भारत छोड़ो आन्दोलन में न केवल स्वयंसेवकों ने भाग ही लिया बल्कि उन्होंने बड़े नेताओ जैसे श्री साने गुरु जी जयप्रकाश नारायण और अरुणा असफ अली आदि की देखभाल की भी चिंता की
#IndependenceDay#vskmalwa
संघ का अंतिम लक्ष्य स्वराज्य प्राप्त करना है. ब्रिटेन की स��कार ने अनेक बार भारत को स्वतंत्र करने का आश्वाशन दिया, परन्तु वह झूठा साबित हुआ. अब साफ हो ग���ा है कि भारत अपने ही बल पर स्वतंत्रता हासिल करेगा - डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
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साल 1897 में रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव में बांटी गई मिठाई 8 साल के बालक केशव ने ना खाकर कूड़े में फेंक दी। यह अंग्रेजों के प्रति उनका पहला प्रतिकार था
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"डॉ. हेडगेवार क्रांतिकारियों की निंदा होना एकदम पसंद नहीं करते थे| वह उन्हें ईमानदार देशभक्त मानत�� थे उनका मानना था कि कोई उनके तरीकों से मतभिन्नता रख सकता है, परन्तु उनकी देशभक्ति पर ऊँगली उठाना अपराध है " - लोकमान्य आणे
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लाहौर, जो पंजाब की राजधानी रहा है, भगवान् राम के पुत्र लव अथवा लो द्वारा बसाया गया था। उनके नाम पर ही इस नगर का प्राचीन नाम लोहावर पड़ा, जो कालांतर में लाहौर के रूप में प्रचलित हुआ-ब्रिटिश पुरातत्त्ववेत्ता कनिंघम
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श्री पराशरजी ने कहा, हे मैत्रेयजी। समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण भूभाग में स्थित देश भारतवर्ष कहा गया है। उसमे भरतवंशियो का निवास है. यह नौ हजार योजन विस्तार वाली स्वर्ग अथवा मोक्ष की कामना करने वाले संतो की कर्म भूमि ह��-श्रीविष्णुपुराण
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“हम सब अर्थात भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश इन तीनों देशों में रहने वाले लोग वस्तुतः एक ही राष्ट्र भारत के वासी हैं, हमारी राजनीतिक इकाइया�� भले ही भिन्न हों परंतु हमारी राष्ट्रीयता एक रही है और वह है भारतीय।”-लोकनायक जयप्रकाश नारायण
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इमं में गंगे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोम॑ सचता परुष्ण्या।
असिक्न्या मरुद्वधे वितस्तयार्जीकीये शृणुहया सुषोमया।।
“मैं स्पष्ट रूप से चित्र देख रहा हूं कि भारत माता अखंड होकर विश्वगुरु के सिंहासन पर फिर से आरूढ़ हैं।”-अरबिंदो घोष
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समाज की अखंडता की रक्षा के लिए इतिहास से आदिवासी शब्द सदा के लिए विलोपित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि अंग्रेज और उनके वैचारिक वंशधरों ने आदिवासी शब्द ही सोची-समझी और दूरगामी परिणाम देने वाली साजिश के चलते गढ़ा था. #हम_सब_भारतवासी_मूलनिवासी#vskmalwa
‘मूलनिवासी’, ‘आदिवासी’ और ‘जनजाति’ जैसे शब्दों के बीच भ्रम पैदा कर जनजातीय समाज को शेष भारतीय समाज से अलग करने का प्रयास सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकात्मता के लिए उचित नहीं है।
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भारत में ‘मूलनिवासी’ की अवधारणा क�� पश्चिमी उपनिवेशवादी इतिहास के संदर्भ में ज्यों का त्यों लागू करना उचित नहीं है। भारत की सभ्यता और समाज का विकास अलग ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हुआ है।
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भारत में जनजातीय समाज के अधिकारों के संरक्षण के लिए संविधान ने स्वतंत्रता के समय से ही विशेष ��्रावधान किए हैं। संयुक्त राष्ट्र की 2007 की घोषणा में बताए गए अधिकारों में से अनेक अधिकार भारतीय जनजातीय समाज को संविधान ने पहले ही प्रदान किए हैं।
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भारत के जनजातीय समाज को किसी आयातित पहचान की आवश्यकता नहीं। हमारी जनजातीय परंपराएं, महापुरुष, संस्कृति और संघर्ष स्वयं में गौरवशाली हैं। आवश्यकता उन्हें राष्ट्रीय चेतना के साथ जो���़ने की है।
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आजकल अपने देश में भी यह दिवस मनाने का चलन प्रारंभ हुआ हैं. यह सब कैसे हो गया...? इसका उत्तर हैं, वामपंथियों की एक बहुत सोची समझी रणनीति के कारण. #हम_सब_भारतवासी_मूलनिवासी#vskmalwa
छत्रपति शिवाजी महाराज उस जमाने में एक ऐेसे युगपुरुष थे, जिन्होंने विदेशी सल्तनत से खुद को अलग रखा और अपना स्वतंत्र राज्य निर्माण किया|
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