मध्य प्रदेश सरकार की मंशा एक बार फिर युवाओं और कर्मचारियों के प्रति उसकी उदासीनता को उजागर करती है। हाल ही में 100 प्रतिशत प्रोबेशन सैलरी विवाद को लेकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जहाँ उसने हाईकोर्ट के उस आदेश पर स्टे की मांग की है जो नए कर्मचारियों के पक्ष में था। इस मामले में सरकार द्वारा जवाब दाखिल किया जाना यह साफ दर्शाता है कि शासन नए कर्मियों को उनका पूरा हक देने से कतरा रहा है।
जब नियम के मुताबिक कर्मचारियों को पूर्ण वेतन मिलना चाहिए, तब सरकार का कानूनी दांव-पेंच अपनाकर इस फैसले को टालने की कोशिश करना समझ से परे है। एक तरफ 'विकसित मध्य प्रदेश' और युवाओं के उत्थान के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक और वित्तीय मंचों पर उनके अधिकारों की कटौती के रास्ते तलाशे जाते हैं। इस रवैये से सरकारी सेवा में शामिल होने वाले युवाओं में भारी निराशा और आक्रोश व्याप्त है। सरकार को मुकदमों की राजनीति छोड़कर कर्मचारियों के आर्थिक हितों का सम्मान करना चाहिए।
70%,80%,90% वेतन देने वाला सिस्टम तुरंत बंद होना चाहिए।
यह सभी कर्मचारियों का अधिकार है, उन्हें 100% वेतन मिले।
सरकार से आग्रह है, माननीय हाईकोर्ट के फैसले को तुरंत लागू करें।
5 सितारा पार्टी कार्यालय बन रहे हैं, लाड़ली बहनों को हर महीने राशि मिल रही है, फिर सरकारी कर्मचारियों को 100% वेतन क्यों नहीं?
क्या सरकारी कर्मचारी इस प्रदेश के नागरिक और वोटर नहीं हैं?
सुविधाएँ सबके लिए, तो पूरा वेतन भी सबके लिए!
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