जगत के नाथ तुम हो साथ तो परवाह कैसी
रखना तुम मेरे कान्हा तुम्हारी चाह जैसी।
मेरे गीतों पे तेरी मधुरतम् मुस्कान कान्हा
किसी कवि को मिली हो विश्व भर की वाह जैसी।
~ प्रह्लाद पाठक
मेरे रूह बसे गिरधारी
पूछौ न
तबीयत हमारी
ब्रजधाम बसन की तैयारी
बूझौ न नीयत हमारी
कुंज गलिन में बिचरण करते
कृष्ण छबी अँखियन में भरते
मिलिहैं रास बिहारी
असत जग, सत हैं सुदर्शनधारी।
संवरिया पूछो न तबीयत हमारी....
~ प्रह्लाद प्रियकृष्ण
तारों की खिलाफ़त कितनी भी मुस्तक़िल हो
वो सूरज उगे बिन रहेगा नहीं
बाँध लगते ���ैं नदियों में नहरों में यारों
वो दरिया है तुमसे रुकेगा नहीं
~ प्रह्लाद पाठक
मैं तारीफें भी करूंगा तो कभी कभार,
मुझे रोज,
कोई अच्छा नहीं लगता।
मैं फरेबियों की
बस्ती में पला बढ़ा हूँ
किसी का शहद भरा लहज़ा
मुझे सच्चा नहीं लगता ।
~ प्रह्लाद पाठक