Close. Studies of retail day trading show failure rates near 98%. A Brazilian analysis of all new futures day traders found 97% of those lasting over 300 days lost money net of costs. Taiwan data: under 1% consistently profitable. SEBI India: ~93% of F&O traders lost over 3 years. Active short-term trading has very high failure rates.
1️⃣
बिहार में ‘लव-कुश’ राजनीति: सामाजिक गठबंधन, प्रतिनिधित्व और सत्ता की संरचना का समाजशास्त्र
बिहार की राजनीति को केवल चुनावी परिणामों या राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। राज्य की राजनीति का एक गहरा आयाम उसकी सामाजिक संरचना में निहित है, जहाँ जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व, संसाधनों तक पहुँच, राजनीतिक प्रतिष्ठा और सत्ता में भागीदारी का माध्यम भी रही है।
इसी संदर्भ में ‘लव-कुश’ शब्द बिहार की राजनीति में विशेष महत्व रखता है। राजनीतिक शब्दावली में ‘लव’ से सामान्यतः कुर्मी और ‘कुश’ से कोइरी/कुशवाहा समुदाय का संकेत किया जाता है। यह दो OBC समुदायों के राजनीतिक समीकरण के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द है। विभिन्न चुनावी विश्लेषणों में इसकी जनसंख्या का अनुमान अलग-अलग मिलता है; बिहार की जाति-आधारित गणना के बाद प्रकाशित विश्लेषणों में कुर्मी और कोइरी/कुशवाहा की संयुक्त हिस्सेदारी लगभग 7 प्रतिशत से कुछ अधिक बताई गई है।
लेकिन ‘लव-कुश’ को केवल संख्यात्मक वोट-बैंक मानना इस राजनीतिक घटना को बहुत सीमित अर्थ में देखना होगा। इसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि अपेक्षाकृत सीमित जनसंख्या वाला कोई सामाजिक समूह किस प्रकार विभिन्न व्यापक सामाजिक समूहों के बीच एक राजनीतिक सेतु निर्मित कर सकता है।
इस दृष्टि से बिहार में ‘लव-कुश’ राजनीति को तीन परस्पर जुड़ी प्रक्रियाओं के रूप में समझा जा सकता है—
1. सामाजिक प्रतिनिधित्व का पुनर्वितरण,
2. गैर-यादव पिछड़ी राजनीति का संस्थानीकरण,
3. विभिन्न जातीय समूहों के बीच गठबंधन की राजनीति।
यही तीन प्रक्रियाएँ इसे बिहार की सत्ता-संरचना के अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय बनाती हैं।
---
1. बिहार की राजनीति में सत्ता-संरचना का ऐतिहासिक परिवर्तन
स्वतंत्रता के बाद बिहार की राजनीति लंबे समय तक उन सामाजिक समूहों के प्रभाव में रही जिन्हें सामान्यतः ‘सवर्ण’ राजनीतिक नेतृत्व के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ समुदायों से आने वाले नेताओं का विधानमंडल और सरकार में महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व रहा।
लेकिन भारतीय लोकतंत्र के विस्तार के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न अधिक मुखर हुआ। पिछड़ी जातियों के बीच राजनीतिक चेतना और संगठन का विस्तार इसी व्यापक परिवर्तन का हिस्सा था।
बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यादव, कुर्मी और कोइरी समुदायों के बीच राजनीतिक सहयोग की कोशिशों का उल्लेख ‘त्रिवेणी संघ’ के संदर्भ में मिलता है। बाद के दशकों में हालांकि पिछड़ी राजनीति एक समान धारा के रूप में विकसित नहीं हुई। यादव समुदाय का राजनीतिक संगठन और नेतृत्व अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली हुआ, जबकि कुर्मी और कोइरी जैसे अन्य कृषक OBC समूहों ने अलग राजनीतिक अभिव्यक्ति की तलाश जारी रखी।
यहाँ एक महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय परिवर्तन दिखाई देता है:
बिहार की राजनीति में संघर्ष केवल ‘सवर्ण बनाम पिछड़ा’ नहीं रहा; धीरे-धीरे यह पिछड़े वर्गों के भीतर प्रतिनिधित्व और नेतृत्व के प्रश्न में भी बदल गया।
1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सामाजिक न्याय की राजनीति ने बिहार की सत्ता-संरचना में बड़ा परिवर्तन किया। इसी दौर में मुस्लिम-यादव, अर्थात ‘MY’, एक प्रभावशाली राजनीतिक सामाजिक गठबंधन के रूप में स्थापित हुआ। इसके समानांतर गैर-यादव OBC समूहों के भीतर यह प्रश्न उभरा कि व्यापक पिछड़ा राजनीतिक विमर्श में उनका प्रतिनिधित्व किस प्रकार सुनिश्चित होगा।
यहीं से ‘लव-कुश’ राजनीति को समझने का आधार तैयार होता है।
---
2. 1994: एक सामाजिक पहचान से राजनीतिक गठबंधन तक
1994 की कुर्मी चेतना रैली को इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। हालिया ऐतिहासिक पुनरावलोकनों के अनुसार, इस रैली के आयोजन में सतीश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका थी और इसके बाद नीतीश कुमार बिहार में एक व्यापक राजनीतिक पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़े।
इस घटना का महत्व केवल इसलिए नहीं था कि एक जातीय समुदाय ने अपना राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया। इसका महत्व इस बात में था कि जातीय पहचान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न में परिवर्तित किया गया।
यहीं से ‘कुर्मी राजनीति’ धीरे-धीरे ‘कुर्मी-कोइरी राजनीति’ के व्यापक समीकरण से जुड़ती गई और ‘लव-कुश’ राजनीतिक शब्दावली सामने आई।
इस परिवर्तन को तीन चरणों में समझा जा सकता है:
पहला चरण — पहचान:
समुदाय को अपनी राजनीतिक उपस्थिति का बोध कराना।
दूसरा चरण — संगठन:
उस सामाजिक पहचान को राजनीतिक संगठन और नेतृत्व से जोड़ना।
तीसरा चरण — गठबंधन:
अपने सामाजिक आधार को अन्य पिछड़े, अति-पिछड़े, दलित और अन्य समूहों के साथ जोड़कर व्यापक चुनावी गठबंधन बनाना।
Kisi bhi company ne itna bada donation nahi diya hoga. Chara chor ne apne 15 saal ke jungle raj me naa jaane kitna dhan loota hoga lekin flood relief ke liye uss chor se 10 rupaya bhi nahi diya gaya.
@samrat4bjp ko mera salute hai. Itni jaldi naa sirf sabhi aaropiyon ki pehchan ki, unn sab ko giraftar bhi kar liya. Kal kuch agenda dhaari aaropiyon ki jaati ke baare me jhooth faila rahe the, to mai bata dun iss purey mamle me 7 aaropi hain, mukhya aaropi sahit ek aur aaropi Yadav jaati se hai. Baakiyon ki jaati philhal unknown hai.
@ompraka67832955 Most cases me accused kurmi hai bhi nhi, jamui wala bhi pasi hai! Koi bhi neutral insaan bata dega kurmi ka gav mohalla me ladki sabse jyada safe feel krti hain chahe jis jaat ki ho
1857 की क्रांति और अवध का प्रतिरोध
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अवध क्षेत्र ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सबसे प्रमुख और उग्र केंद्र बनकर उभरा। नवाब वाजिद अली शाह को निर्वासित कर कलकत्ता भेजे जाने के बाद, जून 1857 के अंत में क्रांतिकारी सैनिकों ने लखनऊ में प्रवेश किया। उस समय शहर प्रशासनिक शून्यता और अराजकता के दौर से गुजर रहा था। ऐसे संकट में नवाब के शाही परिवार और विद्रोही सैनिकों के बीच तालमेल बिठाने के लिए एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की आवश्यकता थी, और वह ऐतिहासिक भूमिका राजा जयलाल सिंह ने निभाई।
प्रशासनिक नेतृत्व और बिरजिस क़द्र का राज्याभिषेक
राजा जयलाल सिंह ने बेगम हज़रत महल के साथ मिलकर नवाब के अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस क़द्र को अवध की गद्दी पर आसीन कराया। उन्होंने विद्रोही सेनापतियों और राजदरबार के बीच ऐतिहासिक समझौते का प्रारूप तैयार किया और दोनों पक्षों में गहरा विश्वास स्थापित किया। इतिहासकार रुद्रांशु मुखर्जी के अनुसार, उस समय क्रांति के संचालन के लिए दो प्रमुख समितियाँ—सैन्य और असैन्य—बनाई गई थीं, और राजा जयलाल सिंह अकेले ऐसे नेता थे जो इन दोनों समितियों के प्रमुख सदस्य थे।
चिनहट का युद्ध: अंग्रेजों की करारी हार
30 जून 1857 को लखनऊ के निकट चिनहट में लड़ा गया युद्ध अवध के प्रतिरोध का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। ब्रिटिश रेजिडेंट हेनरी लॉरेंस ने क्रांतिकारी सेना को रोकने के लिए अपनी सुसज्जित टुकड़ी के साथ हमला किया। राजा जयलाल सिंह के रणनीतिक नेतृत्व और क्रांतिकारी सैनिकों के अदम्य साहस के आगे ब्रिटिश सेना टिक नहीं सकी। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को बुरी तरह परास्त किया, जिसके बाद हेनरी लॉरेंस और बचे हुए अंग्रेज सैनिकों को भागकर लखनऊ रेजीडेंसी में शरण लेने के लिए विवश होना पड़ा।
लखनऊ की ऐतिहासिक घेराबंदी और वित्तीय प्रबंधन
जब खजाने की कमी होने लगी, तब राजा जयलाल सिंह ने गुप्तचरों के माध्यम से पूर्व नवाबों के छिपे धन की खोज करवाई और लगभग ₹13 करोड़ के संसाधन व रसद जुटाए। इसी वित्तीय और सामरिक सूझबूझ के दम पर 8,000 से अधिक सैनिकों को वेतन मिला और ब्रिटिश रेजीडेंसी की लगभग पाँच महीने लंबी घेराबंदी संभव हो सकी। वे तालकटोरा और कर्बला में अपने मोर्चे पर लगातार 24 घंटे डटे रहकर युद्ध का संचालन करते थे।
सर्वोच्च बलिदान और अमर विरासत
ब्रिटिश सेना द्वारा लखनऊ पर पुनः नियंत्रण के बाद राजा जयलाल सिंह अनेक क्रांति के द्वीप को प्रज्वलित रखा और ब्रिटिशर्स का विरोध करते रहे, कुछ गद्दारों ने उनके साथ विश्वासघात किया, जिसके बाद उन्हें बंदी बना लिया गया। 1 अक्टूबर 1859 को अंग्रेजों ने उन्हें फाँसी दे दी। लखनऊ में के.डी. सिंह बाबू स्टेडियम के निकट स्थित ‘राजा जयलाल सिंह कुंज’ उनकी अद्वितीय वीरता, संगठन कौशल और देशप्रेम की अमर गवाही देता है।
#history
#india1857
#firstwarofindependence
#Rajajailalsingh
#greatmilitarycommander
#Awadh
#Kurmi