मेरे जीवन में सब सही चल रहा था। खेल में पदक जीत रहा था। सरकार से इनाम पा रहा था। मंत्री-संतरियों से खूब शाबाशी। फिर मेरे घर पर कुछ जूनियर महिला पहलवान आयीं। औपचारिक राम-रमी के बाद सबकी आँखों में आँसू थे। उनकी बात सुनी तो फिर जीवन का ऐसा सफ़र शुरू हुआ जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं था। उनके संघर्ष में शामिल होने से खेल गया, कैरियर गया और मंत्री संतरियों की राम-रमी भी। लेकिन एक चीज़ की संतुष्टि है कि अब महिला खिल���ड़ियों ने अपना मैदान जीत लिया है। यह जीत मेरे ओलंपिक मेडल से भी बड़ी जीत है। सरकार ने जो इनाम दिया था वह मैं प्रधानमंत्री आवास के सामने रख आया था। इस जीवन में अग्निवीर आंदोलन और किसान आंदोलन ने भी बहुत कुछ बदला है। इन दोनों आंदोलनों ने याद दिलवाया है कि ओलंपिक मेडल जीतने से पहले मेरी ज़िंदगी क्या थी। मेडल से मेरा जीवन तो बदला होगा, पर मेरे लोगों का नहीं। मेडल की तरफ़ देखता हूँ तो बचपन का सपना याद आता है और अब आगे के सफ़र की और देखता हूँ तो बचपन की हक़ीक़त याद आती है। इन्हीं उलझनों के बीच जो कुछ होता है उसी को जीवन कहते हैं।