I remember my friend who was from Mithila telling me about this ki main kahin bhi shadi bhi karungi par udhar nahin cuz of this ritual and now first time seeing😭it😭😭i think yes only men can stop this and that pitayi wala devar-bhabhi ritual too ki no not with my biwi😎bhabhis
राजनीतिक मौसम विभाग से प्राप्त सूचना के मुताबिक़ अगले कुछ दिनों में राजस्थान से एक धूल भरी आंधी चलने वाली है। ये मध्य प्रदेश को भी चपेट में ले सकती है। हालाँकि इस बवंडर का वेग किसी को राजस्थान से दिल्ली भी पहुँचा सकता है।
घर के खिड़की दरवाज़े टीवी सब बंद रखें, बस @Viveksbarmeri और मेरे ट्विटर हैंडल को खोले रखें 😄
सांकेतिक वीडियो साभार शुभम
सच कहूं तो मुझे अकेले रहना बेहद पसंद है। ये कोई मजबूरी नहीं, कोई असफलता नहीं और न ही किसी से भागने का ��पक्रम है। ये मेरी चुनी हुई स्थिति और सहज ज़रूरत है। न किसी से बातचीत, न औपचारिक हालचाल, न बेवजह का मेल-जोल। एक बंद कमरा, कुछ खामोशी, और खुद के साथ रहने का पूरा अधिकार बस इतना ही तो चाहिए मुझे।
इस बंद कमरे में मैं खुद से झूठ नहीं बोलता। बाहर की दुनिया में जहां हर मुस्कान के पीछे कोई भूमिका निभानी पड़ती है, यहां मुझे किसी को प्रभावित नहीं करना होता। यहां न अच्छा दिखने का दबाव है, न समझदार साबित होने की हड़बड़ी। यहां मैं जैसा हूं, वैसा ही रह सकता हूं, थका हुआ, उलझा हुआ, चुप या कभी-कभी बिल्कुल खाली।
अकेलापन मुझे डराता नहीं, बल्कि सुकून देता है। भीड़ में रहकर जो घुटन होती है, वह इस खामोशी में नहीं होती। यहां मेरी सांसें मेरी होती हैं, मेरे विचार बि��ा रोक-टोक बहते हैं। यहां कोई बीच में टोकता नहीं, कोई सलाह नहीं देता, कोई ये नहीं पूछता कि “ऐसा क्यों सोचते हो?” इस कमरे में मेरे सवाल भी मेरे हैं और उनके जवाब न मिलने की आज़ादी भी।
मुझे लोगों से शिकायत नहीं है, बस उनसे थकान है। हर बातचीत में खुद को थोड़ा-थोड़ा समझौता करते देखना, हर रिश्ते में उम्मीदों का बोझ उठाना ये सब धीरे-धीरे भीतर कुछ तोड़ देता है। अकेले रहने में कम से कम ये डर नहीं रहता कि कोई मुझे गलत समझ लेगा, क्योंकि यहां मुझे समझने वाला और कोई नहीं सिवाय मेरे खुद के।
इस बंद कमरे में समय अलग तरह से चलता है। यहां घड़ी की सुइयां उतनी निर्दयी नहीं लगतीं। कभी घंटों यूं ही बीत जाते हैं, बिना किसी उपलब्धि के, बिना किसी अपराधबोध के, तो कभी खिड़की से आती रौशनी दीवार पर गिरती है और मैं उ��े देखते हुए सोचता हूं कि जीवन भी शायद इतना ही साधारण है। आता है, ठहरता है, और फिर चला जाता है।
यहां मैं अपनी कमजोरियों से भागता नहीं। उन्हें चुपचाप सामने बैठा देखता हूं। कभी-कभी वे डराती हैं, कभी हंसाती हैं, और कभी सिर्फ थका देती हैं। लेकिन कम से कम वे सच्ची होती हैं। बाहर की दुनिया में जिन ताकतों का दिखावा करना पड़ता है, उनकी यहां कोई ज़रूरत नहीं।
अकेले रहने का मतलब ये बिल्कुल नहीं कि मुझे किसी की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत तो होती है, बहुत होती है। लेकिन हर ज़रूरत को किसी इंसान पर थोप देना भी ठीक नहीं। कुछ खालीपन ऐसे होते हैं जिन्हें बस स्वीकार किया जा सकता है, भरा नहीं जा सकता। ये समझ मुझे इस अकेलेपन ने दी है।
इस कमरे में बैठकर मैं अपने बीते हुए कल से भी मिलता हूं। वे यादें जो लोगों के बीच रहते हुए दब जाती हैं, यहां खुद-ब-खुद सामने आ जाती हैं। कुछ अच्छी, कुछ कड़वी, कुछ अधूरी। मैं उन्हें ठीक क���ने की कोशिश नहीं करता, बस उन्हें रहने ��ेता हूं। शायद यही परिपक्वता है, हर चीज़ को सुधारने की ज़िद छोड़ देना।
मुझे पता है, बहुत से लोग इसे उदासी कहेंगे, कुछ इसे अवसाद समझेंगे, और कुछ इसे असामाजिकता का नाम देंगे। लेकिन मेरे लिए ये शांति है। एक ऐसी शांति जो बाहर की हंसी-ठहाकों में नहीं मिलती। ये शांति मुझे खुद के करीब ले जाती है, और शायद यही सबसे ईमानदार रिश्ता है खुद के साथ।
मैं जानता हूं कि जीवन यूं ही बंद कमरे में नहीं गुजरेगा। बाहर निकलना पड़ेगा, बोलना पड़ेगा, निभाना पड़ेगा। लेकिन जब भी मौका मिलेगा, मैं फिर इसी खामोशी में लौट आऊंगा। क्योंकि यहीं मैं खुद को बिना किसी शर्त के स्वीकार कर पाता हूं।
और सच कहूं तो इस अकेलेपन में मैं टूटा हुआ नहीं हूं। मैं बस शांत हूं। थोड़ा थका हुआ, थोड़ा समझदार, और बहुत हद तक वास्तविक। यही मेरी डायरी का सबसे सच्चा पन्ना है जहां कोई दर्शक नहीं, कोई जज नहीं, सिर्फ मैं हूं और मेरी खामोशी...! 🖤
राघ��ेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
करीब दो दशक पहले भारतीय मूल के एक अमेरिकी लेखक का लेख पढ़ा था- द ग्लोबल मैन। जिसमें उसने लिखा था कि दुनिया एक जैसी होती जा रही है। स्थानीयताएँ खत्म होती जा रही हैं। उसने लिखा था कि दुनिया भर में यात्रा करता हूँ। दुनिया भर में एक जैसे होटल हैं, एक जैसा खाना-पीना मिल���ा है। आपको यह महसूस ही नहीं होता कि आप किसी भिन्न संस्कृति में हैं। लेखक का नाम भूल गया लेकिन उसकी यह बात याद रह गई।जब भी अपने बचपन के शहरों में जाता हूँ तो मुझे वहाँ दिल्ली ही दिल्ली दिखाई देता है। वहाँ की अपनी स्थानीयताएँ विलुप्त होती जा रही हैं। बड़े-बड़े ब्रांड के स्टोर, बड़े-बड़े रेस्तराँ। किसी में स्थानीय खान-पान नहीं। आप नैनीताल चले जाइए तो बटर चिकेन आपको बड़े आराम से मिल जाएगा लेकिन व���ाँ का अपना खाना नहीं मिलेगा। मुज़फ़्फ़रपुर अपने चाट के लिए प्रसिद्ध था। अब हर सौ कदम पर मोमो बिक रहे हैं। चाट के बारे में पूछने पर लोग बुरा मान जाते हैं। कहते हैं कि हल्दीराम आ गया है, डोमिनोज, पिज़्ज़ा हट आ गया है और आप हैं कि चाट युग में ही फँसे हुए हैं। सीतामढ़ी की मूढ़ी-घुघनी के सामने अच्छा अच्छा खाना फेल था लेकिन वहाँ मोमो की ऐसी ऐसी ��़िस्में मिलने लगी हैं कि मोमोज की आत्मा भी रोती होगी। लोग खुश हैं कि अपने शहर में रहकर ही महानगर जैसे कपड़े पहन रहे हैं, महानगर जैसा खाना-पीना हो रहा है और क्या चाहिए। अपनी स्थानीयता को बचाने की कोई जागरूकता भी नहीं दिखाई देती।
दुःख होता है कि विकास का मतलब हम लोगों ने यही समझा है कि अपना आपा छोड़कर किसी और के जैसा हो जाना।
जो जहाँ है वह वहाँ जैसा नहीं रहना चाहता है!