No one in this world is friend or foe to another. It is our speech & conduct that engender friendship & enmity.
Thus : Saint Kabirdasji says...
‘Let your words spring from humility bearing no trace of pride,
Awarding solace to others, peace to your own mind.’
#Saprem_Harismaran
आज ‘सान्दीपनि सभागृह‘ में नये छात्रों का स्वागत और गुरुकुल के निवासी सभी छात्रों और शिक्षकों के साथ संवाद किया। बच्चों का उत्साह और भाव देखकर प्रसन्नता भी हुई । नये प्यारे बच्चे घर परिवार को मिस भी कर रहे हैं, नये वातावरण में ढलने के उनके प्रयासों में सभी शिक्षक और बड़े बच्चे सहायक बन रहे हैं । घर से दूर किसी योग्य गुरुकुल में रह कर पढ़ने वाले छात्रों का अच्छा विकास होता है।
संसार में शत्रु मित्र कोई नहीं होता। तुम्हारी वाणी और व्यवहार ही दोस्त या दुश्मन बनाते हैं । अतः संत कबीरदास जी कहते हैं. . .
‘ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय
औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होय’
(आपा=अहंकार)
- #सप्रेम_हरिस्मरण
जा दिन तें जदुनाथ चले ब्रज गोकुल से मथुरा गिरिधारी।
ता दिन तें ब्रजनायिका सुंदर रंपति झंपति कंपति प्यारी।
वाहि के नैनन की सरिता भई शंकर सीस चले जल भारी।
गंग कहै सुन शाह अकब्बर ता दिन ते जमुना भई कारी॥
- कवि गंग
To empathize with the pain of others is not such a difficult task. However to look upon their triumphs and joys with a glad heart, is truly grand.
#Saprem_Harismaran
यस्माच्च येन च यदा च यथा च यच्च
यावच्च यत्र च शुभाशुभमात्मकर्म ।
तस्माच्च तेन च तदा च तथा च तच्च
तावच्च तत्र च कृतान्तवशादुपैति ॥
- पंचतंत्रम्
“मनुष्य ने (अपने पूर्वजन्मों या अतीत में) जिस कारण से, जिस साधन से, जिस समय पर, जिस प्रकार से, जो भी (अच्छा या बुरा), जितनी मात्रा में और जिस स्थान पर अपना कर्म किया है...
उसे भविष्य या अगले जन्मों में काल (कृतान्त/नियति) के प्रभाव से उसी कारण से, उसी साधन द्वारा, उसी समय पर, उसी प्रकार से, वही फल, उतनी ही मात्रा में और उसी स्थान पर भुगतना ही पड़ता है।”
The relationship of the transient(body) & temporal(world) is provisional & temporary.
That of the eternal(soul) & perishable (body) is likewise presumed & tentative. Only the bond between the indestructible(soul) & immutable (Almighty) is authentic & perpetual.
#Saprem_Harismaran
अनित्य(संसार) से अनित्य(शरीर) का संबंध व्यवहार के लिए और अनित्य है।
अनित्य(शरीर) से नित्य(आत्मा)का संबंध भी माना हुआ और अनित्य है।
नित्य(आत्मा)से नित्य(परमात्मा) का संबंध वास्तविक और नित्य है।
- #सप्रेम_हरिस्मरण
यो धर्मं सत्त्वसंपन्नं सततं चानुपश्यति।
न स पापेषु लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
– सुभाषितरत्नम्
(जो व्यक्ति धर्म के मार्ग का निरंतर अनुसरण करता है, वह पापों से उसी प्रकार अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता जल में रहने के बाद भी जल से नहीं भीगता।)
A vedantic parable tells of a salt figurine diving into the ocean to gauge its depth only to dissolve & become one with its waters.
The infinite Almighty is attained not by intellectual analysis, but by faith. His realization is born of direct experience.
#Saprem_Harismaran
नमक की गुड़िया समुद्र की गहराई नापने समुद्र में कूदी। समुद्र में खो गई, समुद्र हो गई ।
प्रभु को बुद्धि के तर्कों से नहीं, श्रद्धा से जाना जाता है।
वे अनुभवगम्य हैं।
- #सप्रेम_हरिस्मरण