सताती हैं रुलाती हैं मुझे यादें दिसम्बर की
जगाती हैं जलाती हैं मुझे रातें दिसम्बर की
ख़तों का इक लिफ़ाफ़ा और कुछ तोहफ़े मोहब्बत के
सलामत हैं मिरे लॉकर मे�� सौग़ातें दिसम्बर की
–मुनज़्ज़र नूर
मुद्दतों बाद हम किसी से मिले
यूँ लगा जैसे ज़िंद���ी से मिले
इस तरह कोई क्यूँ किसी से मिले
अजनबी जैसे अजनबी से मिले
साथ रहना मगर जुदा रहना
ये सबक़ हम को आप ही से मिले
–मखमूर सईदी
किसे ख़बर थी इक दिन हम पर ऐसे भी दिन आएंगे
कल के पैदा लड़के आकर हमको इश्क़ सिखाएंगे
बस्ती की रौनक है इनसे, जाहिल लोग ज़रूरी हैं
कौन गली में भौंकेगा गर सब कुत्ते पढ़ जाएंगे?
जिसको गाली देनी हो, हम उसको "आप" बुलाते हैं
और अदब-आदाब के मानी "आप" हमें समझाएंगें
– वशु पाण्डेय