उप्र में पट्टे पार काम करनेवालों की सबसे ज़्यादा संख्या पिछड़े व दलित वर्ग के लोगों की है। इन्हीं ग़रीब, वंचित शोषित लोगों का राजस्व विभाग व तहसील के कर्मचारियों द्वारा सबसे ज़्यादा शोषण किया जा रहा है। एक तरफ़ नियमानुसार पट्टे की जो भूमि 5 साल बाद स्वतः संक्रमणीय हो जानी चाहिए वो बिना वसूली के नहीं की जा रही है। दूसरी तरफ़ तहसील से पट्टे की पत्रावलियाँ गायब करके या तो खुलेआम वसूली हो रही है या पट्टे निरस्त करके भाजपा सरकार के प्रश्रय प्राप्त भूमाफ़िया��ं को क़ब्ज़ा करने के लिए दिये जा रहे हैं।
‘पट्टे’ पीडीए समाज के शोषण की वजह बन गये हैं। ये व्यवस्था तुरंत बदलनी चाहिए।
पट्टेदार कहे आज का, नहीं चाहिए भाजपा!