सिंगापुर, एक छोटा सा द्वीप। कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं। फिर भी विकसित। टैक्स बहुत कम। कारोबार के लिए स्वर्ग। यहाँ का हर व्यक्ति समृद्ध है।
मलय प्रायद्वीप के अंतिम छोर पर, मलक्का जलडमरूमध्य के दक्षिणी सिरे पर स्थित सिंगापुर भारत-चीन व्यापार मार्ग के बीच में पड़ता था। इसे एक व्यापारिक चौकी की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। 200 साल पहले अंग्रेज पहुँचे और इसे एक फ्री पोर्ट बना दिया।
ये एक व्यापारिक केंद्र बन गया। बाहर से सामान आते, फिर कहीं और भेजे जाते। 1869 में स्वेज नहर खुली। ब्रिटेन, भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और सुदूर पूर्व के बीच व्यापार को सिंगापुर ने सुगम बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ये रफ़्तार धीमी पड़ी। चीन भी तब ग़रीबी से जूझ रहा था। कोई रास्ता न देख सिंगापुर 1963 में मलेशिया संघ में शामिल हो गया। ये विलय असफल रहा, 2 साल बाद सिंगापुर फिर अलग हो गया। फिर ऐसा क्या हुआ, जिसने आज के सिंगापुर को निर्मित किया?
यही वो समय था जब सिंगापुर ने विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अपना निर्यात बाजार बनाया। MNCs को जमकर आकर्षित किया। यही बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सिंगापुर के विकास का इंजन बनीं। फिर विदेशी बैंकों को वहाँ आमंत्रित किया गया। फिर बंदरगाहों को विकसित कर समुद्री व्यापार पर ध्यान केंद्रित किया गया। ट्रेड यूनियनों (मजदूयर), नियोक्ताओं व सरकार - तीनों ने साथ मिलकर कार्य किया। बेरोज़गारी कम हुई, आय बढ़ने लगी। 1970 के दशक में कंपनियों को तकनीक व अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ाया गया, जिससे कर्मचारियों के वेतन बढ़े।
लेकिन, 1985 में मंदी आ गई। सरकार ने वेतन काटने की जगह रिटायरमेंट वाले फंड CPF को कम किया। बिना वेतन घटाए बोझ कम हुआ। मंदी से देश निकला और 10% के विकास दर से बढ़ने लगा। MNCs को वहाँ मुख्यालय स्थापित करने को कहा गया। कर्मचारियों की री-स्किलिंग पर भारी निवेश हुआ। पर्यटन को बढ़ावा दिया गया। कॉरपोरेट आयकर दरें घटाकर GST लागू किया गया। ये सब 1997 तक चलता रहा।
1997 में फिर पूरा एशिया आर्थिक संकट से गुजरा। सिंगापुर के पास उधारी नहीं थी, लोग उसे सुरक्षित मानकर वहाँ पूँजी लगाने लगे। सरकार ने निगरानी की व्यवस्था सुधारी। सख़्ती घटाई। ये वित्तीय संस्थानों के लिए और आकर्षक बन गया।
फिर आया ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था का काल। R&D की क्षमताओं का विकास किया गया। सेमीकंडक्टर और बायोमेडिकल जैसे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाने लगा। नए स्टार्टअप पैदा होने लगे। विदेश से विशेषज्ञ कर्मचारियों के लिए रास्ते खोले गए। शिक्षा व्यवस्था में रटंत पढ़ाई की जगह सीखते रहने की विधा को महत्व दिया गया। 2000 के शुरुआती वर्षों में ही डिजिटल फाइबर नेटवर्क से लेकर इंटरनेट तक में भारी निवेश कर दिया गया। उधर नए एयरपोर्ट टर्मिनल-बंदरगाह बनते रहे।
आज सिंगापुर समृद्ध है। वहाँ GDP पर पैपिटा इनकम भारत से 37 गुना अधिक है। सिंगापुर खुला बाजार बना रहेगा, वो नए-नए साझीदार खोज रहा है। AI के क्षेत्र में वो आगे बढ़कर कार्य कर रहा है। इधर भारत में जबतक सरकारें जातियाँ गिनने पर बहस कर रही हैं, सिंगापुर अपने बहु-नस्लीय समाज को एकजुट रखने के लिए कार्य कर रहा है। यही अंतर है।
श्यामलाल यादव जी देश के सबसे बड़े पत्रकार हैं,
RTI में उनका सानी दुनिया मानती है,
India Today, इंडियन एक्सप्रेस जैसे बड़े संस्थानों में क़ाम कर चुके हैं,
लेकिन आपने इनको कभी Tv डिबेट्स में नहीं देखा होगा,
वहाँ सिर्फ हर्षवर्धन त्रिपाठी जैसे स्टिंगर्स बुलाए जाते हैं,
श्यामलाल यादव के सामने जिनकी हैसियत इंटर्न जैसी भी नहीं है,
क्योंकि सबको पता है कि
अपने तर्क और तथ्यों से श्यामलाल यादव
कथित मेरिट की सब पोल खोल देंगे
जैसे आज खोल रहे हैं,
Megha Prasad shows the mirror to reservation flagbearer Chirag Paswan on his privileged life. For someone of his kind, it's bang on reality check of hypocrisy and bias!
वैसे भाटी जी हिन्दी फ़िल्मों के बड़े शौकीन लगते हैं…हसनपुर, अमरोहा से टिकट मांग रहे हैं जिसके लिए ये सारे जतन कर रहे हैं…
कल एक अस्पताल भी गए थे भर्ती होने, अस्पताल वालों ने भर्ती करने से मना कर दिया…भाई पैसा भी दे रहा था तब भी…
अमरोहा से जिला बदर हैं, सम्भल में सरकारी पैसे के हेरफेर के चलते इनसे लाखों की वसूली होनी है…
इनकी पत्नी ने गलत education certificate लगाए थे सिपाही भर्ती में जिसे विभागीय जांच में सही पाया गया और उत्तम गुर्जर को बर्खास्त कर दिया गया था…!!
#नेपालबाढ़ में बीच पर विशाल कालां #शालिग्राम तेजी से वायरल हो रही है।इस पर गोलाकार और चक्र भी दिखाई दे रही है।कहा जा रहा है कि हजारों-लाखों वर्षों से हिमालय की बर्फ और चट्टानों के नीचे दबा हुआ विशाल शालिग्राम है,जो बाढ़ और तेज बहाव के कारण नदी के सामने आ गया
#NepalFlashFlood
मित्र @thekumarshyam की नई पहल। हमने एमेजॉन से @TharohiOrganics का गाय का घी मँगवाया! मेरी शुभकामनाएँ कि वो उत्तरोत्तर उन्नति करें। मित्रमंडली में अचार वाले, मधु वाले @MukeshPathakji और घी वाले श्याम हो गए हैं। यही लेते हैं शुद्धता की गारंटी!
आरक्षण पर बहस तेज है, लेकिन ज़रा इस बच्चे को देखिए, माँ की गोद में कुपोषण से जूझता हुआ, दवा तक ठीक से नहीं मिल पा रही।
मुसहर समाज आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। सवाल सिर्फ आरक्षण का नहीं, बराबरी के अवसर और सामाजिक न्याय का है।
क्या हम यह सवाल नहीं पूछेंगे कि जिन समुदायों की स्थिति आज भी इतनी दयनीय है, उनके लिए व्यवस्था में पर्याप्त अवसर और प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है?
(पत्रकार महोदय का आभार, ये दृश्य हम सभी तक पहुँचाने के लिए)
बिहार ओपन स्कूल एंड एजुकेशन बोर्ड के डिप्टी डायरेक्टर अजय कुमार सिंह ने
बच्चों के लिए 1600 वाली बेंच 5000 में खरीदी
2 लाख की बोरिंग कराई, जहाँ 5 लाख खर्च होने थे वहाँ 30 लाख खर्चा दिखाया।
ये सब करके अपनी पत्नी के लिए पटना में 3 करोड़ का मकान बनवाया!
बताओ क्या ग़लत किया???
अमित जी, आप एक गाय पालो और बिलौना पद्धति से एक किलो घी निकालो और फिर उसे दिल्ली तक सुरक्षित भेज दो। मैं इसके ₹3000 भी दे दूँगा। कारण: मैं स्वयं घी नहीं खाता, मेरे बच्चे के लिए चाहिए और वहीं से लूँगा जहाँ आश्वस्त होऊँ।
यह एक किलो ही दो महीने चल जाएगा। मुझे नहीं लगता है कि मुझे इसके लिए प्रचार के पैसे की आवश्यकता है। चूँकि आपको सस्ता मिल रहा है, तो आप वही ले लीजिए। मेरे घर में गाय है, घी निकलता है, इसलिए मुझे पता है कि 2000 में भी अच्छा घी मिल जाए तो वह भाग्य ही है।
बाकी, आपकी इच्छा है। कोई विवशता नहीं है कि आप ले ही लीजिए। यह मेरा व्यक्तिगत चुनाव है कि मैं क्या लूँ, क्या न लूँ।
स्मिता प्रकाश:- पतंजलि के प्रॉडक्ट क्या 100% स्वदेशी है
बाबा रामदेव:- बिल्कुल 100% स्वदेशी है, मैने तो सुप्रीम कोर्ट मे भी यही बोला
स्मिता:- और आपको फिर वहां माफी मांगनी पड़ी थी
बाबा:- वो माफी तो जबरदस्ती की थी
स्मिता:- आपका नाम राम कृष्ण यादव था
बाबा:- देखो आपने भी यादव बोल दिया, यही खुराफात ठीक नही लगती
मै साधू हूं तो आपने जातिसूचक शब्द क्यो बोला मुझे आपत्ति है
-40 वाले डॉक्टर अभी नियुक्त भी नहीं हुए, लेकिन उससे पहले 0 नंबर वाले अपना जलवा बिखेर रहे हैं।
Community Health Officer (CHO) कलेक्टर के सामने BP भी चेक नहीं कर पाई, तोइन्होंने MBBS में क्या गुल खिलाए होंगे, यह आप आसानी से समझ सकते हैं।
इनसे इलाज के लिए अधिकांश बहुजन ही आते होंगे। ये आरक्षणवादी सामाजिक न्याय के नाम पर अपने ही लोगों को मार रहे हैं।
आरक्षण के समर्थन में वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव सर ने जो कहा वह एकदम परफेक्ट है।
"जहां आरक्षण नहीं है, पहले वहां तो बराबरी की व्यवस्था लाइए, अगर ऐसा नहीं करते तो स्वाभाविक है कि मन में खोट है।"