तर्क हजार मौत मरा होगा जब कहा गया कि कल को कोई भी ऐरा गैरा कोई भी मांग कर सकता है,
ये मुद्दों को तुच्छ दिखाने के तुम्हारे पैतरो का वक्त नहीं है
जितनी कोशिश कर रहे हो उतना ही खुद का पर्दाफाश कर रहे हो।
क्या मुद्दा गलत था,
क्या तरीका गलत था
.
.
तो क्या वजह थी कि लाठी भांजते वक्त अपने वजूद का पूरा जोर लगा दिया...
निश्चय ही अपने बच्चों के साथ ऐसा करते होंगे आप
जब खुद माननीय मुख्यमंत्री ने पटवारी कैंडिडेट्स के राज्य स्तरीय कार्यक्रम में कोई घोषणा की हो उसे लगभग 1 साल 2 महीने बाद भी अमलीजामा नहीं दिया जाना उचित नहीं है क्योंकि मुख्यमंत्री की घोषणा खुद सरकार की घोषणा होती है।
दूसरा मुख्यमंत्री की घोषणा पटवारी सेवा से जुड़ी विसंगतियों को दूर कर���ी है ऐसे में इसे आर्थिक भार या अन्य वजहों से नकारना भी उचित नहीं है ऐसे में इसे नॉन फिजिबल कहकर किसी प्रशासनिक नियमों के जटिलता के बियाबान में भेजकर समाप्त करने के प्रयास नहीं होने चाहिए।
पटवारी आज भी जिला प्रशासन में सबसे प्रमुख भूमिका निभाता है ऐसे में उसकी सेवा शर्तों की स्पष्ट विसंगतियों को दूर करने में ऐतिहासिक या आर्थिक कारण दिए जाने उचित नहीं है।
ये उनका हक है जिसे सरकार ने खुद स्व��कारा और अब उस पर फैसला लेने में ��ेरी हो रही है।
नव नियुक्त पटवारी कैंडिडेट अपन��� सेवा शर्तों को लेकर पंचकूला में निदेशक भू अभिलेख कार्यालय पंचकूला के बाहर बैठे हुए है।
पटवारी कैंडिडेट को ट्रेनिंग के दौरान 10000 रुपए मासिक भत्ता मिलता है ।
ये पटवारी कैंडिडेट ट्रेनिंग पीरियड के दौरान सैलरी देने, ट्रेनिंग को सर्विस पीरियड में काउंट करने और ट्रेनिंग पीरियड को 1 साल करने की माँग कर रहे है। इन्हें आश्वासन मिला था कि 15 मार्च तक इनकी मांगो पर कार्यवाही को जाएगी लेकिन ऐसा न होन�� के चलते ये पंचकूला पहुंचे है।
@DainikBhaskar
@sumitamisra
मुखोटों के दायरे से कब निकलोगे, एक अरसे से आइने ने तुम्हें देखा नहीं।
ये जिद्द है या मोहब्बत उसकी,
वो नादां आज भी बैठा है वहीं।।
एक सूरज को बुलावा भेजा है उसने,
एक उम्मीद पर उम्दा है वो।
पर अंधेरों की ख्वाइशें रही ही नही, जब खुद मसालों ने पूछा उजालों का पता।।