हम हर समय अपनी चित्तवृत्त��� को प्रभु के चिंतन में लगाते रहें।
Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
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भजन मार्ग | परम पूज्य वृन्दावन रसिक संत श्री हित प्रेमानन्द गोविन्द शरण जी महाराज
श्री हित राधा केली कुंज, वराह घाट, वृन्दावन धाम
वरिष्ठ पत्रकार पायल मेहता जी का निधन अत्यंत दुःखद ��वं पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि।
प्रभु श्री राम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को सद्गति तथा शोकाकुल परिजनों को यह अथाह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।
ॐ शांति।
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
भावग्राह्यमनीडाख्यं भावा��ावकरं शिवम् ।
कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ।।१४।।
(पञ्चमोऽध्याय:)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का पञ्चम अध्याय साधक को जीव, जगत् और परमात्मा के पारस्परिक सम्बन्ध का क्रमशः गहन बोध कराते हुए अन्ततः आत्मसाक्षात्कार की चरम अनुभूति तक ले जाता है। पूर्ववर्ती मन्त्रों में उपनिषद् ने परमात्मा को अनादि, अनन्त, विश्वस्रष्टा, सर्वव्यापक तथा समस्त बन्धनों से मुक्त करने वाले परम देव के रूप मे��� निरूपित किया। प्रस्तुत मन्त्र उसी दिव्य तत्त्व का और भी सूक्ष्म स्वरूप उद्घाटित करता है। यहाँ परमात्मा को भाव से ग्राह्य, अनीडाख्य, भाव और अभाव का कारण, शिवस्वरूप तथा समस्त कलाओं एवं सृष्टि का उद्गम कहा गया है। जो साधक इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है, वह देहाभिमान का परित्याग कर अमृतस्वरूप ब्रह्म में प्रतिष्ठित हो जाता है।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस मन्त्र का भाष्य करते हुए स्पष्ट करते हैं कि उपनिषद् यहाँ किसी सीमित देवता का नहीं, बल्कि उसी परम ब्रह्म का निरूपण कर रही है, जो समस्त नाम-रूपों का अधिष्ठान, आत्मस्वरूप और अद्वितीय चैतन्य है।
मन्त्र का प्रथम पद है- “भावग्राह्यम्।”
भगवत्पाद के अनुसार परमात्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है। वह न नेत्रों से देखा जा सकता है, न वाणी से व्यक्त किया जा सकता है, न मन की कल्पनाओं में सीमित किया जा सकता है। फिर भी वह अप्राप्य नहीं है। वह शुद्ध अन्तःकरण, श्रद्धा, उपासना, आत्मचिन्तन और समाधिस्थ बुद्धि द्वारा अनुभूत होता है। यहाँ भाव का अर्थ केवल भावना नहीं, बल्कि अन्तःकरण की निर्मल, एकाग्र और ब्रह्माभिमुख वृत्ति है। जब मन विषयासक्ति से मुक्त होकर सत्य की ओर उन्मुख होता है, तभी परमात्मा का साक्षात्कार सम्भव होता है।
इसके पश्चात् उपनिषद् कहती है- “अनीडाख्यम्।”
‘नीड’ का अर्थ है- आश्रय, निवास अथवा सीमित आधार। अनीड अर्थात् ज���सका कोई बाह्य आश्रय नहीं, जो स्वयं समस्त जगत् का आधार है, किन्तु स्वयं किसी आधार पर आश्रित नहीं। भगवत्पाद के अनुसार ब्रह्म स्वयंभू, स्वयंसिद्ध और निरपेक्ष सत्ता है। सम्पूर्ण विश्व उसी पर आश्रित है, किन्तु वह किसी वस्तु, स्थान, काल या कारण पर निर्भर नहीं। वही सभी का आश्रय है, किन्तु उसका कोई आश्रय नहीं।
मन्त्र का अगला विशेषण है- “भावाभावकरम्।”
यह अत्यन्त गूढ़ दार्शनिक पद है। भगवान आदि शंकर���चार्य के अनुसार परमात्मा सम्पूर्ण व्यक्त (भाव) और अव्यक्त (अभाव) जगत् का कारण है। सृष्टि, स्थिति और प्रलय सभी उसी की मायाशक्ति के अधीन घटित होते हैं। जो प्रकट है, उसका भी आधार वही है; जो अप्रकट है, उसका भी मूल वही है। परन्तु यह कारणत्व भी परमार्थतः ब्रह्म का स्वाभाविक धर्म नहीं, बल्कि माया-उपाधि से सम्बद्ध ईश्वर की व्यावहारिक सत्ता का लक्षण है।
इसके उपरान्त मन्त्र परमात्मा को “शिवम्” कहता ह��। यहाँ शिव किसी संप्रदाय-विशेष के देवता का नाम मात्र नहीं, बल्कि उस परम मंगलस्वरूप, कल्याणमय, शुद्ध, शान्त और अखण्ड ब्रह्म का द्योतक है। भगवत्पाद स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म ही परम शिव है—जो समस्त अशुभ, अज्ञान और दुःख का नाश करता है तथा आत्मस्वरूप आनन्द का प्रकाश करता है।
मन्त्र आगे कहता है- “कलासर्गकरं देवं।”
‘कला’ से अभिप्राय उन विविध शक्तियों, तत्त्वों, अवयवों और उपाधियों से है, जिनके माध���यम से सम्पूर्ण जगत् की अभिव्यक्ति होती है। पंचमहाभूत, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, प्रकृति तथा सम्पूर्ण विश्व-विस्तार उसी परम सत्ता से प्रकाशित हैं। जैसे सूर्य के प्रकाश से असंख्य क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं, किन्तु सूर्य स्वयं उनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा समस्त सृष्टि का कारण होते हुए भी उससे असंग रहता है।
मन्त्र का चरम निष्कर्ष है- “ये विदुस्ते जहुस्तनुम्।” यहाँ “विदुः” ���ा अर्थ केवल शास्त्रीय ज्ञान नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आत्मानुभूति है। जब साधक श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा अपने आत्मस्वरूप में उसी परम शिव का साक्षात्कार करता है, तब उसका देहाभिमान पूर्णतः नष्ट हो जाता है।
भगवत्पादाचार्य स्पष्ट करते हैं कि “तनुं जहुः” का अर्थ शरीर का भौतिक परित्याग नहीं है। ज्ञानी जीवित रहते हुए भी देह से तादात्म्य का त्याग कर देता है। उसके लिए शरीर केवल प्रारब्ध के ���नुसार चलने वाला एक उपकरण रह जाता है; वह स्वयं को कभी शरीर, मन, बुद्धि या अहंकार नहीं मानता। यही जीवन्मुक्ति की अवस्था है।
जब प्रारब्ध का अन्त होता है, तब पुनर्जन्म का कोई कारण शेष नहीं रहता, क्योंकि अविद्या और कर्म का बीज ज्ञानाग्नि में भस्म हो चुका होता है। इस प्रकार ज्ञानी जन्म-मरण के चक्र से सर्वथा परे अमृत ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
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भगवान का नाम-जप करना सबसे बड़ी तपस्या है।
Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
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भजन मार्ग | परम पूज्य वृन्दावन रसिक संत श्री हित प्रेमानन्द गोविन्द शरण जी महाराज
श्री हित राधा केली कुंज, वराह घाट, वृन्दावन धाम
आज 912 युवाओं के जीवन में नई जिम्मेदारी का अध्याय जुड़ने के साथ ही ���त्तर प्रदेश पुलिस को नई ऊर्जा और नया सामर्थ्य मिलने जा रहा है।
उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड द्वारा निष्पक्ष एवं पारदर्शी चयन प्रक्रिया के माध्यम से लिपिक संवर्ग सीधी भर्ती 2023 के अंतर्गत चयनित पुलिस उपनिरीक्षक (गोपनीय), पुलिस सहायक उपनिरीक्षक (लिपिक) एवं पुलिस सहायक उपनिरीक्षक (लेखा) को नियुक्ति-पत्र प्रदान किए जाएंगे।
सभी चयनित अभ्यर्थियों को हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं।
महाकाल की नगरी उज्जैन में पूज्य आचार्यश्री से वरिष्ठ अधिकारियों की सौजन्य भेंट; सिंहस्थ महापर्व 2028 की तैयारियों पर आत्मीय संवाद !
कल्याणी ���ोक्षदा अजेय अमर अवंतिका की पावन भूमि, जहाँ भगवान महाकालेश्वर की आराधना जीवन को काल की सीमाओं से परे सनातन चेतना का स्मरण कराती है, वहाँ श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्री विभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ‘पूज्य आचार्यश्री’ से वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों ने सौजन्य भेंट की।
इस शिष्टा��ार भेंट के अवसर पर आगामी सिंहस्थ महापर्व 2028 की तैयारियों को लेकर आत्मीय विचार-विमर्श हुआ। अधिकारियों ने पूज्य आचार्यश्री को प्रस्तावित एवं प्रगतिरत विकास कार्यों की जानकारी दी। देश-विदेश से उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं के सुगम आवागमन, सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित दर्शन, आवास, यातायात प्रबंधन, घाटों के विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय���ं पर भी चर्चा हुई।
उज्जैन में सिंहस्थ केवल विशाल जनसमागम नहीं, सनातन परम्परा में आस्था, साधना और सेवा का अनुपम पर्व है। इसी भाव के अनुरूप संवाद में ऐसी व्यवस्थाओं की आवश्यकता पर बल दिया गया, जिनसे प्रत्येक श्रद्धालु को सुविधा मिले और महाकाल की इस प्राचीन नगरी की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक गरिमा भी बनी रहे।
इस अवसर पर श्री राकेश गुप्ता जी, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक ADG , उज्जैन संभाग; श्री आश��ष सिंह जी, संभागायुक्त, उज्जैन; श्री नवनीत भसीन जी, पुलिस उपमहानिरीक्षक; श्री रोशन सिंह जी, कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी, उज्जैन; श्री प्रदीप शर्मा जी, पुलिस अधीक्षक, उज्जैन; श्री प्रथम कौशिक जी, प्रशासक, श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति; श्री अभिलाष मिश्रा जी, आयुक्त, नगर निगम उज्जैन; तथा श्री क्षितिज सिंघल जी, आयुक्त, नगर निगम इंदौर सहित वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित रहे।
पूज्य आचार्यश्री न��� कहा कि सिंहस्थ की तैयारियों में श्रद्धालुओं की सुविधा के साथ लोककल्याण का भाव और उज्जैन ��ी सांस्कृतिक अस्मिता स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए। उन्होंने लोकसेवा में संलग्न अधिकारियों को कर्तव्यनिष्ठा, संवेदनशीलता और निष्काम भाव से कार्य करने के लिए आशीर्वाद एवं मंगलकामनाएँ प्रदान कीं।
भगवान महाकाल की कृपा से अवंतिका में सम्पन्न यह आत्मीय भेंट धर्म, संस्कृति और लोकसेवा के समन्वय का सुन्दर अवसर बनी।
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ठाकुर राधामोहन जू के पाटोत्सव की बधाई हो!
Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
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भजन मार्ग | परम पूज्य वृन्दावन रसिक संत श्री हित प्रेमानन्द गोविन्द शरण जी महाराज
श्री हित राधा केली कुंज, वराह घाट, वृन्दावन धाम
।। श्वेताश्वत��� उपनिषद् ।।
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति।
क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः।।१२।।
(पञ्चमोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का पञ्चम अध्याय जीव, जगत् और परमात्मा के पारस्परिक संबंध का सूक्ष्म दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत करता है। पूर्ववर्ती मन्त्रों में जीव की सूक्ष्मता, उसके उपाधि-जनित बंधन, कर्मानुसार पुनर्जन्म तथा संसार-चक्र का निरूपण किया गया है। प्रस्तुत मन्त्र उद्घाटित करता है कि जीव अपने संस्कारों और गुणों के अनुसार स्थूल एवं सूक्ष्म शरीरों को धारण करता है; किन्तु इन सबका अन्तिम नियामक केवल कर्म नहीं, अपितु परमेश्वर भी है।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार “देही” वह जीव है, जो अविद्या के कारण शरीरादि उपाधियों से तादात्म्य करता हुआ प्रतीत होता है। वस्तुतः आत्मा न शरीर धारण करती है और न उसमें कोई परिवर्तन होता है��� शरीरों का ग्रहण एवं परित्याग जीव के उपाधि-सम्बद्ध अनुभव का विषय है, आत्मा के स्वरूप का नहीं।
मन्त्र का प्रथम चरण- “स्थूलानि सूक्ष्माणि” बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति” बताता है कि जीव अपने गुणों, संस्कारों और कर्मजन्य प्रवृत्तियों के अनुरूप अनेक स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर धारण करता है।
“स्थूल रूप” दृश्य, भौतिक और पञ्चमहाभूतों से निर्मित शरीर है, जिसके माध्यम से जीव कर्म करता और क��्मफल भोगता है। “सूक्ष्म रूप” मन, बुद्धि, अहंकार, प्राण और इन्द्रियों से युक्त सूक्ष्म शरीर है, जो मृत्यु के पश्चात् भी कर्मसंस्कारों को लेकर आगामी जन्म तक बना रहता है।
जीव किस प्रकार की देह धारण करेगा, यह उसके “स्वगुण” पर निर्भर है। यहाँ गुण से तात्पर्य केवल सत्त्व, रजस् और तमस् ही नहीं, अपितु उनसे उत्पन्न संस्कारों, वासनाओं और कर्मप्रवृत्तियों से भी है। प्रत्येक कर्म मन में संस्कार उत्पन���न करता है, संस्कार भविष्य की प्रवृत्ति बनता है और वही प्रवृत्ति अगले जन्म के अनुरूप शरीर का कारण बनती है।
किन्तु उपनिषद् केवल कर्मवाद पर नहीं रुकती। मन्त्र का दूसरा चरण “क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः” इसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक बिन्दु है।
भगवत्पाद स्पष्ट करते हैं कि शरीर, कर्म और जीव का परस्पर संयोग केवल कर्मों का यान्त्रिक परिणाम नहीं है। इस संयो��� का एक “अपरः” अन्य एवं श्रेष्ठ कारण भी है- वह है ईश्वर। ईश्वर समस्त कर्मों का साक्षी, सर्वज्ञ तथा कर्मफल का न्यायपूर्ण नियामक है। जीव के कर्म कारण अवश्य हैं; किन्तु उनके अनुरूप शरीर, जन्म, परिस्थिति और अनुभव प्रदान करने वाला परम नियन्ता ईश्वर ही है। कर्म जड़ होने के कारण स्वयं अपने फल का यथोचित विधान नहीं कर सकते। अतः कर्मफल प्रदान करने वाली चेतन, सर्वज्ञ और न्यायमयी सत्ता परमेश्वर है।
अद्���ैत वेदान्त में ईश्वर और कर्म का सम्बन्ध अत्यन्त सूक्ष्म है। कर्म निमित्त बनते हैं, किन्तु उनके फल का विधान ईश्वर करता है। संसार में दिखाई देने वाली विविधता न तो अकारण है और न किसी पक्षपात का परिणाम; वह जीव के कर्म और ईश्वर के न्यायपूर्ण नियमन का संयुक्त फल है।
भगवत्पाद इस संपूर्ण व्यवस्था को व्यावहारिक सत्य के स्तर पर स्वीकार करते हैं। परमार्थतः न जीव का बन्धन सत्य है, न शरीरों का परिवर्त��, न जन्म और न मृत्यु। आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सर्वव्यापक चैतन्य है। स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर उसी प्रकार आत्मा पर आरोपित हैं, जैसे स्वच्छ स्फटिक पर समीपस्थ पुष्प का रंग आरोपित दिखाई देता है। रंग स्फटिक का नहीं होता; उसी प्रकार जन्म, मृत्यु, सुख, दुःख और देहधारण आत्मा के धर्म नहीं हैं।
यह मन्त्र साधक को गम्भीर आध्यात्मिक शिक्षा देता है। मनुष्य का वर्तमान जीवन संयोग मात्र नहीं है। उसका शरीर, स्वभाव, परिस्थितियाँ और अनुभव उसके पूर्वकृत कर्मों से सम्बद्ध हैं। प्रत्येक विचार, कर्म और संस्कार आगामी अनुभवों का बीज है। अतः वर्तमान क्षण ही भविष्य का निर्माण कर रहा है।
किन्तु उपनिषद् का लक्ष्य केवल उत्तम जन्म प्राप्त करना नहीं, उस आत्मज्ञान को उपलब्ध करना है, जिसमें शरीरों का सम्पूर्ण चक्र मिथ्या सिद्ध हो जाता है। जब साधक विवेक, वैराग्य, श्रवण, मनन और निदिध्यासन द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है, तब वह जानता है - मैं न स्थूल शरीर हूँ, न सूक्ष्म शरीर; न कर्म हूँ, न कर्मफल का भोक्ता; मैं इन सबका साक्षी, नित्य, निर्विकार और ब्रह्मस्वरूप चैतन्य हूँ।
यही अनुभूति संसार-चक्र से वास्तविक मुक्ति है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर अपने स्तर पर कार्य करते रहते हैं, किन्तु ज्ञानी उनसे तादात्म्य नहीं करता। उसके लिए सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म की अभिव्यक्ति बन जाता है और वह कर्म करते हुए भी कर्मबन्धन से परे रहता है।
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महादेव का त्रिशूल और विष्णु जी का सुदर्शन चक्र किसने बनाया था..? 😱
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सबको भगवद् स��वरूप मानकर अपने कर्तव्य का पालन करो और किसी से कोई आशा मत रखो।
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