अंचित सुना रहे हैं अपने कविता-संग्रह ‘आधी पंक्ति’ से एक कविता ‘एम��े’
रात के जाते हुए
कोई और चला आएगा
इसकी तैयारी नहीं की जा सकती।
जो आया है,
वह अपने साथ क्या लाया है
इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है मेरे पास।
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प्रश्न पूछने वालों को बेंच के ऊपर
हाथ उठाकर खड़ा कर दिया जाएगा
मुंडी हिलाने वालों को मुर्गा बनाया जाएगा
और बात-बात पर तर्क करने वालों को क्लास से
बाहर धकेल दिया जाएगा
मूक बिम्बों से बाहर • आरती
अधिसंख्यक हिन्दू जो चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में शूद्र माने जाते थे, क्या वे फिर से शूद्र होने को अभिशप्त होंगे? क्या उनका वजूद ब�� इसलिए होगा कि वे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के सेवक के रूप में ही अपनी ज़िन्दगी खपा दें? गम्भीरतापूर्वक हमें इन सवालों का सामना करना ही होगा।
छोटे कलेवर में बड़े सवाल सामने लाती कन्नड़ के विख्यात लेखक देवनूर महादेव की किताब ‘आर.एस. एस. : काया और माया’ अब हिन्दी में उपलब्ध
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आर.एस.एस. पर लिखी गई संक्षिप्त कन्नड़ किताब ‘आरएसएस आला मट्टू अगाला’ जो छपने के साथ वायरल हुई और जिसकी पाठकों में पहुँच एक इतिहासकथा बन गई!
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यही मेरा जीवन है। बारिश में सब कुछ बह जाने देना, फिर इकट्ठा क��ना, नया कुछ बनाना, बारिश का इन्तजार करना और फिर उस बारिश में बह जाने देना जो मेरे लिए आती है।
इच्छाएँ • कुमार अंबुज
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हरीश खन्ना का संदेश कुछ इस प्रकार का था मानों बारिश की पहली बूंद हो- हरीश जी को चार दशकों से जानता हूँ. बेहद स्मार्ट और सहज प्राध्यापक हरीश जी यायावर भी हैं और आम आदमी पार्टी के पूर्व विधायक भी. वे ख़ुद भी अच्छे लेखक हैं और अपनी बात साफ़ रखते हैं. मेरी पुस्तक हवाओं की दस्तक पर
हमेशा खोया-खोया-सा रहता। लगता ऐसा था जैसे मेरे भीतर की कोई चेतना-शक्ति धीरे-धीरे मरती चली जा रही है, या जो अन्तस्तल पानी की तरल सतह की तरह आंदोलित हो उठता था अब बर्फ की तरह जमकर ठोस, निस्पंद और निर्जीव होता चला जा रहा है।
सारा आकाश • राजेन्द्र यादव
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उम्मीद
आँख का इलाज कराने जाते
पिता से दस कदम आगे चलता हूँ मैं
आँख की रोशनी लौटने की उम्मीद में
पिता की आँखें चमकती हैं उम्मीद से
उस चमक में मैं उन्हें दिखता हूँ
दस कदम आगे चलता हुआ.
हम जो देखते हैं • मंगलेश डबराल
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���हले जब बंटी दूसरी दुनिया में था तो ममी का चेहरा, ममी की आवाज़ बहुत अपनी-अपनी लग रही थी, अब वह पूरी तरह अपनी दुनिया में लौट आया तो नीली रोशनी में नहाई ममी, कमरा, कमरे की हर चीज़ जैसे दूसरी दुनिया के लगने लगे।
आपका बंटी • मन्नू भंडारी
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पतझड़ में बहुत कुछ भूला हुआ भुलाया हुआ याद आता है। अ��बिसरी चोटें, अधबिसरी उमंगें! याद के संग-संग इच्छाएँ सर उठाती हैं, नये सिरे से फिर से कुछ करने की, काफी कुछ। भूल सुधारने की।
चार दिन की जवानी तेरी • मृणाल पांडे
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