1920 के आसपास ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम पर था. उस समय लगभग 3.5 करोड़ किमी ��्षेत्र और दुनिया की 50 करोड़ आबादी पर शासन स्थापित था.
50 करोड़ में भारत की आबादी 25 करोड़ के करीब थी.
35-40 अलग अलग छोटे बड़े कॉलोनी को नियंत्रण में रखने के लिए 1,00,000 ब्रिटिश सैनिक थे. यानी 1 ब्रिटिश सैनिक के अधीन 5000 औपन���वेशिक आबादी.
इतनी बड़ी आबादी को ब्रिटिश कंट्रोल कैसे करते थे ? ब्रिटिश राज के उदाहरण से समझते हैं.
वाइसराय : 1
गवर्नर : 8
न्यायपालिका के जज
म्युनिसिपल कमिश्नर
पुलिस कमिश्नर
डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट
पुलिस सुपरिटेंडेंट
वाईस चांसलर
और 65,390 ब्रिटिश सैनिक
65,390+8000 के करीब मिलकर भारत के पर शासन करते थे. आजाद भारत में अंग्रेजों की जगह तीन चार जातियों ने ले रखी है.
1963 - फूलन देवी जी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा गांव में हुआ.
1974 - कम उम्र में पुत्तीलाल से विवाह. घरेलू हिंसा के बाद अपने मायके लौट आई.
1979 - पुलिस हिरासत में अत्याचार. बाबू गुज्जर गिरोह ने अगवा किया.
1980 - विक्रम ��ल्ला का साथ. बाबू गुज्जर को मारकर गिरोह पर कब्जा किया. फूलन देवी धीरे धीरे इस गिरोह की सदस्य बन गयीं.
इसी साल विशेष जाति के गिरोह ने फूलन देवी को अगवा कर बेहमई गांव में तीन सप्ताह कैद रखकर अत्याचार किया.
1981 : फूलन देवी बेहमई में 20 लोगों का पाताललोक पहुंचा कर बदला लिया, इसे बेहमई कांड कहा जाता है.
1983 : फूलन देवी ने MP के CM अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण किया.
1994 : जेल से रिहाई
1995 : नागपुर में दीक्षा भू���ि जाकर बौद्ध धम्म स्वीकार किया.
1996 : समाजवादी पार्टी के टिकट से मिर्जापुर लोकसभा सीट से राजनीतिक में धमाकेदार एंट्री की.
2001 : दिल्ली स्थित उनके आवास के बाहर उन्हें गोली मार दी गयी. जब गोली मारी गयी वो निहत्थी थीं.
आज फूलन देवी जी की जयंती है. महान क्रांतिकारी वीरांगना फूलन देवी जी को कोटि कोटि नमन करत��� हूँ 🙏🏼
पैलेट गन, कील लगी लाठियां और आंसू गैस के गोले - शांतिपूर्ण तरीके से सिर्फ़ अपने भविष्य के बारे में सवाल पूछ रहे छात्रों पर इनसे हमला किया गया।
पुलिस ने लड़कियों को पीटा, कई के प्राइवेट पार्ट्स पर चोटें आईं। नाबालिगों की हड्डियां टूट गई। मोदी सरकार सवालों का जवाब ऐसी बर्बरता से देती है।
और गृह मंत्री? लगभग 20 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अमित शाह इस मामले पर जवाब देने के लिए संसद तक नहीं आए। चर्चा के लिए विपक्ष के हर प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया है।
उनकी चुप्पी सिर्फ अनदेखी या चूक नहीं - यह हिंसा को मंज़ूरी है। वो या तो गुनहगार हैं या फिर नाकाबिल।
हम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग करते हैं। और जब तक उन्हें जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, ये लड़ाई नहीं रुकेगी।
https://t.co/YHA3mGhX0h
राहुल गांधी मोदी से ज्यादा अमित शाह पर हमला क्यों कर रहे हैं?
यही सवाल आज बहुत से लोगों को परेशान कर रहा है।
दरअसल, राहुल गांधी सिर्फ अमित शाह को टार्गेट नहीं कर रहे, वे BJP की आने वाली लीडरशिप को रडार पर ले रहे हैं।
राहुल गांधी इस बात को भली-भांति समझते हैं कि मोदी अपनी राजनीतिक पारी खेल चुके हैं और चुनाव से पहले अमित शाह को पिछले दरवाजे से प्रधानमंत्री बनाने की तैयारी में है।
इसलिए ��ड़ाई सिर्फ मोदी से नहीं है, उस चेहरे से भी है जो मोदी के बाद सत्ता संभाल सकता है।
छात्र आंदोलन ने मोदी का पूरा आभामंडल मिट्टी में मिला दिया है। जंतर-मंतर पर छोटे-छोटे बच्चों की आवाज ने उनकी साख को तार-तार कर दिया।
मीडिया, सोशल मीडिया और सरकारी PR के जरिए पिछले 20 साल में मोदी की जो महामानव वाली छवि गढ़ी गई थी, एक आंदोलन ने उसकी नींव हिला दी।
पिछले कुछ वर्षों से मोदी ने नेपथ्य में रहकर अमित शाह की राजनीतिक छवि को लगातार मजबूत किया।
संसद में धारा 370 हटाने का बिल हो, CAA हो, NRC हो या तीन तला���—BJP का पूरा इकोसिस्टम अमित शाह को मोदी के बाद के सबसे ताकतवर चेहरे के रूप में स्थापित करने में लगा रहा।
इसके संकेत 2019 में ही मिल गए थे, जब अमित शाह ने BJP अध्यक्ष का पद छोड़कर गृह मंत्री का पद संभाला। राजनाथ सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को किनारे कर मोदी ने सत्ता के भीतर भविष्य का समीकरण भी काफी हद तक स्पष्ट कर दिया था।
राहुल गांधी एक मंझे हुए राजनेता की तरह काम कर रहे हैं।
वे जानते हैं कि मोदी और शाह ने अपने रहते BJP की सेकंड लाइन लीडरशिप को न तो गुजरात में स्वतंत्र रूप से पनपने दिया और न दिल्ली में।
शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा राजे जैसे बड़े नेताओं का धीरे-धीरे मुख्य सत्ता घेरे से बाहर होना हो या गुजरात में केशुभाई पटेल, सुरेश मेहता और काशीराम राणा जैसे नेताओं का अप्रासंगिक हो जाना—BJP में अगली पीढ़ी की राजनीति का स��ाल हमेशा मौजूद रहा है।
यही राहुल गांधी की रणनीति है।
मोदी पर हमला वर्तमान को चुनौती है,
अमित शाह पर हमला BJP के भविष्य को चुनौती है।
राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से नासमझ समझने वाले शायद उनकी राजनीति को समझ ही नहीं पा रहे हैं।
मुझे पूरा यकीन है—
राहुल जल्दबाजी में नहीं, लंबी लड़ाई की तैयारी कर रहे है।
और आज नहीं तो कल,
यह लड़ाई BJP को सिर्फ सत्ता से नहीं, उसके 1984 जैसे स्थिति तक भी ले जा सकती है।
#घोरकलजुग #डाटावाणी #RahulGandhiForPM
हम अमित शाह की पर्सनल ओपिनियन में intrested नहीं हैं। उनका एजु���ेशन पर क्या view point है- उसमें न देश intrested है, न हम
⦿ हमें ये जानना है:
• गृह मंत्रालय ने बच्चों पर गोली चलवाई- तो क्या अमित शाह ने इसका आदेश दिया था?
• बिना गृह मंत्रालय के आदेश के दिल्ली पुलिस, RAF गोली नहीं चलवा सकती
⦿ अगर अमित शाह ने गोली चलवाई तो वो Culpable हैं और अगर किसी दूसरे ने चलवा दी तो अमित शाह Incompetent हैं
यानी- अब एक ही रास्ता बचा है, जिसमें उन्हें इस्तीफा देना होगा
⦿ 15 दिन तक अमित शाह सदन में आ नहीं पाए, लेकिन अब उनकी इमेज वाले गुब्बारे पर टांके लगाने की कोशिश हो रही है, पर ऐसा होने वाला नहीं है
: नेता विपक्ष श्री @RahulGandhi
झारखंड में Gen Z का सैलाब
दिल्ली में बवाल
झारखंड में लाठी चार्ज
दिल्ली में पुलिस से झड़प
झारखंड में आंदोलन
दिल्ली में हंगामा
अंबानी के चैनल के दलालों की ये करतूतें हैं, फिर कहते हैं कि हमें खदेड़ा जा रहा है।
@AmanChopra_@AMISHDEVGAN@SushantBSinha@News18India 🤮🤮
2022 में गहलोत सरकार की सुपारी लेकर दंगे भड़काने की नीयत से @AmanChopra_ ने बेहद भड़काऊ प्रोग्राम किये थे। जब राजस्थान पुलिस ने कार्रवाई की तो ये ऐसे ही रो रहा था, फिर चुपचाप वीडियो डिलीट कर दिया।
ये डेढ़ फुट का सपौला चाहता है कि इसको देश में दंगे भड़काने की फुल आजादी मिले
“अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा” - कल प्रयागराज में एक छात्र ने मुझसे यही कहा। सालों की तैयारी, घर की ज़मीन बेची, माँ-बाप का कर्ज़ और फिर भी हाथ में कुछ नहीं।
यह हार उसकी न��ीं है। यह उस व्यवस्था की हार है जिसने उसकी मेहनत का दाम देने से इनकार कर दिया।
तेरह दिन हो गए - गृह मंत्री अमित शाह के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। मोदी जी माफी मांगने की जगह क्षमा बाँट रहे हैं।
@AmitShah जी, यह मत समझिए कि हम जवाबदेही मांगना बंद कर देंगे। राजधानी की सड़कों पर बच्चों पर लाठियां और पैलेट चले - और आपने एक शब्द नहीं कहा। आज नहीं तो कल, इस जुर्म का जवाब आपको देना ही पड़ेगा।
छात्र देश की रोश���ी हैं, और मैं उनकी पूरी शक्ति के साथ खड़ा हूं।
#ChhatronKiGoonj
रविशंकर भारत��� चाहते तो अपनी बेटी को दुर्गा वाहिनी या संस्कार भारती जैसी महान संस्था में भेज सकते थ���।
VHP के मुस्लिम विरोधी अभियान,चर्च जलाने जैसे कार्यों में लगा सकते थे।
पर उन्होंने अपनी बेटी को पढ़ने के लिए बॉस्टन यूनिवर्सिटी भेज कर जो त्याग किया है, उसके लिये रविशंकर को युगों -युगों तक याद रखा जायेगा
Telegraph ने कल एक खबर की थी, मोदी के IIT दिल्ली जाने लो लेकर.
उस खबर में बताया गया कि IIT के छात्रों को निर्देश दिए गए कि मोदी से मेडल लेते समय उन्हें अपना सिर कितना झुकाना है.
ये खबर वायरल हो गई और अब Telegraph ने इस खबर को डिलीट कर दिया है.
लगता है सरकार ने फोन चला गया 🤔
पंकज, हम तो खुलकर इंडिया गठबंधन के साथ हैं एकदम। पैसा दें तब भी, ना दें तब भी।
आप क्यों नहीं स्वीकारते कि आप भाजपा के स्लीपर सैल ह��, पत्रकारिता का नाटक क्यों करते हो?
UP में किस माफिया से कौन पैसा खाता है, ये सबको मालूम है।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आज लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि, गृहमंत्री अमित शाह “या तो दोषी हैं या फिर अयोग्य”। रणनीति साफ़ दिख रही है कि परिसीमन हो या चुनाव नतीजे निशाना मछली की आँख पर है।
आओ ना..
डरो मत..
आप ५६ इंच वाले हो,मालूम है,
एक बार अंदर आकर तो देखो
डरो मत
राहुल गांधी अच्छे संस्कारी इन्सान है,
वो आपको कुछ नही करेंगे
बस सदन में थोडी धुलाई करेंगे
इतना तो हक बनताही है
राहुल संसद के दरवाजे पे खडे है..
छुपके मत देखो …
आओ भाई..आईए
@AmitShah
देश के छात्रों ने system के फैलाए अंधेरे के बीच, अपने डर का सामना कर, रौशनी की मशाल जलाई है।
ये मशाल अब पूरे देश को अपने अधिकारों का रास्ता दिखा रही है।
BJP-RSS और अडानी के System को अब खतम, tata, bye-bye कहने का वक्त आ गया है।
This is brilliant : Must listen
1. पैसा: अडानी की आमदनी 10 साल में 30 गुना बढ़ी
2. सत्ता: BJP का बैंक बैलेंस 10,000 करोड़ रुपए है
3. सोच: संस्थाओं में RSS के प्रचारक फिट किए जाते हैं
@RahulGandhi
सिर्फ़ 4 घंटों में,
व्यूज़ –– 187 मिलियन
लाइक्स –– 22.8 मिलियन
रिप्लाई –– 1.5 मिलियन (88% पॉजिटिव)
RaGa पर बने एडिट्स पोस्ट करने वाले किसी भी इंस्टाग्राम कंटेंट क्रिएटर के लिए ज़बरदस्त रीच।
“गुंडे भेजने के बाद एक 15 साल की लड़की को सबके सामने माफ़ी मांगने के लिए मजबूर करना और फिर उस माफ़ी को स्वीकार करना पूरी तरह बकवास है”
@RahulGandhi 🔥🔥🔥🔥
द पॉवर विदाउट एकांऊंबिलिटी..
भारत की सर्वशक्तिमान संस्था, संसद है। वह सरकार गठन कराती है, उसे बजट देती है, उसके कानून का निरीक्षण और एप्रूवल करती है। उसके खर्चो तथा नीतियों की स्क्रूटनी करती है।
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लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति के मिलन से संसद बनती है। उसे सर्वोच्च श���्ति, जनता जनार्दन देती है।
हर मंत्री, हर अफसर, हर संवैधानिक दायित्व निर्वहन करने वाला, संसद के अधीनस्थ है। यह संसदीय लोकतंत्र का सिद्धांत है। इसलिये यह, सर्वोच्च संस्था अपने कामकाज के लिए, साल के 180 दिन से अधिक बैठा करती थी।
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याने हर दूसरे दिन संसद बैठती। प्रधानमंत्री नेहरू सदन में बैठते, बात करते, सदन को क���्विंस करते। उसके फैसले सर माथे पर रखते। भले ही वह, उनके अपने मत से भिन्न क्यो न हो।
सवाल, आलोचना, सुझाव और डिस्कशन की घुट्टी, भारत के जनप्रतिनिधियों को आजादी की लड़ाई से मिली थी। जिसे अपनी राजव्यवस्था में भी समाहित किया।
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इसके बाद की पीढियो में राजनीतिक सुविधा और सत्ता को अबाधित रखने की चाहत झलकने लगी। सदन के सत्रों के दिन घटने लगे।प्रश्नों की संख्या पर नियंत्रण होने लगा। पीएसी के सम्मुख रखी जाने वाली सीएजी की रिपोर्ट्स घटी।
कभी डॉक्टर अम्बेडकर ने नेहरू सरकार से इस्तीफा दिया। कारण बताया- नेहरू ने हिन्दू कोड बिल पर पूरा साथ नही दिया। उन्होंने डेट्स के साथ साबित किया कि नेहरू ने मात्र 12 दिन इस बिल पर चर्चा करवाई।
आज के दौर में किसी बिल पर 12 घण्टे चर्चा हो.. तो बहुत है। ��रकारें, नाममात्र के डिस्कशन के बाद, चटपट मत विभाजन करके, बहुमत के दम पर बिल पास कराने लगी।
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तो 90 के दशक विपक्ष ने नया तरीका निकाला।
वह सदन ही बाधित कर देता।
शोर, शराबा, प्रदर्शन, विवाद इसके तरीके थे। तब भाजपा विपक्ष के केंद्र में थी। उसके पिछली पंक्ति के सांसद, सदन बाधित करने के मास्टर थे।
आज वह लोग सत्ता में हैं।
अग्रपंक्ति में है।
और अपनी मास्टरी के अनुरूप वक्ताओं के बीच टोकाटाकी, चीख पुकार से भाषणों में में बाधा डालते हैं। बहस चलने नही देते, फिर चटपट मत विभाजन।
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विश्व में शायद अकेली संसद होगी, जिसमे सत्ता पक्ष ही शोर मचाकर समय बर्बाद करता है। यह तरीका, उनके बॉस- आरएसएस, मोदी-शाह को बड़ा मुफीद है।
क्योकि उनकी जड़े आजादी के आंदोलन से नही, शाखा से है। जहां ऊपर से आया आदेश, सर माथे लेना होता है। संघ दीक्षितो की सरकार चाहती है, कि संसद भी शाखा की तरह, प्रवचन सुने, और ठप्पा लगाए।
कोई सवाल न पूछे, बहस न करे। उन्हें एकांउंटीबिलिटी की न तो आदत है, न इसका प्रशिक्षण। वे तो आम जनता, छात्र और किसान से भी आज्ञापालन की आशा रखते है।
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और राहुल गांधी, उन्हें उन्ही के खेल में पछाड़ रहे हैं।
परिसीमन बिल पास कराने को आतुर सरकार ने सारे गणित-सेट करके रखे हैं। पार्टियां तोड़ ली, संख्या जमा ली, सत्र बुला लिया। लेकिन राहुल हैं- कि संसद चलने ही नही दे रहे।
बहाना, गृहमंत्री से एकांउंटीबिलिटी मांगने का।
जिसके पास जो है नही, वह मांग रहे हैं।
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अमित शाह, जिस चीज से सबसे ज्यादा नावाकिफ है, वह एकांउंटीबिलिटी है। उनकी तमाम शक्ति, प्रधानमंत्री से आती है। जनता, संसद, पार्टी या लोकप्रियता से नही।
उनसे अगर कोई जवाब मांग सकता है, या प्रोटेक्ट कर सकता है, तो वह प्रधानमंत्री खुद है। दिक्कत यह कि उन्हें खुद साँप सूंघ�� हुआ है। दोनों जने सदन से भाग रहे हैं।
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दरअसल, स्क्रिप्टेड इंटरव्यू, कैमरे के सामने मोनोलॉग, ऊंचे मंच से मुंह पर पट्टी बांधे श्रोताओं के सामने, लम्बा लम्बा भाषण देने के लिए संघ के वर्कर खूब प्रशिक्षित होते है।
पर उनका हर कार्यकर्ता- द्विपक्षीय सम्वाद में हांफने लगता है, धमकाने लगता है। और जल्द ही बगलें झांकते हुए भाग खड़ा होता है।
दोषपूर्ण ट्रेनिंग, गलत माइंडसेट- संघ दीक्षितो को संसदीय लोकतंत्र में शासन के अयोग्य बनाता है। तानाशाही वे भले पोल पोट या ईदी अमीन से बेहतर चला लें, लेकिन संसदीय लोकतंत्र तो जवाबदेही मांगेगा।
व्हेयर दे फेल स्पेक्टिकुलरली..
दे वांट- पॉवर विदाउट एकांऊंबिलिटी
🙏