
परंतु कैमरे से उनकी चोरी कैप्चर हो जाती है, भारत के मंदिरों में हर महीने अरबों का चढ़ावा आता है। मगर कुछ लोग कहते हैं मंदिरों का नियंत्रण सरकार को छोड़ देना चाहिए , मैं इस चीज के खिलाफ हू। यदि नियंत्रण छोड़ दिया तो ये लोग लूटकर खा जाएंगे भगवान का पैसा।
राममंदिर वाले प्रकरण में भी लोग अब मंदिरो में दान करने से कतराएंगे, इससे देश क��� छवि भी धूमिल होगी ।
ये उस दौर की फोटो है जब ओम प्रकाश जी वाराणसी में टेंपो चलाते थे। एक ट्रैफिक इंस्पेक्टर जो वर्तमान में सेवानिवृत्त है और प्रयागराज में रहते हैं।
सवारी ओवरलोड कर के जा रहे ओम प्रकाश जी को रोके लेकिन ये निकलने लगे‚ TI साहब ने इनको पकड़ा 3-4 झापड़ लगा दिया।
ब���द में ॐ प्रकाश जी टेम्पो चालक से माननीय बनने का सफ़र तय किया‚ ये ओम प्रकाश जी का बड़प्पन है जो माननीय बनने के बाद TI साहब के घर गए थे उन्हें धन्यवाद दिया सैल्यूट किया कि उस दिन आप नहीं मारते तो आज भी मै टैम्पो चला रहा होता।
ये हम सबके लिए जीवंत उदाहरण है कि हम अपने अपमान को अपने जीवन कि ताकत बना कर कैसे अपने जीवन को बदल सकते है।
नोट - उक्त पोस्ट बृजभूषण शरण सिंह जी ने किया है‚ नहीं तो मैं विश्वास भी नहीं करती।
रेल पटरी पर खड़ी थी मासूम बच्ची…
ट्रेन आ पहुँची, मौत नजदीक।
तभी एक गाय ने जान जोखिम में डालकर बच्ची को धक्का देकर बचा लिया।
कुदरत का कमाल जानवरों में भी इंस���नियत जिंदा है।
इससे पहले कि नोएडा और दिल्ली में बैठे सरकारी दलाल किसानों पर धुएं के इल्ज़ाम लगाएँ —
ज़रा ये वीडियो देखो!
ये वीडियो है बठिंडा ऑयल रिफाइनरी का,
जिसका मालिक है HMEL – Hindustan Mittal Energy Limited,
यानि लक्ष्मी मित्तल की कंपनी, जो HPCL (Hindustan Petroleum Corporation Limited) के साथ जॉइंट वेंचर में चलती है।
यह रिफाइनरी 24 घंटे धुआं छोड़ती है,
और सर्दियों में तो आसमान ही काला हो जाता है —
जैसा वीडियो में साफ़ दिख रहा है।
अब बताओ…
क्या इस धुएं का ज़िम्मेदार भी किसान है?
किसानों पर इल्ज़ाम लगाने वालों —
हिम्मत है तो किसी बड़े उद्योगपति की तरफ उंगली उठाकर दिखाओ!
वरना “क्लाइमेट” के नाम पर सिर्फ़ गरीब को ही मत कुचलो। 💥
नेपाल आज - तक रिफाइनरी नहीं लगा पाए है , इतना गरीब है ।
तेल भारत से खरीदता है , पेट्रोल पंप भारतीयता कंपनी के है !
64.38 पेट्रोल 67.28 डीजल बिक रहा है !!
नोट :- गडकरी वाले बेटे के इथेनॉल की भी मिलावट नहीं है ।
DLF के मालिक K.P Singh Teotia - जिनकी सारी संपत्ति आने वाले 15-20 सालों में पंजाबी खत्री और बनियो में बट जाएगी।
जिसका कारण सिर्फ एक है - उनकी पुत्री और पोतियों का अंतर्जातिये विवाह !
तो समाज के कुछ सबसे बड़े लोग, सबसे नासमझ भी हो सकते हैं।
या यू कहें इनकी औलादे इनके बस में नहीं