"प्रज्ञा" छोड़नी है... मतलब "दारू पीना" या बुरे काम करना नहीं है.... साधारण लोग उसका गलत मतलब निकाल लेंगे.....
साधारण इंसान कैसा तर्क लगायेगा???
"दारू नहीं पीना" मतलब प्रज्ञा होती है
और "प्रज्ञा छोड़नी है" मतलब "दारू पीना है"....
ऐसा अर्थ लगाएगा....
अर्थ का अनर्थ....
असंग-वसुबंधु ने "औंचित्य विमुक्ति" का जो मार्ग बताया है.... उसका भी गलत अर्थ मत निकालना....
नहीं समझ में आ रहा है तो चुप बैठ जाना....
उल्टे घोड़े मत दौडाना....
"interpretation" या "अर्थ" निकालने में थोड़ी भी चूक हुई तो सीधे "नर्क" में जाओगे.... नीचे....
त्यागी भिक्षु भी "औंचित्य विमुक्ति" के लिए योग्य नहीं है.... आप सांसारिक लोग तो बहुत दूर की बात हो
भगवन तथागत ने भिक्षुओं के पास भी जिक्र नहीं किया है
भगवन तथागत कहते है: मैं कोई भी ज्ञान केवल योग्य व्यक्ति को देता हूं
वो बोधिसत्व का नॉलेज है.... उसके भीतर ज्यादा मत जाना....
प्रज्ञा विमुक्ति मतलब "औंचित्य विमुक्ति"....
मतलब निराकार चेतना की उपस्थिति.....
ना आप कोई व्यक्ति हो,,, ना सामने कोई वस्तु है.... केवल विज्ञप्ति मात्रम्.....
इतनी highest प्रज्ञा हैं क्या आपके पास???
अपना "घर बार" अनाथ आश्रम के नाम कर दो....
पता चल जाएगा "अहंकार" कितना है....
भगवन तथागत कहते है कि मृत्यु के बाद "सूक्ष्म प्रज्ञा" के कारण "अरूप ध्यान" ने अटक भी गए तो कोई दिक्कत नहीं है... "नैवसंज्ञान ध्यान" में एक क्षण आएगा,, वहां से मुक्ति होजाएगी
"औंचित्य विमुक्ति" साधारण लोगों का काम नहीं है.... वो highest प्रज्ञा वाले "बोधिसत्व" लोगों का काम है....
बुरी चीजें न करना मतलब "प्रज्ञा"....
फिर प्रज्ञा की विमुक्ति कैसे होगी??
साधारण इंसान ये तर्क लगायेगा कि अब उसको बुरी चीजें करनी चाहिए ताकि "प्रज्ञा विमुक्ति" होजाये....
ये खतरनाक है....
सर्वसाधा��ण इंसान यही तर्क लगाना शुरू करेगा.... भगवन तथागत जानते थे....
भगवन तथागत के अनुसार "प्रज्ञा विमुक्ति" के लिए बहुत highest प्रज्ञा पहले से ह���नी चाहिए,,, वरना उसका परिणाम खतरनाक हो सकता है....
आप "औंचित्य विमुक्ति" का ज्ञान साधारण लोगों को नहीं दे सकते.... वो अर्थ का अनर्थ कर देंगे....
भगवन तथागत ने भिक्षु संघ को सिर्फ इतना बताया है कि "प्रज्ञा" को मुक्ति का टूल बनाओ
भगवन तथागत ने कभी भी भिक्षु संघ को "प्रज्ञा विमुक्ति" का ज्ञान नहीं दिया है
भगवन तथागत ने एक बात कही है कि:
मैं किसी से कुछ छुपाता नहीं हु,, मैं बस कोई भी ज्ञान केवल योग्य व्यक्ति को देता हूं
"बोधिसत्व विमलकीर्ति" दारू के अड्डे पे लोगों से बातें करने जाते थे,,, पर दारू नहीं पीते थे
क्यों कि "न दारू अस्तित्व में है,, न विमलकीर्ति...."
तो फिर पियेगा कौन??
मतलब "देखने वाला व्यक्ति" और "देखी जाने वाली वस्तु" दोनों ही अस्तित्व में नहीं है... यही है "औंचित्य विमुक्ति"....
महायान कहता है कि: परिणाम होने से पहले विषय को जानो... उसे समझो....
वज्रयान कहता है:
केवल परिणाम को पकड़ो.... उसको जानने के चक्कर में परिणाम पीछे छूट जाता है
"महायान" अंध-परिवर्तन की बात नहीं करता....
"व���्रयान" सिर्फ परिवर्तन की बात करता है,, फिर वो अंध तरीके से ही क्यों न हो
"अस���ग-वसुबंधु" कहते है:
"यदि कोई व्यक्ति कहे कि यही विज्ञप्ति मात्रता है तो वो किसी कारणवश ही ऐसा कहता है,, अतः वो विज्ञप्ति मात्रता में स्थित नहीं होता "
मतलब विज्ञप्ति मात्रता को समझने का "कारण" शेष है,, और जहां कारण शेष है वो तथता नहीं है.... मतलब वो विज्ञप्ति मात्रता नहीं है
"ग्राह्यग्राहक भाव से रहित होना ही धर्म का वास्तविक स्वरूप होता है,, इसलिए परिनिष्पन्न में निस्वार्थ नि:स्वभावता है....
सभी काल में उसी रूप में बने रहने के कारण वो तथता है और वही विज्ञप्ति मात्रता है...."
- महाया��� "योगाचार विज्ञानवाद"
- आचार्य असंग-वसुबंधु 🌿🌿
महायान का अभ्यास-स्तर बहुत स���क्ष्म है.... महायान का डिस्क्रिप्शन इतना सुंदर है कि आप यकीन नहीं करोगे....
"वज्रयान" डिस्क्रिप्शन को नहीं मानता....
"वज्रयान" कहता है कि "विश्लेषण" परिणाम को ढीला और सूक्ष्म कर देता है....
" क्या ख्यात होता है??
- अभूतपरिकल्प ख्यात होता है
किस प्रकार ख्यात होता है??
- ग्राह्य और ग्राहक इन दो रूपों में ख्यात होता है
उस असत्परिकल्प की नास्तिता क्या है??
-उस विज्ञप्ति मात्रता में जो ग्राह्यग्राहकद्वय का अभाव है, अर्थात् अद्वधर्मता है... वही सार्वकालिक तथता है...."
जिस प्रकार आम के लिए "पेड़" की उत्पत्ति होती है वैसी ही "चेतना" की उत्पति "संज्ञा (फल)" के लिए होती है
जिस प्रकार पेड़ का उद्देश्य "आम" देना है....
वैसे ही चेतना का उद्देश्य संज्ञा आधारित "फल" देना है
संज्ञा मतलब "कर्म फल का संचय" है....
पर वो केवल चेतना के साथ प्रवाहित होती है
आम के पेड़ पे जब आम आते है तो वो पहले से कहीं पे "स्टोर" होते है क्या??? नहीं....
वो परिणाम स्वरूप प्रवाहित होते है....
वैसे ही "संज्ञा" चेतना के साथ प्रवाहित होती है
"फल" देना है इसलिए पेड़ आया है...
"आम" के आने के लिए पेड़ की उत्पति होती है,,
पेड़ के लिए "आम" नहीं आया है....
तो आंबेडकर जी जैसे विद्वान कहते है:
यदि चेत��ा "संज्ञा" को प्रवाहित कर रही है तो फिर हमे चेतना को आत्मा मानना पड़ेगा
Confusion
वास्तव में,, कर्म संचित नहीं होते,, वो केवल प्रवाहित होते है... जैसे आम का पेड़ उगने के बाद उसपे आम आजाते है... उसका अर्थ ये नहीं है कि "आम" संचित है
- फिर संज्ञा कहीं तो स्थाई होगी,, क्या उसको आत्मा माने??
: नहीं??
"संज्ञा" अस्तित्व में नहीं है,, केवल वो चेतना के साथ प्रवाहित होती है... मूलतः "संज्ञा" अस्तित्व में नहीं है....
भगवन तथागत कहते है:
"कर्म" संचित नहीं होते है,, केवल प्रवाहित होते है....