3300 सैनिकों को मरवाकर, 8800 सैनिकों को विकलांग बनवाकर, 10 हजार करोड़ रु खर्च करके, इंदिरा ने भारत को क्या दिया?
इंदिरा को भारत याद तो करता है लेकिन इमरजेंसी और नसबंदी के लिए ..एक पूरी बारात की नसबंदी करवा दी गई थी, दूल्हे की भी..
वे सब इंदिरा जी को तो छोड़ो, उनकी मां–बहन तक को याद करते हैं @Pawankhera जी
लगता है पिछले कुछ दिनों में खूब 'रूह अफ़ज़ा' वाले गिरोह ने जिस भाईचारे, प्यार और गंगा-जामुनी तहज़ीब का सन्देश दिया है उसका ही फल पहलगाम में प्रकट हुआ है।
#पहलगाम नरसंहार से 4 सेकेंड पहले का #Exclusive वीडिय���
चुपके से आए इस्लामी आतंकियों ने बरसाईं गोलियां.
वही हरकत, जो मोहम्मद बिन कासिम से ले कर औरंगजे�� ने की.
वही नीचता जो मोपला, नोआखाली में आजादी के बाद हुई
वही खानदानी विश्वासघात जो वर्तमान में कश्मीर , संभल और बंगाल में दिखा
#pahalgamattack #Pahalgam #TerroristAttack
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक इनके लिये एक ही हथियार काम आता है
आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार,,,,
जितना जल्द लोग समझ जाएंगे,,,
ठीक रहेगा.....
और हाँ अपनी जाति पर गर्व करने वाले दोगलों --- उन आतंकियों ने धर्म पूछ कर गोली मारी जाति नहीं....
अभी जो सुप्रीम कोर्ट के जज जेबी पारदीवाला ने फैसला दिया है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अगर किसी बिल पर 3 महीने में फैसला न लें तो वह कानून लागू माना जाएगा
जब सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को वेबसाइट पर अपलोड किया तब पूरा भारत यह देखकर चौंक गया कि जस्टिस जेबी पारदीवाला ने इसके लिए भ��रत के सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व निर्णय को या संविधान के किसी धारा को आधार नहीं बनाया बल्कि इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान के संविधान को आधार बनाकर यह फैसला दिया
न्यायिक रूप से कोई भी जज या तो भारत के किसी संवैधानिक पीठ या सुप्रीम कोर्ट के किसी पुराने निर्णय को अपना आधार बना सकता है या फिर भारत के संविधान के किसी अनुच्छेद को अपना आधार बनाकर फैसला सुना सकता है
लेकिन जज साहब ने तो हद कर दिया उ���्होंने दूसरे देश के संविधान वह भी पाकिस्तान के संविधान को आधार बनाकर फैसला सुना दिया
पाकिस्तान की मीडिया में बल्ले बल्ले हो रहा है यह देखो भारत हमसे सीख ले रहा है
अब केंद्र सरकार जस्टिस जेबी पारदीवाला के इस निर्णय के खिलाफ रिव्यू पोजीशन फाइल कर रही है
वैसे सुप्रीम कोर्ट के कई अन्य जज भी पाकिस्तान के संविधान का उदाहरण देकर फैसला सुनाए जाने को बहुत आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं
इसी जज साहब ने कन्हैयालाल की हत्या के लिए नु��ुर शर्मा को जिम्मेदार बताया था और नूपुर शर्मा को फटकार लगाई थी
मतलब भारत में कुणाल कमरा को अभिव्यक्त की आजादी का अधिकार है असदुद्दीन ओवैसी और अकबरुद्दीन ओवैसी को हिंदू धर्म पर कुछ बोलने का अधिकार है लेकिन नूपुर शर्मा को अधिकार नहीं है
सुप्रीमकोर्ट के जज जे.बी. पारदीवाला पूरा नाम जमशेद बुरजोर पारदीवाला
पिता - बुरजोर कवाशज़ी पारदीवाला गुजरात के वलसाड से कांग्रेस के दो बार विधायक
भारत ��ी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस जज का चपरासी अर्द���ी पेशकार भी एक परीक्षा पास करके अपनी योग्यता से चपरासी बनता है वह जज खुद बिना कोई परीक्षा दिए सिर्फ इस आधार पर जज बन जाता है कि वह एक विशेष परिवार में पैदा हुआ है
और यही कोलोसियम सिस्टम भारत की न्यायपालिका को पूरी तरह से बर्बाद कर चुका है
जब तक जज भी यूपीएससी की तरह किसी प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा अपनी काबिलियत के दम पर न्यायपालिका में नहीं आएंगे तब तक भारत की न्यायपालिका बर्बाद होती रहे���ी
लुबना शौक़त ने फ़र्ज़ी ओबीसी सर्टिफिकेट लगा कर MBBS में दाख़िला ले लिया।
पकड़े जाने पर बाँबे हाईकोर्ट ने ये कह कर माफ़ कर दिया कि लुबना का एडमिशन निरस्त करना राष्ट्रीय हानि होगी !!
वही एक दूसरे मामले में फर्जी SC/ST certi. के आधार पर MBBS दाखिला लेने वाले को 7 साल की कैद और ₹11 हजार का जुर्माना का निर्णय दिया न्यायालय ने.
सजा पाने वाला 'हिन���दू' छात्र है.
आखिर भारत की न्यायपालिका हिंदुओं से इतनी घृणा और नफरत क्यों करती है ?
और मुसलमानो से भारत की न्यायपालिका को इतना मोहब्बत क्यों है?
बिल्कुल एक जैसे अपराध के लिए दो अलग-अलग तरह का व्यवहार भारत की न्यायपालिका ने क्यों किया ?
आचार्य रजनीश डिस्कोर्स : महिलाएं बलशाली आदमी खोजती है. महत्वकांक्षी आदमी खोजती है. धनवान आदमी खोजती है. पद प्रतिष्ठा वाला आदमी खोजती है.
बिना धन संपत्ति के आपको अच्छी सुंदर महिला नही पा सकोगे. अगर तुम निर्धन हो, गरीब हो तो महिला भी नही पा सकते.
महिलाएं आम तौर पर धन में उत्सुक होती हैं. ख्याल करना धनी आदमी को सुंदर महिला मिल जाती है. चाहे धनी आदमी सुंदर नो हो, वो काला हो या बूढ़ा हो, फिर भी उसे सुंदर और जवान महिला मिलेगी कारण उसके पास धन है.
अब सवाल आता है महिलाओं की इतनी धन में उत्सुकता क्यों है ?
क्या आचार्य रजनीश का कथन सही है.
"अगर बकरी का मांस खाना गलत नहीं है, तो गाय का मांस खाना कैसे गलत हो सकता है?" आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लेखिका शोभा डे का प्रश्न!
शोभा डे एक प्रसिद्ध लेखिका हैं, जिन्हें अक्सर उनके विचारों के लिए सराहा जाता है। उनका तर्क यह है:
"मांस तो मांस है, चाहे वह गाय का हो, बकरी का हो या किसी और जानवर ���ा। तो हिंदू जानवरों के बीच भेदभाव क्यों करते हैं? बकरी को मारना सही क्यों है, जबकि गाय को मारना गलत माना जाता है? क्या यह पाखंड और अज्ञानता नहीं है?"
आइए उनके तर्क पर इन उत्तरों के साथ विचार करें:
उत्तर नंबर 1:
शोभा डे मैडम, आपका तर्क दिलचस्प है!
लेकिन जरा सोचिए:
आपके पिता, पति, भाई, और बेटा—ये सभी पुरुष हैं, हैं ना?
फिर भी, क्या आप इन सभी के साथ समान व्यवहार करती हैं?
प्रजनन के लिए तो केवल आपके पति की ही आवश्यकता होती है, है ना?
क्या आप अपने पिता, भाई, या बेटे के साथ वही व्यवहार कर सकती हैं जो आप अपने पति के साथ करती हैं?
यदि अंतरंगता केवल आपके पति के लिए आरक्षित है, तो क्या यह पाखंड या अज्ञानता नहीं है कि आप इसे दूसरों तक नहीं बढ़ातीं?
पिता, पति, भाई, या बेटे जैसे रिश्ते भावनाओं, सम्मान और सामाजिक मान्यताओं से परिभाषित होते हैं, केवल जैविक पहचान से नहीं।
इसी प्रकार, हम गाय और बकरी जैसे जानवरों को जिस तरह देखते हैं, वह उनकी शारीरिक उपस्थिति के बजाय सांस्कृतिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व से निर्धारित होता है।
उत्तर नंबर 2:
आपसे एक और सवाल:
आप और आ��का परिवार शायद गाय या भैंस के दूध का उपयोग चाय या कॉफी में करते हैं, है ना?
लेकिन क्या आप कभी कुत्ते, सुअर, या बंदर के दूध से कॉफी तैयार करेंगे?
अगर आपकी तर्कशक्ति के अनुसार, दूध तो दूध है चाहे वह कहीं से भी आए, तो आप ऐसा क्यों नहीं करेंगे?
क्या यह आपके तर्क को गलत और पाखंडी नहीं बनाता?
यह मुद्दा मांस का नहीं है। यह आस्थाओं और भावनाओं का है।
जिस प्रकार पारिवारिक रिश्ते मूल्यों और विश्वास पर आधा���ित होते हैं, उसी प्रकार गाय, बकरी या अन्य जानवरों के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है
उत्तर नंबर 3:
एक बार एक ब्रिटिश व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंद से पूछा, "कौन सा जानवर सबसे अच्छा दूध देता है?"
स्वामीजी ने उत्तर दिया, "भैंस का दूध सबसे अच्छा है।"
फिर उस व्यक्ति ने पूछा, "लेकिन आप भारतीय तो गाय को सर्वोच्च मानते हैं? क्या यह सबसे अच्छा नहीं है?"
स्वामी विवेकानंद मुस्कुराए और बोले, "आप दूध की गुणवत्ता के बारे में पूछ रहे हैं, ��ेकिन हम गाय को केवल एक जानवर नहीं, बल्कि अपनी मां मानते हैं।"
इसी प्रकार, गाय कुछ लोगों के लिए भले ही एक सामान्य जानवर हो, लेकिन हिंदुओं के लिए इसका पवित्र महत्व है, जैसे एक मां का।
शोभा डे के लिए अंतिम सवाल:
*"टाइगर बचाओ!"—ऐसा कहने वाला सामाजिक सेवक कहलाता है।
*"कुत्तों को बचाओ!"—ऐसा कहने वाला पशु प्रेमी कहलाता है।
लेकिन "गाय बचाओ!"—ऐसा कहने वाला अचानक धार्मिक कट्टरपंथी क्यों कहलाता है?
व��स्तविक समस्या यह है कि इस तरह की आलोचनाएं अक्सर अपने ही लोगों से आती हैं, जो हमारी संस्कृति में निहित मूल्यों और भावनाओं का सम्मान करने में असफल रहते हैं।
सोचने की बात है!
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•झांसी हादसे में दोषियों के खिलाफ सरकार कार्रवाई करेगी और कड़ी कार्रवाई करेगी लेकिन मासूम बच्चों की मौत पर राजनीति करने वाले अपनी सरकार में बच्चों की मौत भूल जाते हैं
•मुलायम और अखिलेश सरकार में हर साल एक हजार से भी ज्यादा बच्चे पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस से मारे जाते थे उस पर काबू करने का कोई उपाय अखिलेश ने नहीं किया
•2016 में ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस से 104 बच्चों की मौत हो गई थी और उ�� बच्चों से संवेदना जताने के लिए पहुंचने में अखिलेश यादव को 4 दिन का वक्त लग गया
•साल 2024 में उत्तर प्रदेश को इंसेफेलाइटिस मुक्त कर दिया गया है और हजारों बच्चों की जान बचाई गई है. योगी सरकार ने इंसेफेलाइटस का टीकाकरण कार्यक्रम युद्ध स्तर पर चलाया और हजारों बच्चों की जान लेने वाली इस बीमारी को काबू में कर लिया
•हिंदू पर्व देव दीपावली में दीप जलाने की तुलना झांसी में हुई बच्चों की मौत से की जा रही है. सवाल ये है कि हर हिंदू पर्व को भव्यमय बनाने पर अखिलेश यादव और सपाई के पेट में इतनी मरोड़ क्यों होती है.
•हिंदू धार्मिक प्रतीकों और त्योहारों का मजाक बनाना उन पर निशाना साधना, हिंदू आस्था के प्रतीक राम मंदिर को रामगोपाल यादव ने बकवास कहा था.
•घटना कोई भी हो लेकिन हर चीज पर सपा हिंदू धर्म उसके प्रतीकों, उसके धर्मगुरुओं और हिंदू आस्था के स्थल मंदिरों को ही निशाना बनाती है. इससे हिंदू धर्म के बारे में इनका मानसिक दिवालियापन साबित होता है.
•बच्चों के भवि��्य को लेकर सपा कितनी संजीदा है उसका पता इस बात से ही लग जाता है कि सपा सरकार मे बच्चों को इक्का-दुक्का टीके लगाए जाते थे और योगी सरकार ने आकर बच्चों को लगने वाले सबसे महंगे टीके भी मुफ्त कर दिए हैं.
जवाहरलाल नेहरू अपने परिवार के बच्चों से काफ़ी प्यार करते थे। उन्होंने अपनी पुत्री को राजनीति में जिस तरह आगे बढ़ाया, वह एक मॉडल है। फिर उनकी बेटी ने अपने बेटे को सत्ता में आगे बढ़ाया। उनके दूसरे बेटे से बहू और फिर बहू से बेटे और अब बेट�� तक ये परंपरा जारी है।
इसके बाद की पीढ़ी ने भी इस उपचुनाव में प्रचार कर लिया। ये नेहरू परिवार की लगातार छठी पीढ़ी है। सिर झुकाकर सलाम करो कांग्रेसियों। नए बॉस आ गए हैं।
ये अब हमारी राष्ट्रीय परंपरा या समस्या बन गई। यह अब सर्वत्र है। सर्वव्यापी है। कम अपवाद बचे हैं। वे बहुत दमदार लोग हैं जो नेहरू जैसा पिता न होने के बावजूद राजनीति में आगे बढ़ते हैं।
आदरणीय नेहरू जी की याद में हम बाल दिवस म��ाते हैं क्योंकि वे अपने बच्चों को प्यार करते थे। 🙏🏽
नेहरू जी का मैं सम्मान करता हूँ और मैं उस स्तर पर नीचे नहीं उतरना चाहूँगा जितना नीचे गिरकर कांग्रेस नरेंद्र मोदी पर निजी हमला करती है।
कांग्रेस ने मोदी को कभी प्रधानमंत्री वाला सम्मान नहीं दिया।
मोदी जी साधारण परिवार के हैं। गुजराती स्कूल में पढ़ने की ही हैसियत थी।
मोदी को कांग्रेस द्वारा नीच बोलने की वजह उनका ओबीसी होना और इलीट जैसी इंग्लिश न बोल पाना ही है।
वरना वंशवाद शुरू कर��े के लिए तो किसी ने नेहरू को नीच नहीं कहा। कश्मीर या चीन नीति और ग़लतियों के बावजूद किसी ने नेहरू को नीच नहीं कहा। वे आरक्षण के खिलाफ मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखते थे, पर किसी ने उनको नीच नहीं कहा। उनके कारण बाबा साहब को कैबिनेट से इस्तीफ़ा देना पड़ा पर हम लोग उन्हें नीच नहीं कहते। उनकी समाजवादी सुस्त आर्थिक नीति और दोषपूर्ण शिक्षा नीति के कारण देश गरीब रह गया पर इस वजह से कोई उनको नीच नहीं क���ता।
कहना भी नहीं चाह���ए। पर हम ये कैसे भूल जाएँ कि मोदी को नीच कहा गया।
नेहरू को लेकर तमाम बातें की जा सकती हैं। पर मैं करूँगा नहीं। मैं प्रधानमंत्री पद का सम्मान करता हूँ। नेहरू हम सबके लिए सम्माननीय हैं। सादर नमन। 🙏🏽