प्रेम की किरणें जिनके दिल तक पहुँची ना,
वो कोठों पे रात बिताकर मर्द बने।
महख़ाने के बाहर लिखा था —
महख़ाने में दर्द भुलाकर मर्द बने।
ऐसे भी कुछ मिल जाते हैं दुनिया में,
जो मर्दों का नाम डुबाकर मर्द बने।
जैसे-तैसे ज़ोर लगाकर मर्द बने।
2/2
जैसे-तैसे ज़ोर लगाकर मर्द बने,
खून-पसीना साथ बहाकर मर्द बने।
कुछ ने अपने ह���थ बढ़ाए गिरने पे,
कुछ औरत पे हाथ उठाकर मर्द बने।
मूर्ख कहे या शाबाशी दे,
आन पे जो अपनी जान गँवा कर मर्द बने।
पत्थर, ज़ालिम, जाहिल, निष्ठुर, आवारा,
जाने क्या-क्या नाम कमा कर मर्द बने।
1/2