हसन सिद्दीकी को रिहा करो,
ट्वीट किसी और ने किया, उसपर कारवाई तो हुई लेकिन उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई, हसन ने रिपोस्ट किया, हसन कि गिरफ्तारी हो गई, जबकि कड़ी कारवाई उसपर होनी चाहिए जिसने पोस्ट कि है…
#ReleaseHasanSiddiqi
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के मुस्लिम छात्र शान मोहम्मद ने आरोप लगाया है कि उन्हें #NationalDopeTestingLaboratory में इंटर्नशिप इंटरव्यू के दौरान सिर्फ नाम पूछकर 2–3 मिनट में रिजेक्ट कर दिया गया। उनका कहना है कि उनसे कोई टेक्निकल सवाल नहीं पूछा गया और उन्हें अपनी काबिलियत दिखाने का मौका भी नहीं मिला। इस घटना ने भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल, इस पर कोई आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है।
#ShanMohammad #MuslimStudent #NDTL #Discrimination #EqualOpportunity #IndiaNews #Bias #Transparency
I have spent six years in journalism, and three years ago, I started The Observer Post with a belief that our stories deserve to be told, even when the world chooses to ignore them. In doing so, I knowingly slowed down my own personal growth. My freelancing work almost came to a halt because I wanted to build something bigger than myself. Along the way, there were people who stood with this mission, some even working for half salaries just to keep this platform alive. I remain deeply grateful to all of them. From scratch, we built The Observer Post, expanded into Hindi, and grew into a team of 13 people committed to fearless, ground-level journalism. We were not just reporting news, we were documenting realities that many would rather look away from.
Then came the hardest phase. Two months ago, we had to shut down our office. Our team collapsed from 13 to just 4 people. Our Hindi channel went silent. Everything we had built started slipping away. I reached out to organisations, to those who speak loudly about supporting independent media and the community, hoping someone would step in and help us survive.
No one did.
So I made a choice. I refused to let this platform die.
I went back to the ground alone. I reported stories myself, shot videos, edited some of them, and published them, all while doing a part-time job just to keep The Observer Post alive. From Haryana to Uttam Nagar to Bihar, I have tried to reach every place where stories were being ignored and voices were unheard. I have pushed myself beyond limits because I know if we do not tell these stories, no one will.
But the truth is this fight is not easy.
It is exhausting. It is isolating. It breaks you mentally, emotionally, and financially. Still, I have not given up, and I do not want to.
Today, I am asking you not as an organisation, but as someone who has given everything to keep this alive.
If just 1000 people contribute ₹500 monthly by taking a subscription, we can rebuild. We can bring back our team, hire reporters, bring in video editors, restart our Hindi platform, and strengthen independent journalism that actually reaches the ground. ₹500 may feel small, but together it can bring back an entire newsroom.
This is not just about The Observer Post. This is about making sure our stories are not erased, that truth is not buried, and that voices from the ground are heard, documented, and remembered.
If you have ever watched our work, trusted our reporting, or believed in what we are trying to do, this is the moment to stand with us.
Because if we stop, these stories disappear.
And we cannot afford that.
जेल में मेरे बेटे उमर ख़ालिद से मुलाक़ात
उमर ख़ालिद, जिसे 2020 की दिल्ली दंगों में शामिल होने के झूठे इल्ज़ाम में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था, पाँच साल से जेल में बंद है। उसकी माँ सबीहा ख़ानम ने तिहाड़ जेल में मुलाक़ात का ये बयान लिखा है।
8 जुलाई 2025
जेल में अपने बेटे उमर से मिलकर मेरी रूह को नई ताक़त मिली।
पिछले दो हफ़्ते से उमर का कोई वीडियो कॉल नहीं आया। पता चला टेक्निकल दिक़्क़त की वजह से मुलाक़ात नहीं हो पा रही। बेचैनी होने लगी क्योंकि यही आधी-अधूरी मुलाक़ात का सहारा था। दिल भारी था, आँखों से आँसू टपकते रहे। फिर अचानक ख़ुदा की मर्ज़ी से सीधी मुलाक़ात का ख़्याल ���िल में आया।
पति से कहा तो उन्होंने काम का बहाना किया। मैंने हिम्मत न हारी और अकेले ही जेल चल पड़ी। उम्र के इस पड़ाव पर जेल जाना बहुत मुश्किल काम है। मगर जब इंसान ख़ुदा पर भरोसा रखे तो मुश्किल रास्ते भी आसान हो जाते हैं।
आज महीनों बाद बेटे से आमने-सामने मिलने जा रही थी। दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। इसे सीधी मुलाक़ात कहते हैं मगर ये भी कितनी अजीब है—हमारे बीच दो काँच की दीवारें। एक तरफ हम, दूसरी तरफ उमर। न छू सकते हैं, न साफ़ देख सकते हैं। बस धुँधली सूरत दिखती है और इंटरकॉम से बात होती है।
जुमे के दिन सुबह 9 बजे घर से निकली। तिहाड़ जेल जामिया से बहुत दूर है, रास्ता भी भरा रहता है। करीब एक घंटे में पहुँची। उमर के लिए चमड़े की चप्पल ले गई थी, मगर चेकिंग पर रोक लग गई। बहुत मिन्नतें कीं मगर माने नहीं, चप्पलें वहीं छोड़नी पड़ीं।
अंदर अपनों से मिलने वालों की लंबी क़तारें थीं—औरतें, मर्द, बच्चे। आज ज़्यादा भीड़ लग रही थी। मैं भी एक लाइन में लग गई। पीछे दो औरतें अपने क़ैदियों के बारे में बता रही थी���—एक का बेटा बलात्कार के केस में, दूसरी का देवर भी उसी जुर्म में। मैं चुप रही। सोचा, कैसे बताऊँ कि मेरा बेटा बग़ैर किसी जुर्म के पाँच साल से जेल में सड़ रहा है?
दिमाग़ में उमर की दो बार मिली पैरोल की याद आई—बहन और चचेरे भाई की शादी के लिए सात-सात दिन। वो ख़ुशी के पल कितनी जल्दी गुज़र गए। इन्हीं ख़्यालों में खोई थी कि मेरी बारी आ गई।
फिर उमर के खर्च के पैसे जमा कराने की और लंबी क़तार! क़तारों में ��ितना वक़्त बिताया, उससे कहीं कम वक़्त उमर से बात कर पाई। इसके बाद जेल के भीतर जाने की लाइन लगी।
पहले जूते एक्स-रे से गुजरे, फिर बॉडी चेक हुआ। फिर जेल नंबर 2 तक पैदल चलना पड़ा।
मुलाक़ात वाली जगह पर एक महिला स्टाफ ने पर्ची देखकर प्यार से कहा: "ओह! आप उमर की अम्मी हैं? मैंने उसके दोस्तों को देख�� है, मगर आपको पहली बार देख रही हूँ।" उन्होंने अंगूठे का निशान लगवाया और वेटिंग रूम में बिठा दिया। उनकी बातों में उमर के लिए इज्ज़त झलक रही थी।
मैंने सोचा—ये उमर के अच्छे अख़लाक़ की वजह से होगा। जेल में जहाँ गालियाँ आम बात हैं, वहाँ अदब से पेश आने वाला क़ैदी सबका दिल जीत लेता है। उमर को तो गुस्सा भी बहुत कम आता है। अब जेल के भीतर हर कोई जानता है कि उमर बेगुनाह है, सिर्फ़ सरकारी ज़ुल्म का शिकार है���
वेटिंग एरिया में चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर दिल खुश हो गया। शहरों में हम प्रकृति की इन नेमतों से महरूम रह गए हैं। लगा जैसे जेल की दीवारों के भीतर उड़ने वाली चिड़ियाँ कह रही हों: "हम यहाँ भी आज़ाद हैं।" सोचा—दीवार के इस पार हम ख़ुद को आज़ाद कहते हैं, उस पार उमर जैसे अनगिनत लोग बेबस क़ैद में हैं।
उमर जैसे शख़्स के लिए, जो जंतर-मंतर पर चिल्लात��� था, जो इंसाफ़ के लिए देश भर घूमता था, ये क़ैद बहुत सख़्त इम्तिहान है। पाँच लंबे साल... अगर किताबों का शौक़ न होता तो शायद वक़्त काटना मुश्किल होता। उसने इन पाँच सालों में 300 से ज़्यादा किताबें पढ़ डाली हैं।
तभी लाउडस्पीकर पर उमर ख़ालिद का नाम पुकारा गया। मैं दौड़कर खिड़की के पास पहुँची। उमर ने जेल के भीतर के पेड़ से तोड़ा हुआ एक छोटा सा फूल मेरे लिए लाया था। वो फूल मेरे लिए किसी कीमती तोहफ़े से ���म नहीं था।
काँच और सलाखों के पीछे इंटरकॉम से बात हुई:
"अम्मी, बहुत देर लगा दी। मैं तो काफ़ी देर से इंतज़ार कर रहा था।"
मैंने कहा: "बेटा, क़तारें बहुत लंबी थीं।"
उसने घर के हर सदस्य का हाल पूछा—अब्बू की तबीयत, बहनों का कुशल, बच्चों का हाल। जेल के भीतर की ज़िंदगी के क़िस्से सुनाए। मैं हमेशा की तरह उसके खाने-पीने और सेहत को लेकर परेशान थी:
"तबीयत ठीक तो है? क्या पढ़ रहे हो? बहुत गर्मी तो नहीं लग रही?"
उसने हर सवाल का जवाब दिया और फिर सबका हाल पूछा। बोला: "अख़बारों में अब्बू के कार्यक्रम पढ़ता हूँ। उनसे कहना ज़्यादा सफ़र न करें, अपनी सेहत का ख़याल रखें।"
BREAKING: NEW FOOTAGE SHOWING THE MOMENT ISRAELI INVADED THE MADLEEN FREEDOM FLOTILLA & KIDNAPPED 12 ACTIVISTS
A reminder of names and Nationalities of the Activists and Journalists who were kidnapped:
🇫🇷Baptiste Andre
🇫🇷Reva Viard
🇸🇪Greta Thunberg
🇫🇷Rima Hassan
🇹🇷Suayb Ordu
🇪🇸Sergio Toribio
🇳🇱Mark van Rennes
🇧🇷Thiago Avila
🇫🇷Omar Faiad
🇫🇷Yanis Mhamdi
🇫🇷Pascal Maurieras
🇩🇪Yasemin Acar