बड़ी ख़बर..हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी मिलेगा चाइल्ड केयर लीव का अधिकार
"शिक्षा केवल कक्षा तक सीमित नहीं होती. एक शिक्षक भी अभिभावक होता है और परिवार की जिम्मेदारियों का सम्मान किसी भी संवेदनशील समाज की पहचान है."
#नईदिल्ली से आई एक महत्वपूर्ण खबर में दिल्ली उच्च न्यायालय ने निजी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों के अधिकारों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सरकारी स्कूलों की तरह निजी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को भी अपने बच्चों की देखभाल के लिए चाइल्ड केयर लीव (सीसीएल) प्राप्त करने का अधिकार है. यह निर्णय देशभर के निजी विद्यालयों में कार्यरत हजारों शिक्षकों के लिए राहत लेकर ��या है.
समाचार के अनुसार मामला एक निजी विद्यालय की शिक्षिका से जुड़ा था, जिन्होंने अपने 12वीं कक्षा में अध्ययनरत पुत्र के मानसिक स्वास्थ्य और देखभाल के लिए एक माह के अवकाश की मांग की थी. शिक्षिका का कहना था कि उनका पुत्र मानसिक दबाव से गुजर रहा है और उसे इस समय माता की देखभाल की आवश्यकता है. हालांकि विद्यालय प्रबंधन ने ऐसा कोई प्रावधान न होने का हवाला देकर अवकाश देने से इनकार कर दिया था.
��सके बाद शिक्षिका ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और लगभग एक वर्ष तक कानूनी लड़ाई लड़ी. मामले की सुनवाई के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एकलपीठ के पूर्व निर्णय को निरस्त करते हुए शिक्षिका के पक्ष में फैसला सुनाया. न्यायालय ने कहा कि बच्चों की देखभाल के लिए दिया जाने वाला अवकाश कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि कर्मचारी का वैध अधिकार है.
अदालत ने अपने फैसले में दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 10 का उल्लेख करते हुए कहा कि निजी विद्यालयों के कर्मचारियों को वेतन, भत्ते, चिकित्सा सुविधाओं, पेंशन और अन्य सेवा लाभों के मामले में सरकारी विद्यालयों के कर्मचारियों के समान अधिकार प्राप्त हैं. ऐसे में चाइल्ड केयर लीव से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता.
न्यायालय ने यह भी कहा कि बच्चे के हित, स्वास्थ्य और मानसिक विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए. यदि किसी बच्चे को विशेष परिस्थितियों में माता-पिता की आवश्यकता है तो नियोक्ता को संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. यह फैसला शिक्षकों के पारिवारिक अधिकारों और बच्चों के हितों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में कार्यरत शिक्षकों को केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज निर्माता के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि एक शिक्षक अपने बच्चे की देखभाल के लिए अवकाश मांगता है तो उसे संवेदनशीलता के साथ दे���ा जाना चाहिए. बच्चों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सर्वोपरि है तथा अभिभावकों और शिक्षकों के पारिवारिक अधिकारों की रक्षा एक स्वस्थ और मानवीय समाज की आधारशिला है.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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आईजीडीटीयूडब्ल्यू ने खोले प्रवेश के द्वार, एमएससी, एमटेक और पीएचडी कार्यक्रमों में आवेदन शुरू
"उच्च शिक्षा केवल करियर का मार्ग नहीं, बल्कि शोध, नवाचार और नेतृत्व की नई संभावनाओं का प्रवेश द्वार भी है."
#नईदिल्ली स्थित इंदिरा गांधी दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी फॉर वुमन (IGDTUW) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए विभिन्न स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध कार्यक्रमों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू कर दी है. विश्वविद्यालय ने ��च्छुक छात्राओं से एमएससी, एमटेक, एमप्लान, पीएचडी तथा एकीकृत बीएससी-एमएससी कार्यक्रमों के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं. आवेदन पोर्टल 22 जून तक खुला रहेगा.
समाचार के अनुसार विश्वविद्यालय में बीटेक और बीआर्क कार्यक्रमों में प्रवेश जेएसी दिल्ली काउंसिलिंग के माध्यम से होगा. विश्वविद्यालय की प्रवेश नीति के तहत 85 प्रतिशत सीटें दिल्ली क्षेत्र के अभ्यर्थियों तथा 15 प्रतिशत सीटें दिल्ली के बाहर के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित रखी गई हैं. बीबीए और एमबीए पाठ्यक्रमों में 75-75 सीटें उपलब्ध हैं, जबकि एमसीए में 76 सीटों पर प्रवेश दिया जाएगा.
पीएचडी कार्यक्रमों में इंजीनियरिंग, भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणित, प्रबंधन, वास्तुकला तथा नियोजन सहित विभिन्न विषयों में कुल 125 सीटें उपलब्ध कराई गई हैं. शोध कार्यक्रमों में प्रवेश रिसर्च एप्टीट्यूड टेस्ट (RAT) और साक्षात्कार के आधार पर किया जाएगा. वहीं अर्बन प्लानिंग में एमप्लान कार्यक्रम ���े लिए 13 सीटें निर्धारित की गई हैं.
विश्वविद्यालय द्वारा संचालित पांच वर्षीय एकीकृत बीएससी-एमएससी कार्यक्रम में भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित विषयों में 45-45 सीटों सहित कुल 135 सीटें उपलब्ध हैं. इस कार्यक्रम में प्रवेश सीयूईटी के माध्यम से किया जाएगा. विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार इन कार्यक्रमों के लिए आवेदन प्रक्रिया जुलाई में शुरू होने की संभावना है.
तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से स्थापित यह विश्वविद्यालय इंजीनियरिंग, प्रबंधन, विज्ञान और शोध के क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संस्थान छात्राओं को उच्च गुणवत्ता वाली तकनीकी शिक्षा के साथ नेतृत्व और नवाचार के अ��सर भी प्रदान करते हैं.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि छात्राओं को तकनीकी, वैज्ञानिक और शोध आधारित शिक्षा में अधिक अवसर उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है. उच्च शिक्षा संस्थानों को केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित न रहकर नवाचार, शोध और रोजगारोन्मुख कौशल विकास पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए. अभिभावकों और छात्राओं को प्रवेश से पूर्व पाठ्यक्रम की गुणवत्ता, मान्यत��, प्लेसमेंट और शोध सुविधाओं की जानकारी अवश्य प्राप्त करनी चाहिए.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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संबद्धता विस्तार शुल्क में राहत, डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय ने कम किया अर्थदंड
"शिक्षा संस्थानों पर नियमों का पालन आवश्यक है, लेकिन दंड ऐसा हो जो व्यवस्था सुधारे, संस्थानों को अनावश्यक बोझ तले न दबा दे."
#आगरा स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय ने संबद्ध महाविद्यालयों को बड़ी राहत देते हुए संबद्धता विस्तार (Affiliation Extension) से जुड़े अर्थदंड में कमी करने का निर्णय लिया है. विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की ऑनलाइन बैठक में यह महत्वपूर्ण फैसला लिया गया, जिससे अनेक कॉलेजों को वित्तीय राहत मिलने की उम्मीद है.
स��ाचार के अनुसार कार्य परिषद की बैठक कुलपति प्रो. आशु रानी की अध्यक्षता में आयोजित की गई. बैठक में पूर्व में लिए गए उस निर्णय में संशोधन किया गया, जिसके तहत संबद्धता विस्तार के लिए कॉलेजों पर अधिक अर्थदंड लगाया जा रहा था. अब संशोधित व्यवस्था के अनुसार महाविद्यालयों को निर्धारित संबद्धता शुल्क के साथ कम अर्थदंड का भुगतान करना होगा.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि संबद्धता विस्ता��� के लिए आवेदन करने वाले महाविद्यालयों को निर्धारित शुल्क जमा करने के साथ शिक्षकों, प्रबंधन समिति, भवन एवं अन्य आवश्यक सुविधाओं से संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे. स्नातक स्तर पर प्रति पाठ्यक्रम 29,500 रुपये संबद्धता शुल्क ��िर्धारित किया गया है. इसके साथ 20 हजार रुपये अर्थदंड जोड़कर कुल 49,500 रुपये प्रति पाठ्यक्रम जमा करने होंगे. पहले यह अर्थदंड 25 हजार रुपये निर्धारित था.
इसी प्रकार परास्नातक स्तर पर प्रति विषय 29,500 रुपये संबद्धता शुल्क के साथ 5 हजार रुपये अर्थदंड जोड़कर कुल 34,500 रुपये जमा करने होंगे. विश्वविद्यालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था उन महाविद्यालयों पर लागू होगी जिन्हें शैक्षणिक सत्र 2025-26 में अस्थायी संबद्धता प्रदान की गई थी.
रिपोर्ट के अनुसार संबद्धता विस्तार के लिए आवेदन पत्रावली 20 जून तक विश्वविद्यालय में जमा करनी होगी. 20 जून के बाद और 30 जून तक आवेदन करने वाले महाविद्यालयों को अतिरिक्त विलंब शुल्क देना पड़ेगा. वहीं 30 जून के बाद किसी भी प्रकार के आवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा.
विश्वविद्यालय का कहना है कि संबद्धता प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध बनाने के लिए यह निर्णय लिया गया है ताकि नए शैक्षणिक सत्र में छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो और कॉलेजों की मान्यता संबंधी प्रक्रियाएं समय पर पूरी हो सकें.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि संबद्धता और मान्यता संबंधी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, समयबद्धता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए. महाविद्यालयों को केवल शुल्क भुगतान तक सीमित न रखते हुए उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धत��, आधारभूत संरचना और छात्रों को दी जाने वाली सुविधाओं का भी कठोर मूल्यांकन होना चाहिए. ��िक्षा व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है, इसलिए संबद्धता प्रक्रिया को केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि गुणवत्ता सुनिश्चित करने के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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बेसिक शिक्षा में रिक्त पदों का बड़ा खुलासा, 60 हजार शिक्षकों की भर्ती की तैयारी
"विद्यालयों की इमारतें जितनी आवश्यक हैं, उतने ही आवश्यक उनमें पढ़ाने वाले शिक्षक भी हैं. शिक्षक विहीन शिक्षा व्यवस्था भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है."
#प्रयागराज से आई एक महत्वपूर्ण खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश क��� बेसिक शिक्षा विभाग में लगभग 60 हजार रिक्त पदों पर शिक्षक भर्ती की तैयारी तेज हो गई है. विभाग द्वारा रिक्त पदों का विवरण संकलित कर उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे लंबे समय से प्रतीक्षित शिक्षक भर्ती प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त हो सकता है.
समाचार के अनुसार बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों में कुल लगभग 60 हजार पद रिक्त हैं. इनमें से करीब 48 हजार पद ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में तथा 11,508 पद नगर क्षेत्र के विद्यालय��ं में खाली हैं. विभाग इन सभी रिक्तियों का विस्तृत विवरण ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से चयन आयोग को भेजने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए भर्ती नियमावली में आवश्यक संशोधन और अद्यतन प्रक्रिया भी जारी है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2018 के बाद ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में कोई बड़ी शिक्षक भर्ती नहीं हुई है, जबकि नगर क्षेत्र के विद्यालयों में भी लंबे समय से नियुक्तियां नहीं की गई हैं. परिणामस्वरूप अनेक विद्यालय शिक्षक संकट से जूझ रहे हैं. विभाग ने पूर्व की भर्तियों से रिक्त रह गए पदों का भी पुनः आकलन किया है, जिससे रिक्तियों की संख्या और स्पष्ट हो सकी है.
समाचार में यह भी उल्लेख किया गया है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में सरप्लस शिक्षकों के पुनर्समायोजन की प्रक्रिया चल ��ही है. जिलों को निर्देश दिए गए हैं कि सरप्लस शिक्षकों की अंतिम सूची 26 जून तक उपलब्ध कराई जाए. न्यायालय के आदेश के कारण फिलहाल तबादलों पर भी रोक लगी हुई है. पुनर्समायोजन और नियमावली संशोधन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भर्ती अधियाचन आयोग को भेजा जाएगा.
विशेष बात यह है कि पहली बार परिषदीय शिक्षकों के चयन के लिए भर्ती परीक्षा उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के माध्यम से कराए जाने की तैयारी की जा रही है. इससे भर्ती प्रक्रिया में एकरूपता और पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है.
यदि यह भर्ती प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ होती है तो प्रदेश के हजारों अभ्यर्थियों को रोजगार का अवसर मिलेगा और शिक्षक संकट से जूझ रहे विद्यालयों को भी राहत प्राप्त होगी. शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रिक्त पदों को भरना केवल रोजगार का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता से भी सीधा जुड़ा हुआ है.
प्रोग्रे��िव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि प्रदेश के विद्यालयों में लंबे समय से रिक्त पड़े शिक्षक पदों को भरना अत्यंत आवश्यक है. शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक हो सकता है जब प्रत्येक विद्यालय में विषयानुसार पर्याप्त और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध हों. सरकार को भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी, समयबद्ध और विवादमुक्त बनाते हुए शीघ्र नियुक्तियां सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि छात्रों की पढ़ा��� प्रभावित न हो और शिक्षा व्यवस्था मजबूत बन सके.
दीपक सिंह सरीन , राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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गोल्ड मेडल दिलाने के लिए बढ़ा दिए अंक...
विश्वविद्यालय के मूल्यांकन पर उठे सवाल, उत्तर पुस्तिका की दोबारा जांच होगी
"जब शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता पर प्रश्न उठने लगें, तब केवल परिणाम नहीं, पूरी प्रक्रिया की समीक्षा आवश्यक हो जाती है."
#आगरा स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर एक नया विवाद सामने आया है. विश्वविद्यालय में अंक बढ़ाने और अलग-अलग अंकतालिकाएं जारी किए जाने के आरोपों ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं. मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को उत्तर पुस्तिका की पुनः जांच कराने का निर्णय लेना पड़ा है.
समाचार के अनुसार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने आरोप लगाया कि एमएसडब्ल्यू पाठ्यक्रम के एक छात्र को गोल्ड मे��ल दिलाने के उद्देश्य से उसके अंक बढ़ाए गए और बाद में दूसरी अंकतालिका जारी की गई. इस आरोप को लेकर छात्र संगठन ने कुलपति प्रो. आशु रानी का घेराव किया और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की.
बुधवार को कुलपति आवास पर आयोजित बैठक में इस प्रकरण पर विस्तृत चर्चा की गई. बैठक में यह निर्णय लिया गया कि संबंधित छात्र की उत्तर पुस्तिका की जांच विश्वविद्यालय के बाहर के शिक्षकों से कराई जाएगी. इसके लिए #बरेली स्थित बरेली विश्वविद्यालय सहित अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की सहायता ली जाएगी और पुनर्मूल्यांकन रिपोर्ट परीक्षा समिति के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी.
रिपोर्ट के अनुसार छात्र संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि द्वितीय सेमेस्टर की दो अलग-अलग अंकतालिकाएं जारी की गईं, जिनमें एक में कम अंक और दूसरी में अधिक अंक दर्शाए गए. इससे मूल्यांकन प्रक्रिया क�� निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए हैं. बैठक के दौरान यह प्रश्न भी उठाया गया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था समाप्त होने के बाद अंक वृद्धि जैसी स्थिति कैसे उत्पन्न हुई और इसके लिए परीक्षा समिति की अनुमति क्यों नहीं ली गई. हालांकि विश्वविद्यालय अधिकारी इन सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके.
यह मामला केवल एक छात्र या एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में उच्च शिक्षा संस्थानों की परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली की पारदर्शिता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है. यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह छात्रों के विश्वास और विश्वविद्यालय की साख दोनों पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि किसी भी विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पूंजी उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली होती है. यदि अंकतालिकाओं, म���ल्यांकन या परिणामों को लेकर संदेह उत्पन्न होता है तो इसकी स्वतंत्र और समयबद्ध जांच अनिवार्य होनी चाहिए. छात्रों की मेहनत, अभिभावकों का विश्वास और शिक्षा व्यवस्था की गरिमा तभी सुरक्षित रह सकती है जब मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी तरह जवाबदेह और पारदर्शी हो.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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सीएमटी सीट आवंटन के बाद ERP पंजीकरण अनिवार्य, ट्रिपलआईटी ने जारी किए दिशा-निर्देश
"उच्च शिक्षा में प्रवेश केवल सीट प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि समय पर दस्तावेज सत्यापन और औपचारिकताओं का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है."
#प्रयागराज स्थित भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपलआईटी) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 में एमटेक तथा ड्यूल डिग्री एमटेक-पीएचडी कार्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं. संस्थान ने स्पष्ट किया है कि सेंट्रलाइज्ड काउंसिलिंग फॉर एमटेक, एमआर्क और एमप्लान (सीएमटी) के माध्यम से सीट आवंटित होने के बाद सभी अभ्यर्थियों को संस्थान के ERP पोर्टल पर ऑनलाइन पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा.
संस्थान द्वारा जारी सूचना ��े अनुसार अभ्यर्थी अपनी सीएमटी एप्लीकेशन आईडी और जन्मतिथि के माध्यम से ERP पोर्टल पर लॉगिन कर सकेंगे. पंजीकरण प्रक्रिया के दौरान विद्यार्थियों को प्रथम सेमेस्टर की फीस, हॉस्टल शुल्क तथा अन्य निर्धारित शुल्क जमा करने होंगे. शुल्क का भुगतान ऑनलाइन पोर्टल, यूपीआई, डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड के माध्यम से किया जा सकेगा.
प्रवेश प्रक्रिया के तहत दस्तावेज सत्यापन पर विशेष जोर दिया गया है. अभ्यर��थियों को हाईस्कूल और इंटरमीडिएट प्रमाणपत्र, आधार कार्ड, स्नातक की अंकतालिकाएं, डिग्री, वैध GATE स्कोरकार्ड तथा आरक्षण संबंधी प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने होंगे. संस्थान ने यह भी स्पष्ट किया है कि ओबीसी-एनसीएल प्रमाणपत्र 1 अप्रैल 2026 के बाद जारी होना आवश्यक है. इसके अतिरिक्त एंटी-रैगिंग शपथपत्र, मेडिकल परीक्षण रिपोर्ट तथा मेडिक्लेम और दुर्घटना बीमा संबंधी दस्तावेज भी अनिवार्य किए गए हैं.
संस्थ��न के अनुसार ट्रिपलआईटी एक आवासीय परिसर है, इसलिए चयनित विद्यार्थियों के लिए हॉस्टल में निवास करना अनिवार्य होगा. इससे विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण, शोध सुविधाएं और तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराए जा सकेंगे.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी और विद्यार्थी-अनुकूल बनाया जाना चाहिए. विद्यार्थियों और अभिभावकों को केवल प्रवेश परीक्षा और काउंसिलिंग पर ही नहीं, बल्कि दस्तावेज सत्यापन, शुल्क भुगतान और संस्थागत नियमों की जानकारी पर भी समान ध्यान देना चाहिए. समय पर जानकारी और उचित मार्गदर्शन से अनावश्यक परेशानिय���ं को रोका जा सकता है.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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12वीं में न्यूनतम अंक नहीं होने पर भी भर सकेंगे ��ॉइस
"शिक्षा का उद्देश्य अवसर देना है, अंतिम निर्णय योग्यता और नियमों के आधार पर होना चाहिए."
रुड़की से प्र��ाशित समाचार के अनुसार, कक्षा 12वीं (या समकक्ष) परीक्षा में निर्धारित न्यूनतम अंक प्राप्त न करने वाले अभ्यर्थियों को भी फिलहाल काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल होने और अपनी पसंद के संस्थानों एवं पाठ्यक्रमों की चॉइस भरने की अनुमति दी गई है.
आईआईटी की ओर से जारी जानकारी के अनुसार सामान्य, ओबीसी-एनसीएल और ईडब्ल्यूएस वर्ग के जिन अभ्यर्थियों के 12वीं में 75 प्रतिशत से कम अंक हैं तथा एससी, एसटी और दिव्���ांग वर्ग के जिन अभ्यर्थियों के 65 प्रतिशत से कम अंक हैं, वे भी अपनी रैंक के आधार पर सीट आवंटन प्रक्रिया में भाग ले सकेंगे.
हालांकि यह छूट केवल अस्थायी है. जिन अभ्यर्थियों को श्रेणी के अनुसार न्यूनतम अंकों की पात्रता पूरी करने वाला संशोधित स्कोर कार्ड प्राप्त हो जाता है, उन्हें 15 जुलाई 2026 तक निर्धारित ईमेल पर संशोधित स्कोर कार्ड भेजना होगा. अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सीट आवंटन रैंक के आधा��� पर किया जाएगा, लेकिन अंतिम प्रवेश तभी मान्य होगा जब निर्धारित समय सीमा के भीतर पात्रता संबंधी सभी शर्तें पूरी कर दी जाएंगी.
यह व्यवस्था उन विद्यार्थियों को राहत देती है जो पुनर्मूल्यांकन, अंक सुधार या संशोधित परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं. इससे ऐसे छात्रों को काउंसलिंग प्रक्रिया से बाहर नहीं होना पड़ेगा और यदि बाद में उनके अंक पात्रता सीमा तक पहुंच जाते हैं तो उनका प्रवेश सुरक्षित रह सकेगा.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि प्रवेश प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है. पुनर्मूल्यांकन या परिणाम संशोधन की प्रतीक्षा कर रहे विद्यार्थियों को अवसर देना सकारात्मक कदम है, लेकिन अंतिम चयन में योग्यता मानकों और निर्धारित नियमों का निष्प��्ष पालन भी उतना ही आवश्यक है ताकि सभी अभ्यर्थियों के साथ न्याय हो सके.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग विज्ञान डिप्लोमा शुरू
"रोजगार वही टिकाऊ होता है जो ज्ञान के साथ सेवा ��ा भाव भी पैदा करे."
हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग विज्ञान का डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किया गया है. समाचार के अनुसार जिले में पहली बार 12वीं उत्तीर्ण युवाओं को इस क्षेत्र में डिप्लोमा करने का अवसर मिलेगा. विश्वविद्यालय का कहना है कि इससे युवाओं के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और योग आधारित स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर खुलेंगे.
रि���ोर्ट के अनुसार अब तक हरिद्वार में प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग विज्ञान के डिप्लोमा की कोई व्यवस्थित व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी. विश्वविद्यालय के योग विज्ञान विभाग द्वारा शुरू किए गए इस एक वर्षीय पाठ्यक्रम में 30 सीटें निर्धारित की गई हैं. प्रवेश के लिए विज्ञान, वाणिज्य या कला किसी भी वर्ग से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण छात्र-छात्राएं आवेदन कर सकते हैं.
समाचार में बताया गया है कि पाठ्यक्रम पूरा करने ��े बाद युवाओं को प्राकृतिक थेरेपिस्ट के रूप में कार्य करने के अवसर मिल सकते हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन ने डिप्लोमा के लिए 8500 रुपये शुल्क निर्धारित किया है तथा वर्ष में दो बार परीक्षा आयोजित की जाएगी.
प्राकृतिक चिकित्सा और योग भारत की प्राचीन स्वास्थ्य परंपरा का हिस्सा रहे हैं. हालांकि किसी भी चिकित्सा पद्धति की प्रभावशीलता और दावों का मूल्यांकन वैज्ञानिक शोध, नैदानिक परीक्षणों और प्रमा��� आधारित चिकित्सा मानकों के आधार पर किया जाना आवश्यक है. इसलिए विद्यार्थियों को इस क्षेत्र में करियर बनाते समय व्यावहारिक प्रशिक्षण, मान्यता, रोजगार संभावनाओं और वैज्ञानिक अध्ययन को भी ध्यान में रखना चाहिए.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि युवाओं को रोजगारोन्मुख शिक्षा और कौशल आधारित पाठ्यक्रमों के अधिक अवसर मिलने चाहिए. यदि ऐसे कार्यक्रम पारदर्शी, मान्यता प्राप्त और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण प्रदान करें तो यह स्थानीय युवाओं के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं. साथ ही विद्यार्थियों और अभिभावकों को प्रवेश लेने से पहले पाठ्यक्रम की मान्यता, रोजगार संभावनाओं और प्रशिक्षण व्यवस्था की पूरी जानकारी अवश्य प्राप्त करनी चाहिए.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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पतंजलि अनुसंधान संस्थान और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के बीच समझौता
"जब परंपरा और प्रयोगशाला एक साथ चलती हैं, तभी ज्ञान समाज के लिए उपयोगी बनता है."
हरिद्वार स्थित पतंजलि अनुसंधान संस्थान और ग्रेटर नोएडा के गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता (एमओयू) हुआ है. इस साझेदारी का उद्देश्य भारती�� ज्ञान परंपरा, आयुर्वेद, वैज्ञानिक अनुसंधान और वैश्विक स्वास्थ्य कल्याण को नई दिशा देना बताया गया है.
समाचार के अनुसार यह समझौता दोनों संस्थानों के बीच शैक्षणिक, वैज्ञानिक और अनुसंधान सहयोग को मजबूत करेगा. इसके माध्यम से ज्ञान, संसाधनों और अनुसंधान अनुभवों का आदान-प्रदान होगा. विशेष रूप से आयुर्वेद की वैज्ञानिक और नैदानिक शोध गतिविधियों को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप आगे बढ़ाने ���ा प्रयास किया जाएगा.
समझौते के तहत आयुर्वेद और भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में काम होगा. पतंजलि अनुसंधान संस्थान का मानना है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि मानव कल्याण क��� एक वैज्ञानिक आधार भी है. इसी सोच के साथ दोनों संस्थान अनुसंधान, प्रशिक्षण और नवाचार के नए अवसर विकसित करेंगे.
इस साझेदारी से विद्यार्थियों को भी लाभ मिलने की संभावना है. उन्हें अनुसंधान, आयुर्वेद, स्वास्थ्य विज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से जुड़ी नई जानकारियां तथा व्यावहारिक अवसर प्राप्त होंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे शिक्षा और शोध के क्षेत्र में नए आयाम खुल सकते हैं.
प्रो��्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के बीच संवाद बढ़ना चाहिए. हालांकि किसी भी चिकित्सा या स्वास्थ्य संबंधी दावे को वैज्ञानिक परीक्षण, पारदर्शी शोध और प्रमाण आधारित मूल्यांकन के आधार पर ही स्वीकार किया जाना चाहिए. यदि ऐसे सहयोग विद्यार्थियों को बेहतर शोध, नवाचार और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराते हैं तो यह ���च्च शिक्षा के लिए सकारात्मक कदम साबित हो सकता है.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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क्लास नहीं लेने पर लौटानी होगी पूरी फीस, उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला
"शिक्षा सेवा है, बंधक बनाने का साधन नहीं. यदि छात्र पढ़ाई नहीं कर रहा तो उसकी मेहनत की कमाई भी रोकी नहीं जा सकती."
ग्रेटर नोएडा से सामने आए एक महत्वपूर्ण मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने एक एडटेक कंपनी को छात्रा क�� पूरी फीस ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है. मामला उस समय शुरू हुआ जब सेक्टर-51, नोएडा निवासी छात्रा ने एक डिजिटल मार्केटिंग कोर्स में प्रवेश के लिए 2500 रुपये देकर पंजीकरण कराया था. इसके बाद संस्थान ने उसके नाम पर लगभग 35,559 रुपये का शिक्षा ऋण स्वीकृत करा दिया, जिसकी अदायगी मासिक किस्तों में होनी थी.
समाचार के अनुसार प्रवेश लेने के बाद छात्रा ने संस्थान के बारे में उपलब्ध समीक्षाएं और शिकायतें देखीं, जिनसे उसे संस्थान की कार्यप्रणाली पर संदेह हुआ. उसने तत्काल प्रवेश निरस्त कराने और फीस वापसी के लिए संस्थान को ई-मेल भेजा. आरोप है कि संस्थान ने न तो प्रवेश निरस्त किया और न ही शुल्क लौटाया. इसके विपरीत ऋण वसूली से जुड़े नोटिस लगातार भेजे जाने लगे.
इसके बाद छात्रा ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया. सुनवाई के दौरान संस्थान की ओर से आयोग में अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया. परिणामस्वरूप आयोग ने एकपक्षीय निर्णय देते हुए फीस वापसी का आदेश पारित किया. आयोग ने केव��� शुल्क वापसी ही नहीं, बल्कि 2000 रुपये वाद व्यय और 2000 रुपये मानसिक प्रताड़ना/मानसिक संताप के लिए भी देने का निर्देश दिया.
यह फैसला उन हजारों छात्रों और अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है जो ऑनलाइन कोर्स, एडटेक प्लेटफॉर्म और कौशल प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेते समय जटिल ऋण योजनाओं और भ्रामक वादों का सामना करते हैं. उपभोक्ता संरक्षण कानून शिक्षा सेवाओं से जुड़े मामलों में भी राहत प्रदा��� कर सकता है, यदि छात्र या अभिभावक के साथ अनुचित व्यवहार हुआ हो.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान या एडटेक कंपनी को छात्र की स्पष्ट सहमति और पारदर्शी जानकारी के बिना ऋण, फीस या अनुबंध के जाल में नहीं फंसाना चाहिए. प्रवेश प्रक्रिया पूरी ��रह पारदर्शी होनी चाहिए और यदि छात्र समय रहते कोर्स छोड़ना चाहता है तो नियमानुसार शुल्क वापसी की व्यवस्था भी सुनिश्चित होनी चाहिए. शिक्षा के नाम पर आर्थिक दबाव और भ्रामक प्रचार स्वीकार्य नहीं हो सकते.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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#राजकीय माध्यमिक शिक्षकों के तबादले 12 जून से, ऑनलाइन प्रक्रिया से मिलेगा विकल्प चुनने का अवसर
"स्थानांतरण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था दोनों ��े संतुलन का प्रश्न है."
लखनऊ से आई महत्वपूर्ण खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश के राजकीय हाईस्कूल और इंटर कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं के लिए वर्ष 2026-27 की स्थानांतरण और समायोजन प्रक्रिया 12 जून से शुरू होने जा रही है. यह प्रक्रिया वर्ष 2017 की ऑनलाइन स्थानांतरण नीति के अंतर्गत संचालित की जाएगी. निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 30 जून तक आदेश जारी कर शिक्षकों को कार्यभार ग्रहण कराने की प्��क्रिया पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है.
समाचार के अनुसार जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) 12 जून तक रिक्त पदों और सरप्लस शिक्षकों की सूची पोर्टल पर अपलोड करेंगे. इसके बाद शिक्षक 18 जून तक ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे. आवेदन के दौरान उन्हें अपनी पसंद के दस विद्यालयों का चयन करने का अवसर मिलेगा. सभी आवेदनों का सत्यापन कर मेरिट सूची तैयार की जाएगी और उसी आधार पर स्थानांतरण किए जाएंगे.
स्थानांतरण प्रक्���िया में दिव्यांगता, गंभीर बीमारी, महिला, विधवा, तलाकशुदा, आयु, सेवा अवधि तथा राज्य या राष्ट्रीय पुरस्कार जैसे विभिन्न मानकों के आधार पर अंक निर्धारित किए गए ��ैं. इसके अतिरिक्त सेना और अर्धसैनिक बलों में कार्यरत कर्मियों के पति-पत्नी तथा विभिन्न विशेष परिस्थितियों वाले शिक्षकों को भी प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान है.
समाचार में यह भी उल्लेख है कि बेसिक शिक्षा परिषद ने अंतरजनपदीय स्थानांतरण से संबंधित संशोधित आदेश जारी किया है. इसके तहत अब डायलिसिस से पीड़ित शिक्षक स्वयं, उनके पति-पत्नी या अविवाहित पुत्र-पुत्री भी स्थानांतरण के लिए आवेदन क��� सकेंगे. कैंसर, दिव्यांगता और अन्य गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों से जुड़े मामलों को भी विशेष श्रेणी में रखा गया है.
स्थानांतरण नीति का उद्देश्य शिक्षकों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करना है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता प्रभावित न हो. पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया ही शिक्षकों के विश्वास को मजबूत कर सकती है.
प्रोग्रेसिव एसोसिएश��� ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि स्थानांतरण नीतियां केवल प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि छात्र हित और शिक्षक कल्याण दोनों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए. गंभीर बीमारी, दिव्यांगता और पारिवारिक परिस्थितियों से जूझ रहे शिक्षकों को राहत मिलना सकारात्मक कदम है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी विद्यालय में शिक्षकों की कमी के कारण छात्रों की पढ़ाई ��्रभावित न हो.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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#सीबीएसई ने पुनर्मूल्यांकन के लिए नए पोर्टल को दी मंजूरी, लाखों छात्रों को ���िली राहत
"तकनीक तब सफल मानी जाती है, जब वह छात्रों की समस्या कम करे, नई समस्या पैदा न करे."
सीबीएसई की 12वीं बोर्ड परीक्षा के पुनर्मूल्यांकन और उत्तर पुस्तिकाओं के सत्यापन से जुड़ी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव सा��ने आया है. समाचार के अनुसार सीबीएसई ने पुराने विवादित सिस्टम को हटाकर नए पुनर्मूल्यांकन पोर्टल को मंजूरी दे दी है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के विशेषज्ञों द्वारा सुरक्षा समीक्षा के बाद इस नए पोर्टल को स्वीकृति प्रदान की गई है.
रिपोर्ट के अनुसार इससे पहले ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली और उससे जुड़े पोर्टल में कई तकनीकी तथा सुरक्षा संबंधी खामियां सामने आई थीं. इन्हीं विवा���ों के बाद पुराने सिस्टम का उपयोग बंद करने का निर्णय लिया गया. नए पोर्टल में सुरक्षा और डेटा संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है, ताकि छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं और रिकॉर्ड तक अनधिकृत पहुंच की संभावना समाप्त हो सके.
समाचार में बताया गया है कि 1.60 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने 3.80 लाख से अधिक उत्तर पुस्तिकाओं के सत्यापन और पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया है. सरकारी तकनीकी एजेंसियों और आईआईटी विशे��ज्ञों की निगरानी में दो से सात जून के बीच सत्यापन और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संचालित की गई. नए पोर्टल में केवल कार्यक्षमता ही नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा को भी मजबूत बनाया गया है.
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब सीबीएसई की मूल्यांकन प्रणाली, ऑन-स्क्रीन मार्किंग और पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे. लाखों छात्रों और अभिभावकों की चिंता का मुख्य कारण यही था कि यदि डिजिटल प्रणाली में खामियां हैं तो उनके परिणामों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित होगी. नए पोर्टल की मंजूरी से कम से कम यह संदेश गया है कि तकनीकी खामियों को स्वीकार कर उनमें सुधार करने की कोशिश की गई है.
हालांकि यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि यदि पुरानी प्रणाली में गंभीर सुरक्षा और प्रक्रिया संबंधी कमियां थीं, तो उसे इतने लंबे समय तक लागू क्यों रखा गया. शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता का अर्थ केवल नई तकनीक लागू करना नहीं, बल्कि उसके प्रभाव, सुरक्षा और जवाबदेही को भी सुनिश्चित करना है.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि बोर्ड परीक्षाओं के मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार की तकनीकी खामी लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर सकती है. इसलिए सीबीएसई सहित सभी परीक्षा बोर्डों को समय-समय पर स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट, सुरक्षा परीक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए. छात्रों और अभिभावकों का विश्वास तभी मजबूत होगा जब मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, सुरक्षित और निष्पक्ष हो.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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#आरबीएस कॉलेज में इंटर के बाद एमबीए और एमसीए की राह आसान, एकीकृत पाठ्यक्रमों से मिलेगा करियर को नया आयाम
"समय बदल रहा है, अब डिग्री केवल कागज़ नहीं, बल्कि कौशल और रोजगार का माध्यम बन रही है."
आगरा के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और करियर निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अवसर सामने आया है. राजा बलवंत सिंह (आरबीएस) तकनीकी परिसर ने इंटरमीडिएट के बाद सीधे एकीकृत एमबीए और एमसीए पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सुविधा उपलब्ध कराई है. इससे छात्रों को स्नातक पूरा करने के बाद अलग से प्रवेश लेने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी और वे शुरुआत से ही अपने करियर लक्ष्य के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे.
संस्थान के अनुसार बीबीए, बीसीए, इंटीग्रेटेड एमबीए और इंटीग्रेटेड एमसीए जैसे पाठ्यक्रम छात्रों को उद्योगों की वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करेंगे. इन पाठ्यक्रमों में आधुनिक प्रबंधन, सूचना प्रौद्योगिकी, वेब डेवलपमेंट, ब्लॉकचेन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी उभरती तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा. संस्थान का दावा है कि इससे विद्यार्थियों की रोजगार क्षमता बढ़ेगी और उन्हें कॉर्पोरेट क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल विकसित करने का अवसर मिलेगा.
आरबीएस तकनीकी परिसर, लखनऊ स्���ित डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय (AKTU) से संबद्ध है तथा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) से अनुमोदित है. संस्थान में विभिन्न स्नातक ��र परास्नातक पाठ्यक्रमों के लिए निर्धारित सीटें भी उपलब्ध हैं. साथ ही संस्थान का कहना है कि पूरे वर्ष विभिन्न कंपनियां कैंपस प्लेसमेंट के लिए आती हैं, जिससे छात्रों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकते हैं.
आज के प्रतिस्पर्धी दौर में केवल पारंपरिक डिग्री पर्याप्त नहीं मानी जाती. उद्योग जगत ऐसे युवाओं की मांग कर रहा है जिनके पास तकनीकी ज्ञान के साथ व्यावहारिक कौशल भी हो. ऐसे में एकीकृत और कौशल आधारित पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को समय की बचत के साथ-साथ बेहतर करियर संभावनाएं प्रदान कर सकते हैं.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों को केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें छात्रों को रोजगारोन्मुख कौशल और आधुनिक तकनीकी दक्षता भी उपलब्ध करानी चाहिए. यदि शिक्षा उद्योगों की वास्तविक आवश्यकताओं से जुड़ती है, तो य���वाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसर अधिक मजबूत होंगे.
दीपक सिंह सरीन (PAPA NGO), राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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#आगरा में बच्चों के आधार कार्ड निष्क्रिय होने का खतरा, समय पर बायोमेट्रिक अपडेट कराना जरूरी
"कई बार समस्या सुविधा की कमी से नहीं, जानकारी की कमी से पैदा होती है."
आगरा में बड़ी संख्या में अभिभावकों के सामने बच्चों के आधार कार्ड से जुड़ी परेशानी सामने आ रही है. रिपोर्ट के अनुसार जिन बच्चों ने 5 वर्ष और 15 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद अनिवार्य बायोमेट्रिक अपडेट नहीं कराया है, उनके आधार कार्ड निष्क्रिय (डीएक्टिवेट) किए जा सकते हैं. जिले में पिछले एक माह के दौरान ऐसे 100 से अधिक मामले सामने आए हैं, जिनमें आधार प्रमाणीकरण प्रभावित होने से परिवारों को ��िभिन्न सेवाओं का लाभ लेने में कठिनाई हुई है.
यूआईडीएआई के नियमों के अनुसार 5 वर्ष की आयु पूरी होने पर पहला और 15 वर्ष की आयु पूरी होने पर दूसरा बायोमेट्रिक अपडेट कराना अनिवार्य है. यह प्रक्रिया बच्चों के लिए निःशुल्क है. निर्धारित समय पर अपडेट न होने की स्थिति में आधार प्रमाणीकरण प्रभावित हो सकता है, जिससे स्कूलों में प्रवेश, छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षाओं के पंजीकरण, बैंकिंग सेवाओं तथा अ���्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में बाधाएं आ सकती हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि अनेक अभिभावकों को इस नियम की पर्याप्त जानकारी नहीं होती, जिसके कारण वे समय पर अपडेट नहीं करा पाते. बाद में बच्चों को आधार केंद्र पर जाकर फिंगरप्रिंट और आईरिस अपडेट कराना पड़ता है. यह सुविधा केवल आधार सेवा केंद्रों पर उपलब्ध है.
यह समाचार केवल तकनीकी प्रक्रिया का विषय नहीं है, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के शिक्षा ���ंबंधी अधिकारों और सरकारी सुविधाओं तक पहुंच से भी जुड़ा हुआ है. यदि समय पर जागरूकता न फैलाई जाए तो अनेक परिवार अनावश्यक परेशानियों का सामना कर सकते हैं.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि आधार बायोमेट्रिक अपडेट से संबंधित जानकारी स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और शिक्षा विभाग के माध्यम से नियमित रूप से अभिभावकों तक पहुंचाई जानी चाहिए. साथ ही सरकार को ऐसे म���मलों में व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाना चाहिए ताकि किसी भी बच्चे को केवल तकनीकी कारणों से शिक्षा, छात्रवृत्ति या अन्य आवश्यक सेवाओं से वंचित न होना पड़े.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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#डीबीआरएयू प्रवेश प्रक्रिया में भ्रम, समर्थ पोर्टल पर पंजीकरण के बिना आवेदन कर रहे अभ्यर्थी
"प्रवेश का अवसर तभी सार्थक है, जब प्रक्रिया स्पष्ट और पारदर्शी हो."
आगरा स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (डीबीआरएयू) में स्नातक प्रवेश प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों द्वारा एक महत्वपूर्ण चूक सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार अनेक छात्र-छात्राएं विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेजों में सीधे ऑनलाइन आवेदन तो कर रहे हैं, लेकिन प्रवेश के लिए अनिवार्य समर्थ पोर्टल पर पंजीकरण नहीं करा रहे हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि समर्थ पोर्टल पर पंजीकरण के बिना किए गए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे.
विश्वविद्यालय के आवासीय संस्थानों तथा आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद और मैनपुरी के संबद्ध कॉलेजों में प्रवेश के लिए समर्थ पोर्टल पर निर्धारित शुल्क जमा कर पंजीकरण कराना अनिवार्य है. पंजीकरण के बाद अभ्यर्थी विभिन्न पाठ्यक्रमों और कॉलेजों में आवेदन कर सकते हैं. प्रशासन का कहना है कि अनेक विद्यार्थियों ने केवल कॉलेजों की वेबसाइट पर आवेदन कर दिया, लेकिन समर्थ पोर्टल पर पंजीकरण नहीं कराया, जिसके कारण उनके आवेदन अमान्य हो सकते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय और संबद्ध कॉलेजों में हजारों सीटें उपलब्ध हैं, लेकिन समर्थ पोर्टल पर अपेक्षाकृत कम पंजीकरण होने से प्रवेश प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. विश्वविद्यालय ने विद्यार्थियों की सहायता के लिए आधिकारिक वीडियो लिंक, हेल्पलाइन और ईमेल सहायता की भी व्यवस्था की है, ताकि तकनीकी या प्रक्रिया संबंधी समस्याओं का समाधान किया जा सके.
यह स्थिति केवल तकनीकी गलती नहीं है, बल्कि छात्रों के एक पूरे शैक्षणिक वर्ष को प्रभावित कर सकती है. प्रवेश प्रक्रिया में ��्पष्ट जानकारी का अभाव अक्सर विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए तनाव का कारण बनता है. ऐसे मामलों में समय पर सूचना और मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि विश्वविद्यालयों को प्रवेश प्रक्रिया से जुड़ी प्रत्येक अनिवार्य शर्त का व्यापक प्रचार-प्रसार करना चाहिए. कॉलेजों को भी अपने आवेदन पोर्टल पर स्पष्ट चेतावनी और मार्गदर्शन देना चाहि��, ताकि कोई भी छात्र केवल जानकारी के अभाव में प्रवेश के अवसर से वंचित न रह जाए. शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों की सहायता करना होना चाहिए, न कि जटिल प्रक्रियाओं के कारण उन्हें भ्रमित करना.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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#पीलीभीत के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में तिलक विवाद, जांच के आदेश से उठे शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
"विद्यालय वह स्थान होना चाहिए जहाँ पहचान नहीं, प्रतिभा देखी जाए."
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज (जीजीआईसी) में छात्राओं के तिलक लगाने को लेकर विवाद सामने आया है. समाचार के अनुसार कुछ हिंदू छात्राओं ने आरोप लगाया है कि विद्यालय में प्रवेश से पहले उनसे तिलक हटाने के लिए कहा गया और भविष्य में तिलक लगाकर न आने की चेतावनी भी दी गई. मामले में विद्यालय की प्रधानाचार्य पर हिंदू छात्राओं को परेशान करने के आरोप लगाए गए हैं.
रिपोर्ट के अनुसार शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जहाँ हिंदू छात्राओं को तिलक लगाने से रोका जाता है, वहीं मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनकर आने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. इन आरोपों को गंभीर मानते हुए जिला प्रशासन स्तर पर संज्ञान लिया गया है. डीए�� से शिकायत के बाद मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है, जिसने शिकायतकर्ताओं के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. प्रधानाचार्य, शिक्षकों और छात्राओं के बयान भी लिए जाने ��ैं.
समाचार में यह भी उल्लेख है कि शिकायतकर्ताओं ने विद्यालय में धार्मिक पक्षपात और कुछ वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी लगाए हैं. हालांकि इन आरोपों की सत्यता अभी जांच के अधीन है और अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगा.
यह मामला केवल एक विद्यालय का विवाद नहीं है, बल्कि शिक्षा संस्थानों में धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठात�� है. किसी भी पक्ष के आरोपों को अंतिम सत्य मानने से पहले निष्पक्ष जांच आवश्यक है. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विद्यालयों का वातावरण सभी विद्यार्थियों के लिए समान, सम्मानजनक और भेदभाव रहित बना रहे.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि शिक्षा संस्थानों में किसी भी छात्र या छात्रा के साथ धर्म, जाति, भाषा या किसी अन्य आधार पर भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होन��� चाहिए. यदि किसी प्रकार की शिकायत सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच होनी चाहिए. साथ ही विद्यालयों को ऐसा वातावरण विकसित करना चाहिए जहाँ सभी विद्यार्थी अपने संवैधानिक अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान के साथ सम्मानपूर्वक शिक्षा प्राप्त कर सकें.
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#निजी विश्वविद्यालयों की होगी व्यापक जांच, शैक्षणिक गुणवत्ता से लेकर डिग्री तक परखी जाएगी व्यवस्था
"शिक्षा में विस्तार जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है गुणवत्ता और जवाबदेही."
लखनऊ से आई महत्वपूर्ण खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश के निजी विश्वविद्यालय अब व्यापक जांच के दायरे में आने जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश राज्य उच्च शिक्षा परिषद ने इसके लिए 11 समितियों का गठन किया है, जो निजी विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता, परीक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक कार्यप्रणाली और बुनियादी सुविधाओं का निरीक्षण करेंगी.
जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि विश्वविद्यालय राज्य सरकार द्वारा निर्धारित श��क्षणिक कैलेंडर का पालन कर रहे हैं या नहीं. सेमेस्टर की शुरुआत और समाप्ति, परीक्षा कार्यक्रम, अवकाश, प्रवेश प्रक्रिया और शैक्षणिक गतिविधियों का सत्यापन किया जाएगा. इसके साथ ही विश्वविद्यालयों द्वारा जारी डिग्री और प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता तथा सुरक्षा मानकों की भी जांच होगी.
विशेष रूप से खेल मैदान, खेल सुविधाएं, ऑडिटोरियम, सेमिनार हॉल, छात्र क्लब, एनएसएस और एनसीसी जैसी गतिविधियों का भ��तिक सत्यापन किया जाएगा. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच समितियां सीधे छात्रों और उनके प्रतिनिधियों से बातचीत कर यह भी जानेंगी कि उन्हें पर्याप्त सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं तथा विश्वविद्यालयी गतिविधियों में उनकी वास्तविक भागीदारी कितनी है.
समाचार में यह भी उल्लेख है कि प्रवेश प्रक्रिया, परीक्षा व्यवस्था और नकल रोकने के लिए किए गए प्रबंधों की समीक्षा की जाएगी. सीसीटीवी निगरानी, प्ले���रिज्म डिटेक्शन सॉफ्टवेयर और अन्य तकनीकी व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता भी परखी जाएगी. विश्वविद्यालयों द्वारा राज्य सरकार को भेजी गई वार्षिक रिपोर्ट, छात्र संख्या और वित्तीय ��िवरणों का भी सत्यापन होगा.
यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब उच्च शिक्षा क्षेत्र में गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं. यदि यह निरीक्षण निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से किया जाता है तो इससे छात्रों और अभिभावकों का भरोसा मजबूत होगा तथा निजी विश्वविद्यालयों में बेहतर शैक्षणिक वातावरण विकसित करने में मदद मिलेगी.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि केवल भवन और विज्ञापन किसी विश्वविद्यालय की गुणवत्ता निर्धारित नहीं करते. छात्रों को मिलने वाली शिक्षा, सुविधाएं, परीक्षा की निष्पक्षता, रोजगारोन्मुख वातावरण और प्रशासनिक पारदर्शिता ही वास्तविक मानक होने चाहिए. जांच प्रक्रिया में छात्रों और अभिभावकों की शिकायतों को भी महत्व दिया जाना चाहिए, ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित हो सके.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्री�� संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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#कोचिंग संस्थानों पर केंद्र की सख्त निगरानी, भ्रामक विज्ञापनों और फीस वसूली पर बढ़ी कार्रवाई
"शिक्षा का उद्देश्य भविष्य बनाना है, सपनों का व्यापार करना नहीं."
नई दिल्ली से आई महत्वपूर्ण खबर के अनुसार केंद्र सरकार ने कोचिंग संस्थानों पर अपनी निगरानी और सख्त कर दी है. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) ने पिछले लगभग डेढ़ वर्ष के दौरान 33 बड़े कोचिंग संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की है. इन कार्रवाइयों के परिणामस्वरूप छात्रों को लगभग डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक की फीस वापस कराई गई है और भ्रामक प्रचार के मामलों में एक करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना भी लगाया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार सीसीपीए ने नवंबर 2024 से मई 2026 के बीच विभिन्न कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों, चयन प्रतिशत के दावों और सफलता के प्रचार की जांच की. पहले यह कार्रवाई मुख्य रूप से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कराने वाले संस्थानों तक सीमित थी, लेकिन अब इसका दायरा नीट, जेईई और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों तक भी बढ़ाया जा रहा है.
समाचार में यह भी बताया गया है कि कई मामलों में छात्रों को प्रवेश के बाद फीस वापसी में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. कुछ संस्थानों द्वारा विभिन्न शुल्कों के नाम पर कटौती कर दी जाती थी, जबकि कुछ मामलों में फीस लौटाने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल बना दी गई. सरकार का उद्देश्य ऐसे मामलों में छात्रों और अभिभावकों के हितों की रक्षा करना है.
इसी समाचार में राष्ट्रीय परीक्षा एजें���ी (एनटीए) द्वारा 21 जून को प्रस्तावित नीट-यूजी पुनर्परीक्षा के लिए परीक्षा शहरों के आवंटन की जानकारी भी जारी की गई है. अभ्यर्थियों को परीक्षा शहर की सूचना उपलब्ध कराई जा रही है तथा किसी भी समस्या की स्थिति में हेल्पलाइन और ईमेल सहायता भी प्रदान की गई है.
कोचिंग उद्योग आज करोड़ों छात्रों और अभिभावकों की आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ है. ऐसे में यदि किसी संस्थान द्वारा भ्रामक विज्ञापन, चयन परिणामों की गलत प्रस्तुति या अनुचित शुल्क वसूली की जाती है तो उसका सीधा प्रभाव परिवारों की आर्थिक स्थिति और छात्रों के मनोबल पर पड़ता है. इसलिए नियामक निगरानी और पारदर्शिता दोनों आवश्यक हैं.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि कोचिंग संस्थानों के लिए पारदर्शी फीस नीति, स्पष्ट रिफंड निय�� और सत्यापित परिणाम प्रकाशित करना अनिवार्य होना चाहिए. शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को व्यावसायिक लाभ का साधन बनाने के बजाय छात्र हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए. साथ ही सरकार को एक ऐसी प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिससे छात्र और अभिभावक शीघ्र न्याय प्राप्त कर सकें.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरने��� (PAPA NGO)
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#री-नीट और सीबीएसई विवादों के बीच बढ़ी छात्रों की चिंता, पारदर्शिता पर उठे सवाल
"जब परीक्षा से पहले ही व्यवस्था सवालों के घेरे में हो, तो सबसे बड़ा बोझ किताबों का नहीं, बल्कि छात्रों के मन का होता है."
#आगरा में छात्रों और अभिभावकों के बीच इन दिनों री-नीट और सीबीएसई मूल्यांकन विवादों को लेकर चिंता का माहौल देखा जा रहा है. एक ओर म���डिकल प्रवेश के लिए प्रस्तावित री-नीट परीक्षा 21 जून को आयोजित होनी है, वहीं दूसरी ओर सीबीएसई की उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन और अंक सत्यापन से जुड़े विवाद लगातार चर्चा में बने हुए हैं. इन घटनाओं ने लाखों विद्यार्थियों के मन में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर प्रश्न खड़े कर दिए हैं.
समाचार में छात्रों ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि बार-बार सामने आ रही तकनीकी और मूल्य��ंकन संबंधी गड़बड़ियों से उनका आत्मविश्वास प्रभावित हो रहा है. कुछ छात्रों ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन न करने का निर्णय भी लिया, क्योंकि उन्हें पूरी प्रक्रिया पर भरोसा ��हीं रह गया. वहीं कई अभिभावकों और विद्यार्थियों ने मांग की है कि परीक्षा और मूल्यांकन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया जाए ताकि मेहनत करने वाले छात्रों को किसी प्रकार की शंका या असुरक्षा का सामना न करना पड़े.
विशेषज्ञों ने री-नीट की तैयारी कर रहे छात्रों को सलाह दी है कि वे विवादों और अफवाहों से दूर रहकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करें. विशेष रूप से भौतिक विज्ञान विषय पर अधिक फोकस करने, निय���ित मॉक टेस्ट देने तथा पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों का अभ्यास करने की सलाह दी गई है. उनका मानना है कि अंतिम दिनों में आत्मविश्वास और निरंतर अभ्यास ही सफलता की कुंजी साबित होंगे.
छात्रों की राय में बार-बार सामने आने वाले विवाद उनके मनोबल को प्रभावित करते हैं. उनका कहना है कि लाखों विद्यार्थी पूरे वर्ष कठिन परिश्रम करते हैं, इसलिए परिणामों और मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर किसी भी प्रकार की अस्पष्टता या गड़बड़ी उनके भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा देती है. कई छात्रों ने यह भी कहा कि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि किसी भी परीक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी शक्ति छात्रों और अभिभावकों का विश्वास होता है. यदि मूल्यांकन, पुनर्मूल्यांकन या प्रवेश परीक्षाओं को लेकर लगातार विवाद सामने आते हैं, ��ो उनका असर केवल परिणामों पर नहीं, बल्कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास पर भी पड़ता है. इसलिए शिक्षा बोर्डों और परीक्षा एजेंसियों को पूर्ण पारदर्शिता, तकनीकी मजबूती और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि विद्यार्थियों की मेहनत पर किसी प्रकार का संदेह न रहे.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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#एनसीईआरटी की पुस्तकें जून के तीसरे सप्ताह तक उपलब्ध कराने का दावा
"पुस्तकें केवल कागज़ के पन्ने नहीं होतीं, वे लाखों विद्यार्थियों के सपनों और सी��ने की यात्रा का आधार होती हैं."
#नईदिल्ली से प्राप्त जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने आश्वासन दिया है कि जून के तीसरे सप्ताह तक सभी आवश्यक पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध करा दी जाएंगी. परिषद का कहना है कि पुस्तकों की छपाई और वितरण का कार्य तेजी से चल रहा है तथा देशभर में आपूर्ति व्यवस्था की लगातार निगरानी की जा रही है.
एनसीईआरटी के अनुसार मांग के अनुरूप पुस्तकों का मुद्रण किया जा रहा है और वितरण प्रक्रिया को भी तेज किया गया है. परिषद का लक्ष्य है कि जून के तीसरे सप्ताह तक सभी रिक्त मांगों को पूरा कर दिया जाए, ताकि किसी भी छात्र को अध्ययन सामग्री के अभाव का सामना न करना पड़े. नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में पुस्तकों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर समन्वय स्थापित किया जा रहा है.
समाचार के अनुसार ���नसीईआरटी के निदेशक प्रो. डी.पी. सकलानी ने बताया कि देशभर में पुस्तक आपूर्ति को सुचारु बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं. परिषद यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि विद्यार्थियों को नए सत्र में आवश्यक पाठ्यपुस्तकें समय पर प्राप्त हों और उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो.
हालांकि हर वर्ष सत्र प्रारंभ होने के बाद भी कई क्षेत्रों में पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता को लेकर शिकायतें सामने आती हैं. ऐसे में केवल छपाई और आपूर्ति की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि पुस्तकें वास्तव में विद्यालयों, पुस्तक विक्रेताओं और छात्रों तक समय पर पहुंचें.
प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO) का मानना है कि शिक्षा का पहला आधार समय पर उपलब्ध पाठ्यपुस्तकें हैं. यदि सत्र शुरू होने के बाद भी विद्यार्थियों को किताबों के लिए इंतजार करना पड़े, तो इसका सीधा प्रभाव उनकी पढ़ाई पर पड़ता है. सरकार और संबंधित संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक छात्र तक पाठ्यसामग्री समय पर पहुंचे, विशेषकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों तक.
दीपक सिंह सरीन, राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ़ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA NGO)
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