आदिवासी समाज का वनवासी राम भगवान से अटूट सम्बंध है
“सभी वनवासी राम को पूजते हैं । जब राम भगवान वनवास में थे , तो हम आदिवासी ही परिवार की तरह उनके साथ थे । और लंका पर युद्ध में भी उनको विजय दिलायी थी ।। जब भी आधुनिक युग में राम राज्य बनेगा , हम आदिवासियों का आज भी बहुमूल्य योगदान होगा ।”
👉🏽 लोहरदग्गा में राम दरबार मंदिर के शिलान्यास पूजा में शामिल होने का आमंत्रण दिया गया था । यह सरना -सनातन एकता और भाईचारे का प्रतीक है
👉🏽कुछ विघटनकारी शक्तियां बार बार ये भ्रम फैलाती है , की सनातनी समाज आदिवासी को शुद्र और अछूत मानते हैं । इस प्रकार के पूजा पद्दति से साबित होता है की आदिवासी को शुद्र या अछूत नहीं माना जाता है , ना भेदभाव किया जाता है
गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने वाले दल दरअसल अपनी अपनी औकात जानते हैं। जनता अब किसी भी एक दल को पसंद नहीं करती। गठबंधन मज़बूरी है। इसकी ताज़ा मिसाल बिहार में दिखी जिसमें एनडीए हो या महागठबंधन - सबकी हवा निकल गई। सब पिछले दरवाजे से प्रत्याशी खड़े कर रहे हैं। सावधान ��हें।
जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही क़र्ज़ पर टिकी हो, जिनके कई नामचीन बैंक दिवालिया हो चुके हों - वे भारत को डेड इकोनॉमी बताते हैं तो हंसी आती है। नोबेल पुरस्कार की भूख इंसानी दिमाग को दोगलेपन से जोड़ सकती है, यह सिद्ध हो गया। भारत पुश्तैनी अर्थव्यवस्था पर टिका है और यह बरकरार रहेगा।
What a mockery. Voters in Bihar have been recommended to furnish ornamental documentation before casting their votes. The illiterate and mostly poor people are being asked forcibly to comply with the rules set up by electioncommission. The apex court should act likewise.
शिवसेना और एनसी��ी का परिवारवाद अचानक समाप्त हो गया। ऐसी ही परिवारवादी अन्य सरकारों के साथ भी क्या ऐसा ही होगा? कहीं अगला नंबर बिहार और पश्चिम बंगाल का तो नहीं ह?