बिहार में भी चुनाव होने वाला है।बिहार में फ्री and फेयर चुनाव होना चाहिए।राहुल गांधी द्वारा जो आरोप लगाया जा रहा अगर ये सच है तो लोकतंत्र को सचमुच खतरा है।
क्योकि मैं झूठ नहीं बोलता...
राहुल गांधी ने संसद की अपनी स्पीच में कई बातें कही। लेकिन रोजगार के मुद्दे पर मौजूदा सरकार की नाकामी के साथ, यह भ��� जोड़ने में गुरेज न किया, कि UPA सरकार भी रोजगार देने में कमजोर रही..
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मनमोहन सरकार, जॉबलेस ग्रोथ के लिए कटघरे में खड़ी की जाती है। इस बात में आंशिक सचाई है।
दरअसल, 30-40 साल पहले, पहले प्रति यूनिट इन्वेस्टमेंट पर जितने जॉब सृजित होते थे, सूचना तकनीक औऱ ऑटोमे��न ने उसमे बड़ा डेंट लगा दिया।
उदाहरण के लिए - 500 खाते हैंडल करने के लिए यदि किसी बैंक में एक आदमी की जरूरत होती, तो अब 5000 खाते एक व्यक्ति हैंडल कर सकता है।
या किसी सड़क निर्माण में 100 मजदूर, इंजीनियर, टेक्नीशियन लगते, अब वे मशीनों के साथ 500 किमी बना सकते हैं। एक टीचर 50 बच्चो को पढ़ाता। तो अब एक लाख बच्चो को एक टीचर पढा रहा है।
हर सेक्टर इससे प्रभावित हुआ है।
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इसके बावजूद, जिस दौर में देश मे धड़ल्ले से इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट के कॉलेज खुले, खूब प्लेसमेंट हुआ, बड़े बड़े पैकेज मिले, तो वह दौर मनमोहन सिंह का था।
माइनिंग, कन्स्ट्रक्शन, फाइनैंस, आईटी, बीपीओ, टूरिज्म हर सेक्टर में बूम का दौर था। अर्थव्यवस्था में आशावाद था।
सरकारी नौकरियां इस दौर में अवश्य कम हुई। लेकिन तब स्टेट पीएससी, यूपीएससी, बैंकिंग, रेलवे के एग्जाम नियमित होते, और उनकी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नही उठाता था।
इसके बावजूद यह तथ्य है कि अपने उत्तरार्ध में बेरोजगारी की दर में स्थिर उठाव आता गया। मोदी दौर में 2018 तक बेरोजगारी के आंकड़े आते रहे, आलोचना बढ़ती रही, और अंततः आंकड़े जारी होने ही बंद हो गए।
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बहरहाल, यहाँ मुद्दा राहुल का भाषण है। आधुनिक दौर में रोजगार सृजन के लिए जरूरी कदमो की वकालत करते हुए वह, साफगोई से मानते है कि उनके दौर में भी बेहतर काम हो सकता था।
सर्विस सेक्टर में जिस तरह ध्यान दिया गया, वैसा अगर मैन्युफैक्चरिंग पर भी ध्यान दिया गया होता, तो हालात बेहतर होते।
मेक इन इंडिया, मोदी सरकार का नारा अच्छा था.. पर दूसरे नारो की तरह, बिना पुख्ता नीति के फेल हो गया।
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कभी र���जीव ने कहा था कि रुपया दिल्ली से चलता है, तो जनता तक 15 पैसे आते हैं।
नेहरू ने रेडियो पर स्वीकार किया कि चीन ने हमला किया, हमारी जमीन पर घुस आया। हमारी सेना को पीछे हटना पड़ रहा है। छुपाया नही, झूठ न बोला।
उन्होंने 20 सैनिको की लाशो पर खड़े प्रधानमंत्री की तरह टीवी पर नही कहा- न कोई घुसा है, न कोई आया है।
दरअसल, समस्या से लड़ने के पहले यह जरूरी है कि समस्या का होना, स्वीकार किया जाए।
अगर करप्शन है, ���ो स्वीकार करें। बेरोजगारी है, तो स्वीकार करें,
असफलता है, तो स्वीकार करें।
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समस्या स्वीकारने के बाद पक्ष-विपक्ष मिलकर बैठे, विजन शेयर हो। जो बेहतर हो, वह किया जाए। आखिर इसीलिए तो जनता अपने प्रतिनिधि संसद में भेजती है।
कुत्ता-बिल्ली मुहझौसी प्रतियोगिता के लिए नही। राहुल ने अपनी स्पीच में, अपनी भी सरकार की आलोचना कर, एक पहल की।।
एक तरह से सहयोग का आमंत्रण दिया। जिसे ट्रेजरी बेंच में बैठ��� हल्के फुल्के ट्रोल्स ने बेवजह टोकाटाकी, और शोरगुल में गंवा दिया।
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राहुल का पूरा भाषण, एक स्टेट्समैन का भाषण था। मौजूदा दौर में इन्वेस्टमेंट, रोजगार सृजन और आयात निर्यात संतुलन के लिए उसमे गहरे तत्व थे।
प्रतिभा की कमी से जूझ रही मोदी सरकार को उनके भाषण का अध्ययन करके नीतियां बनानी चाहिए। देश अभी भी 4 साल उनके हाथ मे है।
11 साल झूठ की सियासत के बाद, अगर अब भी कोई कोर्स करेक्शन किया जा सकता ह��, तो उसका मार्ग राहुल की स्पीच में है।
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आप भी यू ट्यूब पर उनकी स्पीच सुने, सोचें, और महसूस करें कि ऐसे लीडर को विपक्षी बेंच पर बिठाकर उसका समय खराब करना, उसकी नही, हमारी बदकिस्मती है।
इस स्पीच में साफगोई है, सत्य है, हालातों के प्रति ईमानदारी है। यह देखकर मुझे खुशी है, कि मेरा हीरो, छिछोरी बातें नही करता।
मेरा नेता झूठ नहीं बोलता!!
❤️
बदलेगा सम्विधान, तो क्या बदलेगा??
बात हो रही है, कि संविधान बदलने की जरूरत है। मौका मिला, तो बदल देंगे.. तो क्या बदलेंगे??
और क्या असर होगा, हमपर??
लेकिन पहले यह समझने की जरूरत है, कि संविधान है क्या??
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उँह। एक उबाऊ डॉक्यूमेंट। जो देश चलाने के लिए प्रेसिडेंट, पीएम, सीएम, एमपी जैसे पद बनाता है। उनके चुनाव, काम, दायरे बताता है।सत्ता की गाइडलाइन तय करता है।
संविधान के मुत���बिक, ये देश राज्यो का संघ है। दो सरकारे होंगी, एक सेंटर, दूसरी राज्य पर। एक का मुखिया राष्ट्रपति, दूसर�� का राज्यपाल।
राज्य अधीनस्थ नही है। बल्कि दोनो सरकारों, मुखियाओं के बीच अधिकार- कर्तव्य बांट दिए गए हैं।
तो जिस नए संविधान की बात हो रही है, क्या उसमे पदनाम, दायरे, इन सरकारों के अधिकार बदलेंगे??
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सत्ता मौजूदा सम्विधान में बिखरी हुई है।सरकार, व्यवस्था के शीर्ष पर है, मगर सुप्रीम नही।
सर्वोच्च तो सन्सद है। कोर्ट, चुनाव आयोग, सीएजी, तमाम दूसरी संस्थाएं.. राज्यो की सरकार के भी अपने हक हैं। य��� सब चेक, एंड बैलेंस अरेंजमेंट है।
सरकार के पर कतरने, और कंट्रोल रखने का जुगाड़ हैं। सम्विधान बदलकर, इनके अधिकार बढ़ाएंगे, या कटौती होगी??
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राष्ट्रपति, राज्यपाल, नाममात्र के मुखिया है। ये लिखा नही कहीं, सिवाय- मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करने की एक पँक्ति के।
तो यह परंपराओं पर अधिक बेस्ड है। तो क्या परंपराओं का सम्मान होगा, या एक आर्टिकल लिखकर उलट दी जाएंगी??
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मूल सवाल बस इतने ही हैं।
इस��े अलावे तो सम्विधान आम जिंदगी ��र बहुत असर नही डालता। ये महज राजाओं, याने नेताओ, राजनीतिक दलों, अफसरों के बीच पावर शेयरिंग के रूल्स भर देता है।
राह चलते आदमी के काम का तो इसमे बस एक ही हिस्सा है। यूनिवर्सल राइट्स-जो मूल अधिकार हैं, धर्म, जाति, रेस, सँख्या से निष्प्रभावित..
जो मोदी की नही, मेरे संविधान की गांरन्टी है।
किसी सरकार को, किसी अफसर को हक़ नही उन्हें छूने का। तो नये संविधान में मेरे अधिकार, बढ़ेंगे, या घटेंगे??
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कु�� को लगता है कि हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देंगे। उद्देशिका से समाजवादी, धर्मनिरपेक्षता हटा देंगे।
पर ये तो कॉस्मेटिक चेंज है।
बाद में जुड़ा।
समाजवाद तो समानता के अधिकार में है। धर्मनिरपेक्षता धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में है। आर्टिकल 16 से 35 तक, हर एक मूल अधिकार को फुर्सत निकालकर पढ़िए।
आप पाएंगे कि इस मुई धर्मनिरपेक्षता, समानता, और गरिमा को खत्म करने के लिए सभी मूल अधिकार, जड़ से खत्म ���रने पड़ेंगे।
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मूल अधिकार के अलावे, राह चलते आदमी के जीवन पर जो असली असर डालता है- वह है दण्ड संहिता।
अंग्रेजो का बनाया IPC-CRPC उखाड़ फेंका है। नई संहिता, आपके लोकप्रिय सांसद ने पास करवा दी है। राष्ट्रपति का साइन हो चुका। लागू चुनाव के बाद, नई सरकार में होगा।
कभी उसके प्रावधान पढ़कर देखिए। नीयत औऱ भविष्य दिख जाएगा। फट कर हाथ मे आ जाएगी।।
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दरअसल, अंग्रेजो की बनाई आईपीसी, अपराधों, सजाओ, परिभाषाओ में में कोई ���ास चेंज नही हुआ है।
स्कोप ही नही था। क्योकि अगर गुलामी के दौर के कानून में कत्ल की सजा फांसी थी, आजाद भारत मे उसे पुरस्कार योग्य तो बनाएंगे नही।
फ्रॉड, चोरी बलात्कार की लीगल परिभाषा, जो अंग्रेजो ने नियर परफेक्ट बनाई थी, उससे बेहतर तो संघी बुद्धि, लिख सकेगी नही।
तो भला, बदलाव क्या किया गया है.. ??
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बदले हैं- आपके हक।
गिरफ्तार करने की शक्ति, हवालात में रखने की अवधि, जमानत की शर्तें, चार्जशीट करने की समय सीमा, बर्डन ऑफ प्रूफ आरोपी पर।
प्रोटेस्ट, विरोध, 144 तोड़ने जैसे मामलों की सजाएं.. छह माह तो कोई भी खाकी धारी सड़ा देगा।
नई संहिता .. अरे, लागू तो होने दीजिए। बड़ा आनंद आएगा।
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नही, आपको नही। उनको.. जिन्होंने अपनी लौह सत्ता का असलहा तैयार कर लिया है। ये बिसात बिछ चुकी है, इसका बिगुल बजाने का महूर्त मई माह से है।
अब सवाल ये कि यह बिसात, ये लौह सत्ता परपेचुएट कैसे हो, प्रोलांग, स्थायी कैसे हो?? इसका क्या अरेंजमेंट हो??
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दरअसल अभी भी चुनाव आयोग, कोर्ट, मीडिया, सब मुट्ठी में तो हैं। लेकिन ये मानवी प्रबंधन से है।
याने अपना आदमी बिठाकर, उन संस्थानो का निकम्मापन सुनिश्चित कर रहे है। लेकिन आदमी का क्या भरोसा.. कब आत्मा जाग जाए।
एक फैसला उल्टा दे दे।
शिराजा बिखर जाये।
तो एकछत्र व्यवस्था, संविधान में ��िखित रूप में रहे। सत्ता चंद मुट्ठियों में, चंद जूतों के तले रहे, उसका प्रबंध, एक नए सम्विधान का सुनहरा सपना है।
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अरे हां, इसे करने के लिए कुल 364 एमपी चाहिए।
400 पार का लक्ष्य, महज महामानव की तीसरी पारी के लिए नही। वो तो 272 में भी उपलब्ध है। 303 में भी.
लेकिन अबकी दांव बड़ा है।
निशाना भी..
नरेंद्र मोदी के ‘चंदे के धंधे’ की पोल खुलने वाली है!
100 दिन में स्विस बैंक से काला धन लाने का वायद��� कर सत्ता में आई सरकार अपने ही बैंक का डेटा छिपाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में सिर के बल खड़ी हो गई।
Electoral Bonds भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला साबित होने जा रहा है, जो भ्रष्ट उद्योगपतियों और सरकार के नेक्सस की पोल खोल कर नरेंद्र मोदी का असली चेहरा देश के सामने लेकर आएगा।
क्रोनोलॉजी स्पष्ट है -
चंदा दो- धंधा लो,
चंदा दो- प्रोटेक्शन लो!
चंदा देने वालों पर कृपा की बौछार और आम जनता पर टैक्स की मार, यही है भाजपा की मोदी सरकार।
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