देखो इस मासूम मुस्लिम नौजवान को जिसे भगवा आतंकी भीड़ ने घेर के तब त�� मारा जब तक इस लड़के की मौत नहीं हो गई 😡
जयपुर के रामगंज निवासी मौहम्मद इक़बाल (18 ) की गंगापोल बाज़ार में मॉब लिंचिंग में गई जान, भीड़ ने इक़बाल पर लाठी डंडों व सरियों से वार किया जिसके बाद उसकी मौके पर ही मौत हो गई, इक़बाल और राहुल की बाइक आपस मे टकरा गई थी जिसके बाद भीड़ ने उस पर हमला किया और मौत के घाट उतार दिया, इक़बाल की मौत के बाद जयपुर में सांप्रदायिक तनाव जैसी स्तिथि बनी हुई है! पुलिस ने इक़बाल की हत्या के मामलें में 15 लोगों को नामजद कर 9 लोगों को हिरासत में लिया!
ब्राह्मणों के मोहल्ले में एक यादव जी रहते थे
जो रोजाना चिकन बना कर खाते थे चिकन की खुशबू से परेशान होकर पंडितों ने महंत (मंदिर के बड़े पुजारी) से शिकायत कि
महंत ने यादव जी को कहा कि आप भी ब्राह्मण धर्म अपना लो जिससे किसी को आप से कोई शिकायत ना हो
यादव जी मान गए...
तो महंत ने यादव जी पर गंगाजल छिड़कते हुए संस्कृत में कहा कि तुम पैदा अहीर हुए थे पर अब तुम ब्राम्हण हो
अगले दिन फिर यादव जी के घर से चिकन की खुशबू आई
तो सब पंडितों ने फिर महन्त से शिकायत की
अब महंत पंडितों को लेकर यादव जी के घर गए तो देखा यादव जी चिकन पर गंगाजल छिड़क रहे थे
और कह रहे थे... तुम पैदा तो मुर्गा हुए थे, पर अब तुम आलू हो..
(नोट- ये पोस्ट खूब वायरल है लेकिन मैंने कुछ बदलाव किया है इसमें)
हमारे भाई और सांसद दानिश अली जी पर अभद्र टिप्पणी करने वाले भाजपा के सांसद को जिसने सदन की गरिमा को तार- तार किया है और जिसने मनवत्व के परिप्रेक्ष्य की गरिमा गिराई है, मेरी मांग है कि ऐसे द्वेष और द्रोह की भावना रखने वाले सांसद को तुरंत बर्खास्त किया जाए��
राहुल गांधी जी मेरा हौसला बुलंद करने आए।
उन्होंने कहा- खुद को अकेला मत समझिए। इस देश का हर व्यक्ति जो लोकतंत्र में विश्वास रखता है वो आपके साथ है।
: BSP सांसद दानिश अली जी
इंसान की पहचान चेहरा नहीं; ज़ुबान होती है।
सत्ता के नशे में बेसुध भाजपा के एक सांसद द्वारा विपक्ष के एक अल्पसंख्यक सांसद को अति अभद्र तरीके से संबोधित करना किसी आपराधिक घटना से कम नहीं है। ये भाजपा की नकारात्मक राजनीति का निकृष्टतम रूप है जिसमें अन्य भाजपाई सांसदों का हँसते हुए सम्मिलित होना दिखाता है कि ये किसी एक भाजपाई की गलती नहीं है बल्कि ये भाजपा के अधिकांश सदस्यों की निर्लज्जता का बेशर्म प्रदर्शन है।
ऐसे सासंदो पर, किसी भी प्रकार की संसदीय विशेषाधिकारों की छूट से परे, किसी एक सांसद नहीं बल्कि पूरे संसद और संविधान की मानहानि करने का मुक़दमा होना चाहिए और ताउम्र की पाबंदी भी।
क्या #RSS की शाखाओं और @narendramodi जी की प्रयोगशाला में यही सिखाया जाता है? आपका कैडर जब एक चुने हुए ��ांसद को भरी संसद में आतंकवादी, उग्रवादी, मुल्ले…जैसे शब्दों से अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता तो वो आम मुसलमानों के साथ क्या करता होगा? यह सोच कर भी रूह काँप जाती है।
क्या ये केवल संयोग है, कि एक तरफ अडाणी से पूछा ��ा रहा है कि गुमनाम श्रोत से आए वो 20 हजार करोड़ रुपए किसके थे.? और दूसरी तरफ CAG की रिपोर्ट कह रही है, कि सरकारी खजाने से 21 हजार करोड़ रुपए गायब हैं... तो क्या अडाणी को अमीर बनने के लिए मोदीजी सरकारी खजाना लुटा रहे हैं.?
थेम्स के किनारे इस खूबसूरत भवन में ब्रिटिश पार्लियामेंट बैठती है।
कोई 900 साल पुराना ये भवन कई बार पुनर्निर्माण किया गया। वर्तमान स्वरूप में कोई 500 साल से है। हाल में गोथिक आर्किटेक्चर के, इस सबसे जाने पहचाने नमूने का रिस्टोरेशन चल रहा था।
यहां हाउस ऑफ लॉर्ड्स है, हाउस ऑफ कॉमन्स है, चर्च है, सीमेटोरी है। मदर ऑफ आल पार्��ियामेंट के नाम से जानी जाती है।
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वेस्टमिंस्टर मॉडल, दुनिया मे गवरनेंस का एक सफल मॉडल है। भारत मे इसी मॉडल का लोकतंत्र चलता है। मगर ब्रिटेन अनोखा देश है, जो लोकतन्त्र है, मगर रिपब्लिक नही।
ये किंगडम है,
"यूनाइटेड किंगडम."
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हाउस ऑफ कॉमन्स जब बना था, इसमे 500 से अधिक सदस्य थे, जो बढ़ते बढ़ते 700 सदस्य हो गए।
मगर सीटें यहां आज भी 478 हैं।
दायें नीचे की तसवीर में हाथ बांधे खड़े लोग, कोई मार्शल या प्यून नही। ये राइट ऑनरेबल एमपी साहबान हैं।
बहुमत से जीकर अंदर आए हैं।
खडे हैं, क्योंकि जगह नही है।
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सदन में जो पहले आता है, सीट पर बैठ जाता है किसी बस या रेल के अनारक्षित डिब्बे की तरह। लेकिन महिलाओं, वृद्ध सदस्यों या वरिष्ठ को देखकर कुर्सी छोड़ दी जाती है।
या आगे पीछे खिसककर, चिपककर, ��िसी तरह अपने साथी को स्पेस दे दिया जाता है। किसी को नाम लिखी चौड़ी सीट नही मिली।
नए एमपी पीछे बैठते है। सीनियरिटी और अनुभव के साथ, केंद्र की ओर बढते है।
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सदन में भीड़ हमेशा नही होती। पर जब वोट ऑफ कॉन्फिडेंस हो, बजट या महत्वपूर्ण बहस हो, थ्री लाइन व्हिप जारी हुए हो, तब पैक्ड हाउस होता है।
पैक्ड हाउस, याने बैठने की जगह नही। सौ से उपर सांसद, कोने-किनारे मे जगह देखकर खड़े रहते हैं।
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हर सीट पर म���इक नही। बाबा आदम तकनीक का एक माइक होता है, जो उपर लटके तार पर झूलता है। वक्ता बदलने के साथ, सरककर दूसरे वक्ता के पास आ जाता है।
पुरानी ओक और वालनट की लकड़ी की बनी बेंच। साधारण गद्दियाँ, ठूंसे हुए लोग ..
ऐसा नही की ब्रिटेन के पास, एक सुसज्जित, सर्वसुविधायुक्त, नई पार्लियामेंट बनाने के लिए पैसा नही।
उनके पास दुनिया का सबसे ज्यादा पैसा है। ब्रिटेन तो दुनिया के काले सफेद पैसे का स्टोरहाउस है। मगर यह भवन उनकी अस्मिता है, उनका गौरव है,
उनका इतिहास है।
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कभी ये भवन, दुनिया के चौथाई हिस्से की किस्मत तय करता था। इसके फर्श ने, दुनिया के हर मशहूर शख्स की कदमबोसी की है।
यहां क्रामवेल की आवाज गूंजी, चर्चिल ने "नेवर सरेंडर" कहा। फ्रेंकलिन ने "नो टैक्सेशन - विदाउद रिप्रेजेंटेशन' की हुंकार भरी। वो शब्द, वो लम्हे, वेस्टमिंस्टर की दीवारों में जज्ब ह��कर गूंजते हैं।
तो भवन मे आया, एक नया MP भी ब्रिटेन के इतिहास से जुड़ जाता है। उस गरिमा के सागर की एक बूंद हो जाता है। यह होना एक गंभीर अनुभूति है।
ये अनुभूति सहेजकर, सीने से लगाकर वे खड़े होते हैं। इस भवन में उनके राष्ट्र की जड़ें हैं, जड़ों में उनकी आस्था है। यह आस्था, यहां हुई बहसें, यहां बनी परम्पराएं ही तो ब्रिटेन का संविधान है।
भला कोई चम��माता शीशे का सुसज्जित भवन, भव्यता और LED स्क्रीनों के साथ, इस गौरव का मुकाबला क्या ही करेगा?
तो सांसद खडे़ रहेंगे.. पर कहीं और न जाऐंगे। जी हां, एक बार नए भवन का प्रस्ताव भी आया था।
बुरी तरह से खारिज हो गया।
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हंगर इंडेक्स में 101 वें स्थान पर खड़ा देश, 20 हजार करोड़ खर्च कर नई पार्लियामेंट, नई राजधानी बना रहा है।
क्योकि नए नाजी रेजीम को, भारत की छाती पर अपने स्मृति चिन्ह खुरचने है। ख्याली विश्व गुरु को एक भव्य नई जर्मनिका चाहिए। जिसके चप्पे चप्पे में उसके शिलापट्ट लगे हों।
तो वो पुरानी इमारत, जहां भारत को आजादी मिली, परवान चढ़ी। जहां भारत के बेहतरीन स्पीकर, सभासद, वक्ता, प्रधानमंत्री, स्टेट्समैन बैठे...
जहां सरदार, अंबेडकर, शास्त्री, अटल, की आवाज गूंजी.., जहां एक खंभा आज भी भगतसिंह के "बहरो के लिए किए गए धमाके" के निशान लिए खड़ा है ।
जहां "ट्रिस्ट विद डेस्टिनी" की बात हुई। जहां हमने पक्ष और विपक्ष का एका देखा। जहाँ नम निगाहों से टकटकी लगाई जनता ने, दिल हरा करने वाले भाषण सुने,
जहां हम भारत के लोगों ने अपना संविधान लिखा, और आत्मार्पित किया।
वह सन्सद .. !!!
हिंदुस्तान के लोगों, सुनो !! अब वो छोटी हो गयी है। आज वह त्याग दी गयी है।
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हमारे जियालो की न्यौछावर जिंदगियों से मिली आजादी, आज नकली हो गई। गांधी के लहू से सने गोडसे को आजादी मिल गयी है।
इतिहास का गौरव जगाने वाले, हमारे इतिहास की गौरवमयी इमारत को लात मार चुके। अब लोकतन्त्र को, उसके बचे खुचे प्रतीकों को लात मार रहे हैं।
क्या हमे सोचने की जरूरत है।
सोचिये।
सोचिये, कि हमें क्या सोचने की जरूरत है। क्या तुरन्त, किसी को रोकने की जरूरत है?