बाऊ साहब लोग छात्रों के भारी विरोध के बावजूद अपने स्टैंड पर बरकरार हैं। UPPSC आंदोलन में अधिकतर PDA के छात्र हैं जिनका इस व्यवस्था पर विश्वास नहीं है।
छात्रों का हित और उनकी मांग दोनों का ध्यान रखते हुए इस निर्णय को तत्काल वापस लेना चाहिए।
#UPPSC_No_Normalization
देशभर से दिल्ली AIIMS आने वाले मरीजों और उनके परिवारों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्���ी को पत्र लिखा है।
पिछले दिनों मैंने देखा कि ठिठुरती ठंड में ये मेट्रो स्टेशन के नीचे सोने को मजबूर हैं, जहां न तो पीने के पानी की व्यवस्था है और न शौचालय की। आसपास कूड़े-कचरे का भी ढेर लगा रहता है।
इतनी बड़ी संख्या में मरीजों का दिल्ली AIIMS आना यह भी दिखाता है कि लोग जहां रहते हैं वहां उन्हें सस्ती और अच्छी क्वालिटी की स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
मैं उम्मीद करता हूं कि मेरे पत्र का ��ंज्ञान लेते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री इस मानवीय संकट को हल करने के लिए तत्काल कदम उठाएंगे। साथ ही आशा है कि केंद्र सरकार अगामी बजट में पब्लिक हेल्थकेयर सिस्टम को मज़बूत करने के लिए ठोस पहल करेगी और उसके लिए ज़रूरी संसाधनों को बढ़ाएगी।
द डिफरेंस ऑफ मोदी एन्ड मनमोहन..
आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि मोदी सरकार वही कर रही है, जिसकी शुरुआत मनमोहन सिंह ने की थी।
याने निजीकरण।
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जब सेवाओ, और उत्पादन से जुड़े कामो में निजी निवेश, एक्सपर्टीज का अभाव था, तो भारत सरकार ने स्वयं इन्वेस्ट किया।
कम्पनियां बनाई, फैक्ट्री लगाई। जहां छोटे छोटे उद्यम थे, नेशनलाइज भी किया, उसमे पैसे डाले, नौकरियां दी। देश को काम पर लगाया।
ये सार्वजनिक उद्यम, या PSU थे, जरूरी स्टील, पॉवर, ट्रांसपोर्ट और तमाम भारी उद्यम के ���पीसेन्टर थे। कालक्रम में छोटे छोटे उद्यम, विशालकाय साम्राज्य बन गए। जिनकी कुछ सेवाओ पर मोनोपोली थी।
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पर ये मिश्रित अर्थव्यवस्था थी। याने साथ साथ निजी उद्योगों को भी कोटा दिया गया कि वे भी उत्पादन करें, सक्षमता बढ़ाएं।
1991 तक देश मे एक ठीक ठाक निजी क्षेत्र तैयार हो चुका था। रिलायंस, अडानी, वीडियोकॉन, इंफोसिस और हजारों दूसरे संस्थान खड़े हो चुके थे।
जब निजी उद्यम मजबूत हुए तो पुरानी व्यवस्था कालातीत होती गयी। कोटा लाइसेंस, कम पड़ने लगा। अब जरूरत थी कि निजी क्षेत्र का दायरा बढ़े।
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राजीव ने 1985 के बजट से इसकी शुरुआत कर दी थी। मनमोहन ने बतौर वित्तमंत्री, कोटा व्यवस्था खत्म ही कर दी।
तमाम क्षेत्र निजी उद्यमों के लिए खोले। निजी क्षेत्र को फाइनांस और नीतिगत मदद दी। रुपये को परिवर्तनीय किया, विदेशी इन्वेस्टमेंट और तकनीकी नेटवर्किंग की इजाजत दी।
सरकारी उद्यमों को भी प्राइवेटाइज करना शुरू किया। आने वाले दौर में निजीकरण एक नीति बन गयी। अटल सरकार ने बाकायदा एक विनिवेश मंत्रालय ही बना दिया।
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लेकिन निजीकरण और निजीकरण में फर्क है।
यह फर्क आपको समझना होगा। तो नीचे दो शेयरहोल्डिंग पैटर्न है।निगाह डालिये।
एक ICICI बैंक है। नेहरू का बनाया PSU था।
आज कौन है इसका मालिक, या शेयरहोल्डर??
ग्राफ में मिलेंगे जनरल पब्लिक, संस्थागत निवेशक, बैंक, म्युचुअल फंड्स..
दूसरे शब्दों में आम लोग और व��शेषज्ञ संस्थान इसके मालिक है।
यहां प्रमोटर शेयर खोजिए।
नही मिलेगा।
याने उद्यम सरकारी नही, तो एक आदमी या ग्रुप की संपत्ति भी नही। आम शेयरहोल्डर, अपने अपने शेयरों के मुताबिक डायरेक्टर भेजते हैं।
एक फुल टाइम सीईओ नियुक्त करते हैं।
आगे सारा संचालन कारपोरेट गवर्नेस के नियमो के तहत चलता है। इसे एक प्रजातांत्रिक निजी संस्थान का निर्माण कह सक��े हैं।
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अडानी का शेयर होल्डिंग पैटर्न देखिए। 75% प्रमोटर ग्रुप है। 25% में तमाम संस्थागत निवेशक और आम पब्लिक..
एक व्यक्ति, या ग्रुप की कमांडिंग पोजिशन है। कम्पनी का धन, सम्पत्ति, पॉलिसी एक ही हाथ मे है। यह एक रजवाड़ा है।
नए युग का रजवाड़ा।
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ICICI मनमोहन किस्म का निजीकरण है। वह आज भारत का सबसे बड़ा निजी बैंक है।पारदर्शी, एफिशिएंट, एग्रेसिव है।
यहां चन्दा कोचर ने कुछ गलत निर्णय लिये। लोन देने के एवज में चार पांच सौ करोड़ का निजी लाभ ले लिया।
खबर फूटी, और डायरेक्टरो ने कान पकड़ कर बाहर कर दिया। क्या अडानी इंडस्ट्री में, या ऐसे किसी और संस्थान में शेयरहोल्डर के पास यह पॉवर है?
नही।
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निजी रजवाड़ो को वाइटल सर्विसेज के सारे सेक्टर सौप देना..
एक ही रजवाड़े को। माइंस, पॉवर, इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट, रेल, फ़ूड, कम्युनिकेशन.. जीवन की हर सांस के लिए आप एक कम्पनी, एक मालिक, एक मुट्ठी के ब��धक है।
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और वह मुट्ठी एक नेता, एक दल, एक गैंग की कठपुतली है।
इसकी तुलना आप मनमोहन सिंह के निजीकरण से कैसे कर सकते है?
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बेचारे अमिताभ बच्चन उर्फ विजय को "महज एक सूटकेस सोना" स्मगल करने के लिए मड आइलैंड के पीछे समुद्र तट पर गुप्पा चुप्पा जाना पड़ता।
जान का जोखिम लेकर, पीछा करती पुलिस से बचना पड़ता। लेकिन आज विजय के पास अपना खुद का पोर्ट है, एयरपोर्ट है। जहां पुलिस भी घुस नही सकती।
जो चाहे स��मान ले सकता है।
भेज सकता है।
लेकिन खुदा का शुक्र है कि आज का विजय, ईमानदार व्यक्ति है। कभी भी मुंद्रा पोर्ट से कोई गलत सामान पार नहीं हुआ। वरना तो हथियार, स्मैक, अफीम कुछ भी पार हो सकता था।
हमारा विजय देश की सुरक्षा को कतई खतरा नही है। यह मोनोपोली अच्छे हाथों में है।
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जी हां, माइंस, पॉवर, इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट, रेल, फ़ूड, कम्युनिकेशन सब कुछ एक या दो हाथ मे रख देना प्राइवेटाइजेशन नही।
यह म��नोपोलाइजेशन है।
सरकारी ��ोनोपोलाइजेशन इनेफिशिएंट हो सकता है, जानलेवा नही।
लेकिन निजी मोनोपोलाइजेशन के खतरे विशाल हैं। यही आज मुनाफाखोरी, करप्शन, महंगाई और बेरोजगारी का मूल है।
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यह मनमोहन का तरीका नही था।
तो जब प्राइवेटाइजेशन की बात होगी, मैं उसके समर्थन में रहूंगा।
बशर्ते, मनमोहन सिंह के तरीके से हो।
🙏
@jagdambikapalmp हमसफ़र में सिर्फ 3AC है जिससे दिल्ली तक जनरल, स्लीपर सहित 2A व 1A की सुविधा इतने वर्षों बाद भी नहीं उपलब्ध है। इसपर भी महोदय का ध्यान आकृष्ट कराना आवश्यक है।
@AshwiniVaishnaw
@jagdambikapalmp बहराइच-नौगढ़ होकर गोरखपुर तक चल रही ट्रेन 05132 सिर्फ नाम ब���लकर 15131 के रूप में गोरखपुर से वाराणसी तक जाती है जिससे इस रूट पर ट्रेन होने के बावजूद अलग अलग आरक्षण मिलता है जो बहुत अव्यवहारिक है।
इसपर जरा सा ध्यान दिया जाय तो नौगढ़ से वाराणसी के लिए बहुत आसानी हो जाएगी।
@Manav4890@NitishKumar@Jduonline@BJP4Bihar आप की व्यथा से मन दुःखी है।
यदि डोमिसाइल नीति लागू होती तो आज स्थिति दूसरी होती।
देश के अधिकांश राज्य इस नीति का कड़ाई से पालन करते हैं।
स्वास्थ्य नीति को लेकर सरकार वे सभी गलतियाँ कर रही है जो वह कर सकती है।
सरकार ��ा ध्यान मौजूदा मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों के सुदृढ़ीकरण और आधुनिकीकरण पर होना चाहिए, लेकिन सारा ध्यान नए मेडिकल कॉलेज खोलने पर है।
सरकार को उन डॉक्टरों की गुणवत्ता बढ़ाने पर काम करना चाहिए था जो पहले से ही निकल रहे हैं, लेकिन उसका ध्यान केवल डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने पर केंद्रित है।
सरकार का काम evidence-based medicine के प्रति जागरूकता फैलाने पर होना चाहिए और पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग केवल gaps fill क�� लिए करना चाहिए था। इसके विपरीत, सरकार evidence-based medicine को ही दरकिनार कर रही है।
दरअसल, सरकार का जोर उन चीज़ों पर ज़्यादा होता है जिनका चुनावी प्रभाव अधिक हो। सरकार को लगता है कि नए मेडिकल कॉलेज खोलने से वोट मिलेगा, और अधिकारी भी ज़ाहिर तौर पर इनमें ज़्यादा रुचि दिखाते हैं।
अस्पतालों में full-proof fire fighting system लगाने और उसके रखरखाव में न तो अधिकारियों को रुचि है, न ही सरकार को। चूंकि रखरखाव का पैसा अधिकारियों के कमीशन में चला जाता है, इसलिए fire-fighting मशीन लगाने वाली कंपनी भी उसके रखरखाव में रुचि नहीं लेती।
स्वास्थ्य नीति को लेकर इतनी दिशाहीनता ही इन सभी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार है।
स्वास्थ्य नीति को लेकर सरकार का दृष्टिकोण ठीक वैसा ही होना चाहिए जैसा space technology के प्रति है:
Minimum Interference, Maximum Impact.
2 करोड़ की रकम इनके लिए कितनी छोटी थी कि सिर्फ एक कॉल पर भेज दिया!!
यूपी सरकार में मंत्री नंद गोपाल नंदी के अकाउंटेंट के नम्बर पर नंदी के बेटे की डीपी लगे नम्बर से व्हाट्सएप कॉल आयी जिसमें तत्काल 2 करोड़ रुपये 3 खाता में भेजने को कहा गया।
बाद में पता चला कि उनके साथ ठगी हो गयी।
अजब प्रदेश की गजब कहानी...
मृतक व्यक्ति की आंखें मिली गायब, अस्पताल प्रशासन ने कहा कि आंख को चूहा खा गया।
बिहार की यह घटना विचलित भी करती है और व्यथित भी।
@mangalpandeybjp