Savitribai Phule, got herself educated and then along with Jotirao Phule started the first school for the girls in India in 1848. Thus, she became the first women teacher in India.
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50 लाख की जैन आबादी के पास जनगणना का धार्मिक कोड है लेकिन 15 करोड़ आदिवासियों के लिए कोई धार्मिक कोड नहीं है। वह भी तब ��ब आदिवासी समुदाय के अंदर करीब 740 जनजातियां है। देश की सबसे अधिक भाषाएं है। सबसे पुरानी समृद्ध सभ्यता है। पृथक प्रकृति पूजक पद्धति हैं।
85% पसमांदा मुसलमानों ने 15% अशरफ मुसलमानों से कहना शुरू कर दिया है "दुआ" तुम रखो हमें "दावा" अर्थात अधिकार चाहिए.
भारत का मुस्लिम समाज केवल मुसलमान नही है. हज़ारों जातियों में विभाजित एक कौम है जिसकी लगाम मुट्ठी भर अशरफ मुसलमानों के हाथों में है.
जाति एक घातक ब्राह्मणवादी बीमारी है, हिन्दू वर्ण व्यवस्था ने पूरे दक्षिण एशिया को जातिवाद की बीमारी से बीमार कर दिया है.
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भारतीय मुस्लिम समाज तीन वर्गों में बंटा हुआ है.
1) अशरफ मुस्लिम :- जो खुद को पश्चिम एशिया या सेंट्रल एशिया का बाशिन्दा मानते हैं. मुसलमानों में इनकी आबादी 15% है.
2) अज़लफ मुस्लिम :- पिछड़े वर्ग के मुसलमान, बिल्कुल ओबीसी की तरह :- जो किसी न किसी श्रम या उत्पादन से जुड़े हैं. मुसलमानों में इनकी आबादी 55% है.
3) अरजल मुस्लिम :- ज्यादातर भूमिहीन हैं. इस समुदाय को मुस्लिमों में दलित माना जाता है. इस समुदाय की आबादी 30% है.
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अशरफ मुसलमान खुद को श्रेष्ठ मानते हैं. अपने बच्चों को तालीम देते हैं हमारे पूर्वज अरब टर्की ईरान इराक या मध्य एशिया से घोड़े दौड़ाते हुए भारत पर शासन करने आए थे और शासन किया भी. बुलंद दरवाजा, चारमीनार, ताजमहल, जामा मस्जिद से लेकर लाल किला हमारे पुरखों ने बनाया है.
श्रेष्ठता का भाव कूट कूट कर इस तरह भर दिया जाता है की अशरफ घरों के बच्चे अज़लफ और अरजल समुदाय के निम्न श्रेणी का मानने लगते हैं, - उनके श्रम उत्पादन और जाति पेशा पर जातिवादी टिप्पणी करते हैं.
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अशरफ मुसलमान मध्यकाल के जागीरदार, मनसबदार, जमींदार, सेनापति, सूबेदार और मुल्ला मौलवी हैं. इन लोगों ने मुस्लिम शासकों से लेकर क्षत्रिय राजा और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की खूब सेवा की.
दलाली की और कईयों ने गद्दारी भी की है जैसे मीर जाफर जिसने प्लासी युद्ध में रोबर्ट क्लीव का साथ दिया और ब्रिटिश शासन को भारत में नींव रखने में मदद की.
सत्ता के करीब रहने के कारण अशरफ मुसलमानों ने राजनीति शिक्षा साहित्य और धर्म पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया. संख्या में कम होने के बावजूद इस्लामिक संगठनों में ओवर रिप्रेसेंटेड हैं.
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जमात उलेमा ए हिन्द, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ���ैसे संगठनों और जामिया मिल्लिया - अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भरे पड़े हैं - इन्ही संगठनों के द्वारा बहुसंख्यक अज़लफ और अरजल समुदाय पर नेतृत्व का दावा करते हैं.
उर्दू अकादमी को अपनी जागीर बनाकर साहित्य जगत पर हावी हैं. भारतीय राजनीति में भी इसी समुदाय का बोल बाला है. 1952 से लेकर 2019 के लोकसभा तक कुल 400 मुस्लिम सांसद चुने गए - लेकिन इनमें से 340 अशरफ मुस्लिम थे. 70 सालों में केवल 4
60 बैकवर्ड मुस्लिमों को हमने संसद में भेजा.
85% पसमांदा(अज़लफ+अरजल) मुसलमानों ने दावा ठोक दिया है. दुआ 15% अशरफ समुदाय अपने पास रखे हम अपना दावा अपना अधिकार लेकर रहेंगे.
दुआ और दावा के खेल ने दुआ वालों को गरीब कमजोर बनाया और दावा हासिल करने वालों को आर्थिक सामाजिक राजनीति के रूप से ताकतवर बनाया.
✍🏼Kranti Kumar
नहीं पता हमें, आपने कितने तकलीफ़ें सही?
वंचितों के दुःखों पर कितने आंसू बहाईं?
पर इतना पता है, बंदिशों से आप न लड़खड़ाई
सावित्री संग मिलकर ज्ञान की ज्योत जलाईं।
नमन है आपको फ़ातिमा शेख़..
सावित्रीबाई फुले ने अपने द्वारा बनाए गए “शिशुहत्या निषेध गृह” से एक अनाथ बालक ‘यशवंत’ को गोद लेकर एक मिसाल कायम की और उसे पढ़ा लिखाकर डॉक्टर बनाया।
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Savitri bai fule started an "INFANTICIDE PROHIBITION HOME" to fight against the killing of unwanted infants who used to be killed or abandoned
We are going to celebrate National teacher's day