ये ठीक बात नहीं कि राष्ट्र के भविष्य को ऐसे शिक्षकों के हाथ में सौंप दिया जाए जो स्वयं ही अयोग्य हो। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे आरक्षण का क्या ही मतलब जो शिक्षा का स्तर गिराता ही चला जाए। दुनिया में बदलाव लाना है तो पुरानी नीतियों में भी परिवर्तन लाना आवश्यक है।
कविता - १
जवानी के इस मोड़ में,
सफलता की भाग दौड़ में,
एक सवाल बार बार
खुद से पूछ रही हु
क्या इस बीच में कही
मैं खुद को खो रही हु?
क्या सफलता है मेरी जीत,
या जीत है कुछ और,
अंदर बाहर दोनो ओर,
मचा हुआ सा है एक शोर
इस शोर से मजबूर मैं
क्या शांति का एक
कही कोना ढूंढ रही हू?
कविता -४
जाऊ मैं किस ओर,
आखिर है कहा मेरी डगर?
असल जीत, असल रहस्य जानना जरूरी है मगर
बस इसल���ए बार बार अपनी
आंखे मूंद रही हु
मैं खुद को खुद में यूंही ढूंढ रही हु।
कविता - ३
हु मैं आखिर कौन?
हु मैं आखिर क्यों?
कौन बताएगा मुझ���
मुझमें छिपा क्या कोई रहस्य?
या खुद ही मैं कोई रहस्य?
इन सवालों के जवाब में
कर रही खुद से बहस
कविता- २
रोज रात वो आती है
फिर उजियारा आता है
सुख दुख, हार जीत
क्या जीवन की यही गाथा है?
ये बात मुझसे है परे
मुझे कुछ समझ न आता है।
समय के इस खेल में
जिंदगी की राह में
क्या मैं खुद को ढूंढ रही हु?