इस देश में प्रधानमंत्री से
कहीं ज्यादा जरूरी है
किसान।
तुम कहते हो
उनके साथ न जाओ
वो किसान नहीं
किसान के रूप में बहरूपिये हैं
अगर बात ऐसी है
तो क्यों न मैं
प्रधानमंत्री के बजाय किसान से छला जाऊं?
प्रतीक त्रिपाठी
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@SonuSood अच्छाई के ���ारे में भी लोगों के भीतर एक प्रकार का डर बैठ गया है, दरअसल लोग इतनी बार छले गए हैं कि उन्हें लगता है कि कोई अच्छा बन रहा है तो उसके पीछे उसका कोई स्वार्थ छिपा है।
उन्हें डालने दो सूखी नदी प�� जाल
बादलों को किसका डर है
मुझे किसी का डर नहीं
जो कुछ खोना था खो चुका
जो कुछ पाना है वह कोई देगा नहीं
तमगा(अरुण कमल)
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" एक विचार लो, उसे अपना जीवन बनाओ और अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, तंत्रिकाओं और शरीर के हर हिस्से में उस विचार को भर दो। बाकी सभी विचारों को छोड़ दो। यही सफलता का नियम है"
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मेरे साथ खोई हुई चीजों की उदासियाँ नहीं है
एक खोया हुआ पर्वत
मुझे नदी में बहता मिला
एक खोया हुआ फूल मिला धरती में
बहुत गहरे
मिट्टी बना हुआ
यह चूक तुम्हा��ी है
जो जहाँ खोया है उसे वहीं ढूंढते हो
जबकि यह कभी निश्चित नहीं था
कि जो जहाँ खोया है
वहीं मिलेगा
पायल
११-१-२०२१
कविता
गिरना
चीजों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के
कोई नियम नहीं होते
लेकिन चीज��ं कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में
मनुष्य कर सकते हैं
नरेश सक्सेना
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