आखिरत को अपना मूल मकसद भूलकर ���िंदगी गुजारे।
तो जिस्म की ज़रूरतों के एतिबार से एक आदमी को दुनियावी बनना ही पड़ता है, वरना घर समाज सोसाइटी में रहना दुश्वार हो जाएगा, लेकिन सोच की सतह पर कोई कंप्रोमाइज की गुंजाइश नहीं है।
क़ुरान में तीन चीज़ों को सबसे ज़्यादा अहमियत दी गई है।
1- हर वक्त अल्लाह के Presence में रहना।
अपने हर एक्सपीरियंस को ख़ुदा की याद में तब्दील करना।
2- आखिरत को अपना सुप्रीम ��ोल मानकर ज़िन्दगी गुज़ारना।
यानी ज़रूरत को केवल ज़रूरत के लिए पूरा करना,
क्योंकि बिना ज़रूरत पूरी किये जिंदगी की गाड़ी आगे नहीं बढ़ती, लेकिन मकसद सिर्फ आखिरत को मानकर अपनी जिंदगी के फैसले लेना।
3- हर वक्त शैतान से चौकन्ना रहना, कोई कितना ही बड़ा आलिम तकवा परहेज़गार क्यों ना हो, शैतान कोई न कोई रास्ता तलाश कर लेता है, के आदमी अल्लाह की याद और
हज़रत जलालुद्दीन रूमी हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ की औलाद में थे.
यह वही सिद्दीक़-ए-अकबर हैं जिन्होंने तारीख़-ए-इस्लाम का सबसे पहला वज्द किया जब तबूक के दौरान उनके रब ने उनके लिए पैग़ाम भिजवाया कि अबू-बक्र का रब उसके ईसार पर अबू-बक्र से खुश है.
जिस पर अल्लामा इक़बाल ने लिखा था:
यह वही सिद्���ीक़-ए-अकबर हैं जो तमाम उम्मत को बताते हैं कि मैंने रसूल अल्लाह को फरमाते हुए सुना है कि अली के चेहरे को देखना, उनकी पुश्त की ही ज़्यारत कर लेना, या फिर उनका तज़किरा करना इबादत होता है ।